बीपा पर बेवजह विरोध ठीक नहीं:
हरि रोका

प्रधानमन्त्री बाबुराम भटर्राई के ऊपर भारत के साथ किए गए बिपा सम्झौता को लेकर तीखा प्रहार शुरू हुआ। एमाले कांग्रेस सहित माओवादी के भी कुछ नेताओं ने भी भट्टर्राई की काफी आलोचना की। वैसे प्रधानमंत्री ने अपने भ्रमण से पहले ही र्सवदलीय बैठक बुलाकर इस समझौते के बारे में सभी दलों को ना सिर्फजानकारी दी बल्कि इस संबंध में सुझाव भी मांगे। प्रधानमंत्री सन्धि में प्रयोग किए जाने वाले शब्दों और वाक्य के बारे में भी दलों से सल्लाह मांगी थी लेकिन उस बैठक में किसी भी नेता ने इस बात को गम्भीरता से नहीं लिया और जानकारी के अभाव में बाद में बेवजह इसका विरोध करते नजर आए। किसी भी समझौते को समझे बिना उसपर शंका करना और उसपर बेवजह का बवाल करना नेपाली नेताओं की आदत सी हो गई है। विपक्ष में बैठने के साथ ही सरकार के हर काम की आलोचना करना और तीखी शब्दों में प्रतिक्रिया देना पुरानी प्रवृति है। इससे राष्ट्रीय महत्व के विषय को ही आम जनता गम्भीरता से नहीं ले पाते हैं।
६० के ही दशक से दुनियां भर में इस तरह के समझौते की शुरूवात हो गई थी। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि नेपाल ने पहली बार भारत के साथ बीपा समझौता किया है। खुद भारत पिछले दो दशकों में ८८ देशों के साथ और चीन ने १३३ देशों के साथ यही बीपा समझौता पहले ही कर लिया है। बाहरी निवेश को आकषिर्त करने के लिए भारत और चीन ने आपसी मैत्रीपर्ूण्ा संबंध रहे देशों के साथ बीपा समझौता किया है। इस समझौते से इन दोनों पडोसी देशों को काफी फायदा हुआ है। बीपा समझौता करने के बाद चीन ने पिछाले तीन दशकों में ११ प्रतिशत तक की आर्थिक वृद्धि दर प्राप्त की है।
यह स्वाभाविक है कि निवेश की गारण्टी के बिना कोई भी पूंजीपति या निवेश करने वाला देश अपना पैसा यूं ही दांव पर नहीं लगाएगा। काफीलम्बे समय से नेपाल के आर्थिक क्रियाकलाप में राज्य और निजी क्षेत्र से निवेश करते आ रहे भारत नेपाल में अपनी निवेश के सुरक्षा की गारण्टी चाह रहा था। इसी सर्ंदर्भ में २१ आँक्टूबर २०११ को भारत और नेपाल के बीच बीपा समझौता संपन्न हुआ। समझौते का मुख्य अंश के रूप में रहे ६ठे अनुच्छेद में युद्धजन्य परिस्थिति होने पर, दंगा फैलने पर, संकटकाल जैसी अवस्था में र्टार्गेट कर कुछ नुकसान पहुंचने पर बाजार मूल्य  के अनुसार स्वदेशी उद्योग की तरह ही क्षतिपर्ूर्ति की गारण्टी किए जाने का प्रावधान है। आपसी निवेश, इससे होने वाले द्विपक्षीय फायदा, रोजगारी व राष्ट्रीय पूंजी का निर्माण ही इस समझौते का मुख्य आधार है।
नेपाल के हक में लगानी बोर्ड संबंधी कानून वर्तमान विधायिका संसद से पर्ूण्ा सहमति के साथ पारित किया जा चुका है। स्वदेशी तथा विदेशी लगानी कैसे सुरक्षित किया जाए इस संबंध में कोई भी नियम कानून नहीं है। इसी तरह मजदूर यूनियन तथा ट्रेड यूनियन अधिकारी को किस तरह से व्यवस्थापन किया जाए इस बारे में भी कोई भी कानून स्पष्ट नहीं है। भारत के साथ हाल ही में किए गए बीपा समझौते में मजदूर हक अधिकार को कटौती के प्रावधान या हायर एण्ड फायर की बात कहीं भी किसी भी रूप में उल्लेख नही है।
एक तरफ तो वैदेशिक निवेश लाने के लिए हल्ला करना और जब इसके लिए समझुअता किया गया तो इसका विरोध करना यह दोहरी मापदण्ड और मानसिकता ठीक नहीं है। यह बात समझना होगा कि यदि सुरक्षा की गारण्टी नहीं हो तो विदेशी तो दूर की बात स्वदेशी लगानी भी नहीं बढ सकता है। बीपा समझौता को जो लोग राष्ट्रघाती कह कर इसका विरोध कर रहे हैं उन्हें इसके भीतरी तह में रहे विषयों का विकल्प पेश करना चाहिए अन्यथा इसके विरोध का कोई भी अर्थ नहीं रहेगा। मिथ्या प्रचार कर आत्मा को शान्ति होगा यह करना ठीक नहीं है। हमें क्या समझना होगा कि निचेश के सुरक्षा की गारण्टी नहीं किया जाएगा तो कोई भी मर्ूख आकर इस देश में निवेश नहीं करेगा।
-लेखक वरिष्ठ विश्लेषक हैं)

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