बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा

रवीन्द्र झा ‘शंकर’
शान्ति किसे नहीं चाहिए ? सभी तो अशान्त है, बेचैन है, व्याकुल है, दुखिया हंै । किसी को इस बात का दुख है तो किसी को उस बात का दुख, आज एक बात का दुःख है तो कल दूसरी बात का । संसार के सारे लोग दुःख–संतप्त है । इन दुःखों से बाहर कैसे आये ? इन दुःखों से छुटकारा कैसे पाये ? सही अर्थ में सुख–शान्ति का जीवन कैसे जी सके ?
हमारे देश के ऋषियों ने, मुनियों ने इसी बात की खोज की कि दुःखों से छुटकारा कैसे मिले ? सही अर्थ में सुख शान्ति कैसे प्राप्त हो ? सब एक ही परिणाम पर पहुँच कि बिना हरिभजन के सुख–शान्ति नहीं मिल सकती । सब अपने–अपने अनुभव के आधार पर मानव के क्लेश एवं तनावों को मिटाने के उपाय बताये । भगवान शिवजी से उमा (पार्वती) से कहा–
उमा कहऊँ मैं अनुभव अपना ।
सत हरि भजन जगत सब सपना ।।
उत्तरकाण्ड में काकमुशुडिजी भी अपना अनुभव बता रहे हैं–
निज अनुभव अब कहुउँ, खगोसा ।
बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा
(रा.प.मा. ७।८।५)
अतः क्लेशो से मुक्ति एवं सच्ची सुख शान्ति हरिभजन के अतिरिक्त किसी प्रकार नहीं मिल सकती लेकिन हरिभजन अर्थात् हरिभक्ति तभी सुख–शान्ति प्रदान करती है, जबकि उसे धारण किया जाय । भक्ति प्रदान करी है । जबकि उसे धारण किया जाय । भक्ति तो करे नहीं और उसकी चर्चा करे तो सुख–शान्ति नहीं मिलती । अतः समझ के भक्ति हमारे व्यवहार में कैसे उतारे ।
भगवान को चन्ययन–पुष्प अर्पण करना, मात्र इतने में कोई भक्ति पूर्ण नहीं होती, यह तो भक्ति की एक प्रक्रिया मात्र है । भक्ति तो तब होती है, जब सबमें भक्तिभाव जागता है । ईश्वर सबमें है । मैं जो कुछ भी करता हूँ, उस सब को ईश्वर देखते है, जो ऐसा अनुभव करता है, उसको कभी पाप नहीं लगता । उसका प्रत्येक व्यवहार गीतमय बनता है । मानव भक्ति करता है, परंतु व्यवहार शुद्ध नहीं रखता, जिसका व्यवहार शुद्ध नहीं, वह मन्दिर में भी भक्ति नहीं कर सकता । जिसका व्यवहार शुद्ध है, वह जहाँ बैठा है, वही भक्ति करता है और वही उसका मन्दिर है । व्यवहार और भक्ति में बहुत अन्तर नहीं है । अमुक समय, व्यवहार का अमुक समय भक्ति का ऐसा विभाजन नहीं है । रास्ता चलते, गाड़ी में यात्रा करते अथवा दुकान में बैठकर धन्दा करते, सर्वकाल में और सर्वस्थल में सतत भक्ति करनी है ।
भक्ति करने के लिए घर छोड़ने या व्यापार छोड़ने की आवश्यकता नहीं । केवल अपने ही लिये किये करो, यह पाप है, घर के मनुष्यों के लिये काम करो, वह व्यवहार है और परमात्मा के लिये काम करो, यह भक्ति है, कार्य तो एक ही है, परंतु इसके पीछे भावना में बहुत फर्क है । महत्व क्रिया का नहीं क्रिया के पीछे हेतु क्या है, भावना क्या है, यह महत्वपूर्ण है । मन्दिर में एक मनुष्य बैठा माला फेरे परंतु विचार संसार का करे, प्रभु का स्मरण करते–करते बनिहारी करे तो इस माला जपने वाले से यह बनिहारी करने वाले श्रेष्ठ है ।
