बुद्धिनारायण की बुद्धि और उपराष्ट्रपति पुन का है आव्हान ग्रेटर नेपाल का : कैलाश महतो

कैलाश महतो, पराशी,१८ मार्च |
२०७२ फागन २१ गते (४ मार्च, २०१६) के अन्नपूर्ण पोष्ट के पृष्ठ ६ पर बुद्धिनारायण श्रेष्ठ द्वारा लिखित “नेपाल समृद्ध भएपछि सुगौली सन्धिमा गुमेको भू–भाग सही सलामत फिर्ता लिन सकिन्छ” नामक लेख पढने को मिला । वैसे दो साल पहले तक मैं इसी अखबार का वार्षिक ग्राहक ही रहा । मगर अब मैं नेपाली अखबार या पत्रिकायें पढना लगभग छोड चूका हूँ । किसी सज्जन ने मुझे यह लेख उपलब्ध कराया और पढकर इसका प्रत्युत्तर देने का प्रयास किया हूँ । वैसे इसका जवाब इसी अखबार को देना चाहिए था । मगर वह मेरा लेख छापता नहीं है । कई बार देख चुका हूँ ।sunauli-pillar-east-of-belhiya-crossing-point
बुद्धिनारायण जी ने सन् १८१४, १८१५, १८१६ और आजाद भारत–नेपाल सरकार बीच हुए सन् १९५० के एंगलो–नेपाली लडाइयों पर विचार विमर्श तथा सन्धियों की बात की है और १९५० के सम्झौते से पूर्व के सारे सन्धियों को खारेज होने की बात की चर्चा की है । इस बात की ग्यारेण्टी १९५० के सन्धि–पत्र के ८वाँ धारा कर देती है । बुद्धिनारायण जी के बुद्धि से हम आग्रह करना चाहेंगे कि उनकी समझ कहीं उल्टा तो नहीं हो गयी है ? हमने भी इतिहास को थोडा बहुत पढने की कोशिश की है, लेकिन नेपालियों के दाबे अनुसार टिष्टा से लेकर काँगडा तक का भूमि विवाद का कोई विवादित दस्तावेज या सम्झौता इतिहास में दर्ज नहीं है । कोई सन्धि या सम्झौता उन भूमियों के उपर नहीं है । हाँ, ऐसा जरुर है कि नेपालियों की आनाजाना वहाँ तक रही है । जहाँ पर नेपाली लोग गए, जिस भूमि ने उन्हें सुरक्षा दी, पनाह दी, दानापानी दी, उसी पर उनकी बुरी नजर पडी है, लेकिन वहाँ के लोगों ने उन्हें कामयाब नहीं होने दीे । काँगडा में लडे, मगर सम्झौते कर लिए । वह सम्झौता भी अंग्रेजों ने करबायी थी और ये लोग करने को विवश रहे । उनकी अपनी रणनीति थी नेपालियों को अपने फौज में भर्ना कर अपने सिपाही नागरिकों को बडे क्षतियों से बचाने की, जिसे भ्रम में ये बहादुरी समझ बैठे हैं । फिरसे उन भूमियों के तरफ ताकने तक की हिम्मत नहीं कीे ।
गौर करने की बात यह भी है कि जिन नेपालियों ने मधेश को नहीं जित पाये, वे किला काँगडा को कैसे जित पाये ? उन्होंने मधेश को अंग्रेजों से दो लाख रुपये के बदले पट्टे (lease) के रुप में पाये थे । फर्क सिर्फ इतना रहा कि चीन के साथ अंगेजों द्वारा हंङ्गकंङ्गु के लिए किए समय सीमायुतm सम्झौता जैसा नहीं रहा । और अंग्रेजों ने यह जानकर नहीं किया था कि भारतीय लोगों से निपट लेने के बाद पूनः मधेश को अपने छत्रछाया में लेने की योजना रही होगी । क्यूँकि भारतीय और मध्यदेशीय भूमि नजदीक और समान है ।
१९५० के सन्धि के धारा नं. ८ यह बतलाती है कि ईष्ट इण्डिया कम्पनी और नेपाली शासकों के बीच हुए सारे सम्झौते खारेज होते हैं । और जब वे सम्झौतें, जिनके बलपर नेपालियों ने मधेश के भूमियों पर अंगे्रज के सहमति से शासन कर रहे थे और आजतक कर रहे हैं, वह नहीं कर पायेंगे । वह भूमि स्वतः आजाद हो जाता है ।
बुद्धि के श्रेष्ठ बुद्धिनारायण जी ने यह भी दाबा किया हैे कि जैसे समृद्ध होकर चीन ने ब्रिटेन से हंङ्गकंङ्ग वापस ली है, वैसे ही समृद्ध होकर नेपाल भी भारत में रहे अपने भू–भागों को वापस ले सकता है । नेपाल के दुसरे सर्वोच्च ओहदा पर रहे उपराष्ट्रपति पुन ने समेत तथाकथित ग्रेटर नेपाल नामक संस्था का ज्ञापन–पत्र को थामते हुए यह अभिव्यतिm (१३ मार्च, २०१६) दीे हैं कि सन् १९५० की सन्धि को रद्द कर भारत में रहे नेपाली भू–भागों को वापस लेना होगा, जो हास्यास्पद और विवादास्पद दोनों है । इस पर भारत लगायत अन्तर्राष्ट्रिय समुदायों को गम्भीर होना चाहिए ।
