बेटी नहीं पढ़ानाः शिक्षित बहू लाना कैसे ? : नरेन्द्र मोदी

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने १५ जनवरी को हरियाणा राज्य के पानीपत में आयोजित एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

था– ‘हम बेटियों को तो पढ़ाना नहीं चाहते लेकिन अपने घरों में अच्छी–खासी पढ़ी–लिखी बहू लाने की इच्छा रखते हैं । ’ ‘आखिर यह कैसे संभव होगा ?’ उन्होंने कहा ‘जो अपनी बेटी–बहनों को नहीं पढ़ाते उन्हें पढ़ी–लिखी बहू लाने का भी अधिकार नहीं है ? उन्होंने सवाल किया ‘यदि महिलाएं शिक्षित होने के अधिकार से वंचित रहीं तो फिर उच्च शिक्षा में उनकी पहुंच कैसे होगी ?’ इस प्रकार सवाल ही सवाल थे उनके भाषण में ।
कार्यक्रम का नाम था ‘बेटी बचाओ’ – ‘बेटी पढ़ाओ ।’ कार्यक्रम भारत की केन्द्र और हरियाणा की राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप में आयोजित किया गया था । कुछ ही महीने पहले सत्ता में आयी मोदी सरकार द्वारा यह कार्यक्रम शुरू किया गया है । मोदी सरकार ने भारत में व्याप्त ‘बेटी–भ्रुण हत्या’ और शिक्षा आदि अनेक क्षेत्रों में बेटियों के साथ किए जा रहे भेदभावों का अन्त करने के लिए, यह नया अभियान प्रारंभ किया है ।
भारत के कुछ राज्यों में अभी भी बेटा और बेटियों के बीच भारी भेदभाव विद्यमान है । शिक्षा देने के दौरान बेटा और बेटी के बीच भेदभाव बरता जाता है । इससे भी बढ़कर अकल्पनीय ‘बेटी–भ्रुण हत्या’ जैसा दुष्कर्म भी किया जा रहा है । मां के गर्भ में ही भू्रण के लिंग की पहचान की जाती है और यदि भ्रुण बेटी का है तो उसकी गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है । वास्तविकता तो यह है कि यह जघन्य अपराध, अज्ञात वैधानिकता पाता जा रहा है ।
भारत के कुछ समाज में अभी भी बेटा पाने की अत्यधिक इच्छा के कारण रोज बेटियां गर्भ में ही मारी जा रही हैं । यद्यपि, खुले रूप में इस कार्य ने मान्यता नहीं पाया है । फिर भी, सामान्य अस्पतालों एवं क्लीनिक में ‘गर्भ में ही लिंग पहिचान’ करने की तकनीक सहज ही उपलब्ध होने, गर्भ पतन के लिए बाप से भी बढ़कर मां के तैयार होने तथा इन कारणों से बेटियों की जन्म दर में भारी कमी आने से चिन्तित, भारत सरकार ने यह कार्यक्रम प्रारंभ किया है । भारत सरकार ने इस अभियान के लिए भारतीय सिनेमा जगत की जानी–मानी अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को सद््भावना दूत के रूप में नियुक्त किया है ।
प्रधानमंत्री मोदी ने उक्त कार्यक्रम ‘बालिका–भ्रुण हत्या’ जैसे जघन्य अपराध करनेवाले डाक्टरों पर व्यंग करते हुए कहा – ‘‘भू्रण हत्या कर पैसा कमानेवले डाक्टर सोचें कि क्या इस प्रकार के कुकृत्यों से आर्जित पैसा उन्हें ‘सन्तोष’ और ‘धन–सुख’ दे रहा है या नहीं’ ?’ उनका कहना था कि ‘डाक्टर तो मनुष्य की जान बचाने के लिए पढ़ाई किया करते हैं न कि उनकी जान लेने के लिए ।’
इस अवस्था के परिणामस्वरूप, भारत में लैंगिक असन्तुलन दिख चुका है । सन् २०११ की जनगणना के अनुसार छह वर्ष से कम उम्र की बाल–बालिकाओं की संख्या में से ‘‘एक हजार बालकों की तुलना में बालिकाओं की संख्या मात्र ९१४ है’’ । बताते हैं कि अब इधर के वर्षाें में तो बालिकाओं की संख्या में और अधिक कमी आयी है तथा बालिकाओं की संख्या लगातार घटती ही जा रही है । सन् २००१ में प्रति हजार बालकों के औसत में ९२७ बालिकाएं जन्म लिया करती थी जबकि जनसंख्या विशेषज्ञों का कहना है कि अब तो बालिका–जन्म में और अधिक कमी आती जा रही है । आंकड़ों के अनुसार इससे पहले अर्थात् २००१ में इस संख्या में इतना अधिक अन्तर नहीं था । योजना विशेषज्ञ इस अवस्था को स्वतंत्रता के बाद का सबसे अधिक ‘विस्फोटक लैंगिक असन्तुलन’ बताते हैं । उनका कहना है ‘यही अवस्था कायम रही तो अगले दो दशकों के बाद लड़कियां पाने के लिए ही लड़कों के बीच भारी मार–धार, उठा–पटक होना निश्चित है । सन् २०११ की जनगणना के अनुसार भारत में पुरुष की अपेक्षा महिला की जनसंख्या लगभग ६ करोड़ कम थी । यह अनुपात घटता ही जाएगा, ऐसा दिखता है ।
