बेचारी सरकार ! चाहकर भी संविधान नहीं दे पा रही है : श्वेता दीप्ति

 

श्वेता दीप्ति  सम्पादक

श्वेता दीप्ति
सम्पादक

वि.सं. २०७२ का आगमन हो चुका है और उसके साथ ही राजनेताओं के द्वारा तय की गई एक और तारीख भी । कुछ हो ना हो हमारे नेता समय निर्धारण में सबसे आगे रहते हैं । जिनके हाथों से देश की नव्ज छूट रही है वो ना जाने किस विश्वास के तहत १५ गते जेष्ठ को लेकर आशावान हैं । खैर देशवासियों को एक और काम मिल गया है । एक बार फिर इंतजार किया जा रहा है जेष्ठ १५ गते का । देश की दशा और दिशा दोनों ही उलझी हुई है । बेचारी सरकार ! वैसे सरकार कभी बेचारी नहीं होती क्योंकि देश की शक्ति निहित होती है उसके हाथों में किन्तु, कई मायनों में हमारी सरकार बेचारी ही तो है । संविधान निर्माण का जो हौव्वा खड़ा किया गया है, उसका कोई सही रूप सामने नहीं आ रहा । देश का एक अहम हिस्सा जो कभी अत्यन्त समृद्ध हुआ करता था, आज आँकड़ा बता रहा है कि वह हर क्षेत्र में दिन ब दिन पिछड़ रहा है । आखिर इसके पीछे कौन सी वजहें हैं ? क्या सरकार खुद को इस मुद्दे से बरी कर सकती है ? आखिर सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी क्या है ? सरकार चाहकर भी संविधान नहीं दे पा रही है, आए दिन हो रहे बलात्कार और अन्य अपराधों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही, मंहगाई की बढ़ती रफ्तार को नहीं रोक पा रही, हाँ विपक्ष के द्वारा घोषित आन्दोलन और जुलूस को रोकने की भरपूर कोशिश जरूर हो रही है । रैली में शामिल निहत्थी जनता पर प्रहरी के माध्यम से शक्ति आजमाइश की जा रही है और सरकार की यह नीति मधेशी जनता के असंतोष को और भी भड़काने का काम कर रही है ।
ना जाने किस खुशफहमी की शिकार है हमारी लाचार सरकार । आज भी शायद उन्हें लग रहा है कि सब उनके हाथ में ही है, चाहे तो देश की धार मोड़ दें । दरअसल हमलोग सभी एक गलतफहमी के शिकार होते हैं, हमें यह लगता है कि हमने सत्य को जान लिया है, जो हम जानते हैं वही सत्य है । किन्तु क्या आसमान, हवा, सूरज की रोशनी को किसी ने बाँधा है ? स्वतन्त्रता और अधिकार की चाह भी ऐसी ही होती है, इस सत्य को किसी संगठन, सम्प्रदाय, देशकाल की सीमा कैद नहीं कर पायी है और आज देश का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र जो हमेशा से दमित, शोषित और अधिकारों से वंचित रही है वह अपने सत्य को और सत्ता के सत्य को भी जान चुकी है । अब उसे चुप करा कर सरकार अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चलाएगी, यह सत्य हमारी सरकार को भी जान लेना चाहिए ।
वक्त की इसी धार को पकड़ने और समेटने की कोशिश हिमालिनी ने समय सन्दर्भ विचार श्रृंखला के माध्यम से की है । बुद्धिजीवियों के महत्वपूर्ण विचारों को हमने जानने की कोशिश की और उसे आप सुधी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास भी । हमारा प्रयास है कि हम समय सन्दर्भ विचार श्रृंखला के माध्यम से सामयिक विषयों पर चिन्तन करेंगे और उसे आपके समक्ष लाएँगे । इसमें आपके सहयोग और प्रोत्साहन की हमें अपेक्षा है ।
इसी बीच मधेश के लिए एक अच्छी खबर आई है, मधेशी आयोग के गठन की, किन्तु यह मधेश की समस्या और तकलीफ को कितना समझेगा और इसमें शामिल होने वाले सदस्य कितनी ईमानदारी से काम करेंगे यह देखना है और साथ ही सरकार कितनी ईमानदारी से इसे शक्ति प्रदान करने वाली है, विचारणीय प्रश्न यह भी है ।DSC_0008

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