व्यवहार करो, व्यवहार करना खोटा नहीं, परन्तु जो व्यवहार प्राप्त हुआ है, उसमें विवेक की आवश्यकता है । मनुष्य को सतत भक्ति में शक्ति में आनन्द नहीं आता । अपने जैसे साधारण मनुष्य का मन ५–६ घण्टे परमात्मा का ध्यान, सेवा, स्मरण करने के उपरान्त कुछ और–और मागने लगता है । निरन्तर मिठाई मिले तो मन में अभाव होने लगता है कि नमकिन मिले, वैसे ही मुनष्य को सतत भक्ति करने का मन हट जाता है । जैसे शरीर को थकान होती है, वैसा ही मन का थकान होती है । ५–६ घण्टा सेवा करने के उपरान्त मन थक जाता है । इसलिए दोनों प्रवृत्तियों को ढूंढता है, भक्ति के लिये प्रवृत्तियों का निरन्तर त्याग करने की आवश्यकता नहीं है । प्रवृत्तियों का सतत भक्ति बनाओ । भक्ति दो–तीन घण्टे की नहीं, चौबीसों घण्टों की करो, अपनी प्रत्येक प्रवृत्ति को भौतिकमय बनाओं, बड़े–बड़े संत भी प्रारम्भ में धन्धा करते थे । संत यह अन्धा करते–करते ही भक्ति करते थे और प्रभु को प्राप्त करते थे । नामदेव दर्जी थे, गोरा कुम्हार घड़ा बनाते थे, कबीरजी बुनकर थे, सेना भगत हजामत का काम करते थे । ये सभी संत धन्दा करते थे, परंतु सब में प्रभु को देखते थे,ग्राहक में भी परमात्मा का अनुभव करते । प्रत्येक महापुरुष को अपने धन्धे में से ज्ञान मिला । प्राचीनकाल में महान ज्ञानी ब्राह्मण भी वैश्य के घर सत्संग के लिये जाते, जाजलि ऋषि की कथा है– एक दिन उनको आकाशवाणी से आज्ञा हुई कि सत्संग करना हो तो जनकपुर में तुलाधर वैश्य के यहां जाओ ।
तुलाधर उस समय दुकान में काम कर रहे थे । जाजलि का देकर उन्होंने पूछा– क्या आकाशवाणी सुन कर आये हो ? जाललि को महान आश्चर्य हुआ कि वैश्य और इतना महान् । तुलाधर से पूछा कि तुम्हारा गुरु कौन है ? और कहा– धन्य इस जनक नगरी का जहाँ ऐसे–ऐसे भक्त का जन्म हुा है ?
तुलाधर ने कहा– मेरा धन्दा ही मेरा गुरु है । मैं अपने तराजू की डण्डी ठीक करता हूँ । किसी को कम नहीं तौलता, बहुत नफा नहीं लेता । मेरी दुकान पर आने वाला ग्राहक प्रभु का अंश है, ऐसा मानकर व्यवहार करता हूँ । तराजू की डण्डी की तरह अपनी बुद्धि को ठीक रखता हूँ । टेढ़ी होने नहीं देता । अपने माता–पिता को परमात्मा का स्वरूप मान कर उनकी सेवा करता हूँ तथा धन्दा करते–करते मन में मालिक का सतत स्मरण रखता हूँ । धन्दा करने में ईश्वर को भूलो नहीं तो तुम्हारा धन्दा ही भक्ति बन जायगा ।
यह भूलो मत, व्यवहार में अपने धर्म को मत छोड़ो । जीवन में धर्म ही मनुष्य है अन्य चीजे गौण है । यदि हमारी जीवन में भगवान की भक्ति का एक बार भी चढ़ गया तो जन्म ही सफल है । ऐसा दृढ़ विश्वास है

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