निवर्तमान प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह संसद को संबोधित करने के दौरान रो पड़े थे । उन्होंने कहा था ‘२१वीं शताब्दी के हम आधुनिक भारतीय अभी भी विज्ञान के विकास का दुरूपयोग करते हुए गर्भ के अन्दर ही जान बूझकर बेटियों की हत्या कर रहे हैं, इससे अधिक दुःखद घटना और कुछ भी नहीं हो सकती । पशु भी अपनी सन्तान को एक समान देखता है जबकि हम विवेकशील प्राणी, बेटा और बेटी में भेदभाव कर रहे हैं । ’
भारत में हर वर्ष कितनी बालिकाओं की हत्या की जा रही हैं, इसका पक्का आंकड़ा तो अभी भी उपलब्ध नहीं है । लेकिन, इस क्षेत्र के जानकारों के अनुसार हर वर्ष ५ से ७ लाख बालिकाओं की हत्या हो रही हैं । यह कार्य खुले रूप में तो नहीं दिखता है तथा अस्तपाल भी खुल्लमखुल्ला रूप में बोर्ड भी नहीं लटकाता है । फिर भी, अधिकांश अस्पतालों में भ्रुण हत्या के काम सहज और सस्ते में किए जा रहे हैं, ऐसा बताते हैं ।
मोदी सरकार का यह कार्यक्रम १२ जिलों में केन्द्रित है । इस कार्यक्रम के अन्तर्गत सद्भावना दूत के रूप में नियुक्त सिने तारिका माधुरी दीक्षित, बेटे–बेटी के बीच भेदभाव नहीं करने की चेतना जागृत करने का काम करेंगी । इसी प्रकार सरकार उक्त जिलों के गरीबों के आर्थिक सहयोगों की घोषणा भी की है । पहले चरण में चुने गए १२ जिलों में हरियाणा राज्य के जिलों की संख्या अधिक हैं । वे जिले हैं – रिवाड़ी, महेन्द्रनगर, भिवानी, झज्जर, अम्बाला, कुरूक्षेत्र और सोनीपत ।
इस कार्यक्रम के तहत मनोनीत जिलों के अति गरीब परिवारों में जन्म लेनेवाली बालिकाओं के साथ ही १० वर्ष से कम उम्र की अन्य बालिकाओं के नाम से भी, बैंकों में खाता खोलकर, उनमें प्रति बालिका १ लाख ५० हजार रूपये तक की राशि जमा करा दी जाएगी । उक्त राशियों पर कम से कम ९ प्रतिशत व्याज दिए जाने तथा उक्त ब्याजों पर किसी भी प्रकार का आयकर नहीं लगने की सुविधा सरकार ने दिया है । इस प्रकार का खाता किसी भी वाणिज्य बैंक में खोली जा सकती है । इन खातों को २१ वर्षाें तक बन्द नहीं किया जा सकेगा तथा खाताधारी बालिका १८ वर्ष की उम्र पूरा के बाद, उच्च शिक्षा खर्च हेतु उक्त खातों से राशि निकाल सकेगी । लेकिन, किसी भी हालत में ५० प्रतिशत रकम ही निकाले जाने का प्रावधान रखा गया है । सरकारी अधिकारियों को आशा है कि बालिकाओं के लिए लायी गई इस योजना से जहां एक ओर बालिकाओं की शिक्षा में योगदान मिलेगा, वहीं दूसरी ओर परिवार में बेटा के प्रति दृष्टिकोण में भी परिवर्तन होगा ।
हाल के दिनों में भारत में बढ़ते जनसंख्या असन्तुलन के कारण ‘जनसंख्या तथा योजना विशेषज्ञों’ के बीच, इसके निराकरण के लिए नई चर्चा शुरू हुई है । छोटे एवं सामान्य मशीनों के द्वारा कुछ ही मिनटों में भ्रुण की लिंग पहचानने तथा छ सौ से एक हजार रूपये में ही भ्रुण हत्या करने की सहजता के कारण, प्रतिदिन बेटियां गर्भ में ही मारी जा रही हैं । इस अवस्था को यदि नहीं रोका गया तो आनेवाले दिनों में भारत में युवकों के विवाह के लिए युवतियां ढूंढना कठिन हो जाएगा (स्रोतः न्यूज एजेन्सियां) ।
प्रस्तोताः रामाशीष

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