बाढ़ में सरकार का अस्तित्व भी बह गया : मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु)

मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), वीरगंज | शुक्रवार से वर्षा शुरू हुई, शुक्रवार को ही सोशल मीडिया में ख़बर आ गई, की भारत- बिहार के मुजफ्फरपुर से चक्रवाती बादल मंडरा रहे, जिससे नेपाल(मधेश) में भारी बारिश होने की आशंका है। ठीक ऐसा ही हुआ। अब पहला सवाल उठता है, की नेपाल का मौसम विभाग क्या कर रहा था, उसने कोई खबरदारी या अलर्ट क्यो जारी नही किया ? या सरकार को जानकारी हुई तो पहले से सक्रियता क्यों नही दिखाई गई ? बाढ़ संभावित जगहों को ख़ाली कर लोगो को ऊँचे भूमि पर स्थानांतरित क्यो नही किया गया ? जहाँ स्थानांतरित करना संभव नही था, वहां गेटअवे किट ( बचाव किट) क्यो नही दिया गया ? सेना और पुलिस सिर्फ मधेशियों के सिर में गोली मारने के लिए है, आपदा में बचाव के लिए नहीं ?
शनिवार को स्थिति कुछ भयावह होने लगी, शनिवार को स.स.फोरम के पर्सा जिला अध्यक्ष प्रदीप यादव को गांव-गांव में स्थिति का जायज़ा लेते हुए देखा। रविवार तक हालात खतरनाक हो चुके थे, क्या करें या नही करे, कोई समझ पाता तब तक प्रदीप यादव, विजय सरावगी और फोरम के नेता कार्यकर्ता राहत सहयोग लेकर बाढ़ ग्रस्त इलाकों में पहुच गए। फोरम के ही अन्य नेता मोहनलाल चौधरी और हरिनारायण रौनियार जब राहत सामग्री लेकर पकहा गांव में पहुचे तो लोगो का जमावड़ा लग गया, एक २०वर्षिय युवक ने कहा “हमरा बहुते भूख लागल बा, दु दिन से कुछो नईखे मिलल”। ये सुनके हरिनारायण रौनियार उसे खाने को दिए और अपने आशु पोछते हुए, भीड़ से अलग निकल आए। उन्होंने कहा “ये बाध्यता ये दुःखद परिस्थिति को समझने वाला कौन है” ?
पकहा की ६०वर्षीय बचीदेवी सोनारिन ने कहा “हम बूढ़ा गइनी, मने बाढ़ से अइसन हालत कबो ना भइल रहे, हमर पतोह आउर ३गो नाती स्कूल में आपन जान जोगवले बानी”। बिजय चौरसिया कहते है,”नेपाल सरकार मधेशी ख़ातिर कुछो ना करी, खाली टेक्स ली आउर गोली मारी, अरे जब उखियारी में ऊख ना मिलल, तब कोइलारी में रस कइसे मिली”।
कुछ सत्ताधारी और अन्य राजनीतिक दल कैम्प लगाकर सहयोग इकठ्ठा करने लगे, लेकिन सरकारी सौतेलापन प्रष्ट दिख रहा था। कुछ मंत्री और प्रधानमंत्री, बड़ी निर्लज्जता से उड़न खटोला पर बिना कोई राहत के सामान के साथ आसमान से असमानता का भाव लिए मंडराते रहे। प्रधानमंत्री को फूलमाला से लदा हुआ देखकर ऐसा लग रहा था, की बाढ़ का उद्घाटन करने का कार्यक्रम हो। एक बार फिर देउबा अपने को असक्षम सिद्ध करने में सक्षम हुए। माना कि भूकंप की भविष्यवाणी नही हो सकती, पर बाढ़ का पूर्वानुमान तो हो सकता है। इसी प्रकार के समस्या से निपटने के लिए राहत कोष तैयार किया गया है, लेकिन प्रधानमन्त्री कार्यालय के अनुसार प्रधानमन्त्री राहत कोष में २ अर्ब १२ करोड रुपैयाँ है और देश के ७५ जिल्ला में केन्द्रीय विपत् उद्धार तथा राहत समिति के शाखा में करोडौं रुपैयाँ जम्मा है। लेकिन सरकार के ढिला-सुस्ती के कारण अभी तक एक रुपया भी नही निकाला जा सका है।
बाढ़ आवृत्ति और जनहानि का कारण बनती है, सम्पति और आधारभूत संरचना को क्षति पंहुचाती है, पशुधन को तबाह करती है और जल तथा भूमि को प्रदूषित करती है। बाढ़ का पानी उतर जाने के बाद समस्या और बिकराल रूप लेती है, बाढ़ के तुरंत बाद अनेक प्रकार की संक्रामक रोग पनपते है, अक्सर बाढ़ में होने वाली मौत से ज्यादा मौत, बाढ़ के बाद होती है। बाढ़ ग्रस्त इलाकों के पूरी सफाई के बाद ही वहा पुनः प्रवेश करना होगा। मृत जानवरों को उचित स्थान पर दफनाना होगा। मृत जानवर और दूषित पानी बीमारियों का बड़ा कारण होगा, सभी कुएं, तालाब और चापाकलों की सफाई करनी होगी। मधेश पहले से ही वायरल इंफेक्शन के चपेट में था, बच्चे बीमारी का जल्दी शिकार होते है, अतः बच्चों, गर्भवती और नव-प्रसूता को संक्रमण का बहुत बड़ा खतरा रहेगा। भौतिक संरचना पुनः निर्माण के बिधुतीय करेंट का खतरा रहेगा। इन सब के बीच जो आर्थिक क्षति हुई वह भूखे मरने पर मजबूर करेगी। क्या ऐसे भयावह हालात में स्थानीय चुनाव संभव होगा ?
पकहा की ६०वर्षीय बचीदेवी सोनारिन और वहा के स्थानीय लोगों में सरकार से ना कोई भरोसा है, ना कोई उम्मीद। वे मान चुके है कि नेपाल सरकार उन्हें किसी ना किसी बहाने समाप्त कर देना चाहती है। उनका कहना था कि, “अब हमारे भुखमरी और दरिद्रता का मार्केटिंग होगा, बिदेशी दाता से डालर में चंदा लिया जाएगा, फिर करोड़ो का गाड़ी-बंगला खरीद कर ये मौज करेंगे। हमारी लाशों के बदले ये अपना इलाज बिदेशो में कराएंगे। राहत बितरण के समय इनके दलो के सदस्यता देखकर कुछ टुकड़े फेंके जाएंगे, सारा राहत दलीय भागभण्डा के आधार पर होगा”। पकहा-मैनपुर के घमंडी राउत कहते है, “नेपाल सरकार से नईखे कउनो आशा, आ इ झुलेला बारहों मासा”।
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