बिहार की बयार आ गले लग जा

ruchi singhरुचि सिंह:आरजेडी प्रमुख लालूयादव ने कहा कि जेडीयू नेता नीतीश कुमार उनके छोटे भाई की तरह हैं यदि छोटा भाई बडÞे भाई के पास आता है तो उसे गले लगाना स्वाभाविक ही है ।
दरअसल आम चुनाव में देश के चुनावी परिदृश्य को प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने अपने व्यक्तित्व की जादर्ुइ छडÞी से बीजेपी बनाम अन्य पार्टियों की लडर्Þाई मंे तब्दील कर दिया था । वही अब बिहार में होने वाले उपचुनाव में भी बीजेपी को पार्टर्ीीीत दिला पाती है या नहीं – क्या अभी तक नरेन्द्र मोदी का आभामण्डल अपनी किरणे बिखेर रहा है –
लोकसभा चुनाव में ‘मोदी लहर’ ने बिहार, उत्तर प्रदेश में बीजेपी विरोधियों को उनकी सही जगह दिखा डÞाली । १२० सीटों में केवल १६ सीट ही विरोधियों की झोली में आई । दरअसल अब उत्तर प्रदेश में भी १२ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं । फिलवक्त बिहार की १० सीटों पर जल्दी से जल्दी चुनाव होने के लिए अधिसूचना भी जारी हो चुकी है । बिहार में भी बीजेपी की लहर को देखते हुए कई विधायकों ने दूसरे पाले में जाकर अपनी कई सीटें खाली कर दी है । बिहार में जातिगत राजनीति होते हुए भी आम चुनावों में बीजेपी ने चौकाने वाली सफलता के कदम चूमे थे । राज्य की ४० सीटों में से २२ सीटे और गठबन्धन लोकजनशक्ति पार्टर्ीीराष्ट्रीय लोक समता पार्टर्ीीो ९ सीटें मिली हैं । अतः गठबन्धन को कुल ३१ सीटे हासिल कर नीतीश की पार्टर्ीीे.डी. -यु) लालूप्रसाद की पार्टर्ीीार.जे.डी. को केवल दो और चार सीटें ही मिली । दोनों ही पार्टियों को एक तरह से निराशा ही हाथ लगी ।lalu_nitishlaugh
गौरतलब है कि बिहार बीजेपी की राज्य कार्यकारिणी समिति की १९ जुलाई-२० जुलाई की पटना में हर्ुइ बैठक में सिर्फतात्कालिक चुनौतियों के अलावा अगले साल विधानसभा के चुनावों के मद्देनजर  नए सिरे से एक जूट होने की कवायद पेश की गई । सूत्रों की मानें तो केन्द्रीय मन्त्री राधामोहन सिंह ने एक तरह से सुशील मोदी को मुख्यमन्त्री का उम्मीदवार तक घोषित कर डाला ।
बिहार में राजनैतिक बदलाव की बयार को रोकने के लिए लालू के कथित जंगल राज का विरोध करने वाले प्रतिद्वन्द्वी नीतीश कुमार लालू प्रसाद के गले लग चुके हैं । ‘आ गले लग जा’ की तर्ज पर लालू ने नीतीश के लिए यहाँ तक कह डÞाला है कि ‘नीतीश के साथ जन्मजन्मातर का रिश्ता है ।’ १६ मई से पहले सपने में भी लालू-नीतीश ऐसी कल्पना नहीं कर सकते थे । दोनों का यह नयाँ गठबन्धन अपनी-अपनी छवि की राजनीति के वर्चस्व को एकजूट करने का आनन-फानन में उठाया गया हताश भरा कदम ही है । नजर डÞालें तो यू.पी. के १९९ के विधानसभा चुनावों में ‘कमंडल राजनीति’ के दौर के बीजेपी को सत्ता के बाहर रखने के इरादे से ही मुलायम और माया ने विरोधी होने के बावजूद भी एक दूसरे से हाथ मिला लिया था ।
बीजेपी नेता शाहनवाज हुसैन कहते हैं, ‘नीतीश-लालू का गठबन्धन राज्य में बीजेपी की ताकत पर मुहर लगाएगा । नीतीश की सोच यह है कि जिन लोगों ने उन्हें बोट दिया है, वे लालू के साथ खडÞे होने पर भी उन्हें ही बोट देंगे । आरजेडी-जेडी -यू) गठबन्धन में नीतीश राज का बोलबाला होगा, ऐसा नहीं है । जो भी होगा लालू के इशारे पर ही होगा । सिर्फबीजेपी ही लालू के गठबन्धन के दौडÞते घोडÞे को रोक सकती है ।
सवाल यह पैदा होता है कि इस गठबन्धन का नेता कौन होगा – सीटों के बटवारें का क्या फार्मूला होगा – कई ऐसे सवाल हैं, जो इस गठबन्धन की राजनीति को ऐसी धुरी पर ला कर खडÞा करते है, जहाँ आगे चल कर शंका-उपशंका के आधार पर गठबन्धन का चीरहरण ही न हो जाए ।
हालाँकि बीजेपी विरोधी गठबन्धन में लालू का ही बोलवाला रहेगा, क्योंकि जेड -यू) २०१५ के विधानसभा चुनाव के लिए नीतीश को पहले ही मुख्यमन्त्री उम्मीदवार पद के लिए तय कर चुकी है । आम-चुनाव में जेडी -यू) के दयनीय पर््रदर्शन के चलते २६ के २६ उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी । अतः यह तो तय है कि राजनीति के माहिर खिलाडÞी लालू यादव निश्चित रूप से अपने तरीके से तोल-मोल की राजनीति करेंगे ।
देखना अब है कि २१ अगस्त के चुनाव के बाद इस गठबन्धन की नई पार्टर्ीीो शतरंज की बिसात पर शह या मात क्या मिलती है । क्योंकि बीजेपी लहर कहें या मोदी लहर की बयार का रुख किस तरफ लालू-नीतीश कर पायेंेगे क्योंकि मोदी लहर ने इस आम चुनाव में बीजेपी के पक्ष में नया इतिहास लिख डÞाला है । इंतजार है कि इस गठबन्धन की राजनीति का ऊँट किस ओर बैठेगा ।
लेकिन बिहार विधानसभा उपचुनाव में मिले रुझानों से स्थिति अब साफ हो गई है । लालू-नीतीश-कांग्रेस महागठबंधन के खाते में जहां ६ सीटें जाती दिख रही हैं । वहीं भाजपा को ४ सीटों पर संतोष करना पडÞ रहा है ।

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