(तब तो भारत की किस्मत तो काफी बुलन्द होनी है, क्यूँकि कभी भारत में ही रहे भारत से सटे हुए सारे देशों को भारत में होगा । क्यूँकि भारत तो उन सारे अपने पूर्व भूमि रहे आज के अलग देशों से हर मायने में समृद्ध है ।)
हमें समझना होगा कि कोई देश किसी देश का नही., अपितु वहाँ के जनता की होती है । आज भारत कभी भारत का ही हिस्सा रहे आज के स्वन्त्र देशों को अपना नहीं कह सकता, क्यूँकि वहाँ की जनता वहीं के होने में गर्व करती है । लेकिन जब जनता चाहेगी तो शासकों के थोडे से डर त्रास के बाद तो संभव है ठीक वैसे जैसे दो जर्मनी के जनता मिलकर एक जर्मनी बना ली ।
चलें अब हंङ्गकंङ्ग् की ओर । सन् १८३० के आसपास अंगे्र्रजों की हफिमी व्यापार हंङ्गकंङ्ग तथा चीन के कई बाजारों तथा शहरों में चलना शुरु हआ था । चीन के युवा हफीम के नशे का आदि होने लगे थे, जिसे चीनियाँ सरकार को रोकना अनिवार्य हो गया था । चीन के इसी विरोधी रबैयों ने चीनी और अंगेजों के बीच युद्ध को न्यौता दे डाला और सन् १८४१–४२ में चीन ने हंङ्गकंङ्ग को अपने कब्जे में व्यापारिक केन्द्र बना लिया । इससे पहले सन् १८३९–४२ तक हुए हफिम के मुद्दों पर ही हुए चीनी–अंगे्रजी युद्ध को प्रथम Opium War भी कहा जाता है । दुसरा Opium War सन् १८५६–६० तक चला । इसी Opium War ने चीन और अंगे्रज दोनों को धकेलकर सन् १८९८ तक ले गयी, जहाँ हंङ्गकंङ्ग के उपर अंग्रेज और चीन दोनाें पक्षों में सम्झौता होती है । उस सम्झौता ने इंग्ल्याण्ड को ९९ वर्ष थप हंङ्गकंङ्ग् पर पट्टा (lease) का हुकुमत कायम रखने की अनुमति दे दी । चीन ने हंङ्गकंङ्ग को पट्टे में अंगे्रज को दे दी ।
उस सम्झौते का समय सीमा तक हंङ्गकंङ्ग को चीन के जिम्मे लगा देने के लिए सन् १९८४ में अंगे्रज और चीनियाँ सरकार बीच हुए सम्भौता के अनुसार एक देश में दो प्रकार के कानुनी प्रावधान लागू करते हुए हंङ्गकंङ्गीय जीवन शैली, सामाजिक अर्थ व्यवस्था, व्यापार तथा पूँजीवादी आर्थिक नीतियों को ही आने बाले ५० वर्षों तक कायम रखने की सहमति हुई । सम्झौते के अनुसार हंङ्गकंङ्ग में चीन विदेश नीति और सुरक्षा नीति के अलावा अन्य किसी प्रकार का नीति लागू ५० वर्षों तक नहीं करने की सहमति हुई है । वहाँ के नागरिकों के लिए उच्च आत्म निर्णय की अधिकार की ग्यारेण्टी भी मुहैया करायी गयी है सम्झौता में । ज्ञात हो, ब्रिटीश अधिन रहे हंङ्गकंङ्ग दुनियाँ का एक सर्वोत्कृष्ट व्यापारिक केन्द्र माना जाता है ।
अब देखें, बुद्धिनारायण जी को जो यह दलिल पेश करते हंै कि चीन की तरह नेपाल के समृद्धि के साथ ही भारत का जमीन नेपाल का हो जायेगा, जो सर्वथा मिथ्या है । हाँ, नेपाल को सीख और शिक्षा दोनों लेनी चाहिए कि मधेश के भू–भागों से जितना जल्द हो सके, विदा वारी ले लें । अंगे्रजों से नेपालियों की लडाई और दुश्मनी होने से ज्यादा दोस्ती और चम्चागिरी की रही है । वे बेइमान अंग्रेज भी हालात को सम्मान करते हुए इमानदार, नैतिकवान् और लोकतान्त्रिक हो गए । अब भगवान् मष्टो से लेकर न्याय के महादेवता पशुपतिनाथ और शान्ति एवं त्याग का महापुरुष बुद्ध को पूजा करने बाले नेपालियों को भी न्यायपूर्ण होना ही उन भगवानों की सच्ची श्रद्धा और पूजा होगी ।

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