बेवजह की एकता बहस:लीलानाथ गौतम

Lila Nath Gautam

लीलानाथ गौतम

प्रचण्ड संविधानसभा छोड़ कर एकता करेंगे या वैद्य को संविधानसभा स्वीकार करा कर ?
गत फाल्गुन १ गते २०वीं जनयुद्ध दिवस मनाते वक्त पाँच माओवादी पार्टी ने पाँच  स्थान में कार्यक्रम रखा था । लेकिन एक महीना के बाद उक्त पाँच माओवादी पार्टी के नेता, एकता के नाम में एक ही मञ्च में दिखने लगे हंै । सत्ताधारी दल के विरुद्ध संयुक्त आन्दोलन घोषणा करने वाले ये पाँच माओवादी के बीच क्या सचमुच में ही पार्टी एकता हो रही है ? यदि एकीकरण प्रयास सच है तो प्रचण्ड संविधानसभा छोड़ने के लिए तैयार हो गए हैं या वैद्य लगायत अन्य माओवादी समूह संविधानसभा मानने के लिए ? इस प्रश्न का ठोस जवाब किसी के पास नहीं है । इसीलिए बहस तो हो सकती है, लेकिन माओवादी एकता होगी, यह विश्वास किसी को भी नहीं है । ekta
विशेषतः युद्धकालीन मुद्दा सम्बन्धी विषय को लेकर हाल ही में सर्वोच्च अदालत द्वारा किया गया फैसला ही माओवादी नेताओं को एक जगह जुटाने का कारण बना है । दूसरा, संविधानसभा निर्वाचन में लज्जास्पद पराजय होना, अपने ही अलग पार्टी बनाने वाले कमजोर होते जाना, राज्य के हर निकाय में कांग्रेस–एमाले का वर्चस्व रहना और माओवादी के लिए अपने अस्तित्व रक्षा करना ही प्रमुख चुनौती बनते जाना, आदि बहुत कुछ कारण को लेकर भी माओवादी पार्टी ‘एकता बहस’ में जुटी हुई है । एकता बहस के पीछे एक और राज भी है । वह यह है कि पार्टी एकता का हल्ला चला कर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करना । सभी माओवादियों में इस तरह का स्वार्थी तो नहीं हो सकता, लेकिन प्रमुख कहलाने वाले दो माओवादी के भीतर इस तरह के व्यक्ति सक्रिय हैं । एकता के पक्ष में तीव्र रूप में गतिशील भी ऐसे ही लोग हो रहे हैं । पार्टी एकता हो या नहीं, इस अफवाह फैलाने से सबसे ज्यादा फायदा में एमाओवादी तथा उसके अध्यक्ष प्रचण्ड ही हैं । संविधान निर्माण के सवाल में मजबूत बनते जा रहे कांग्रेस–एमाले गठबन्धन को इस अफवाह से हिला सकते हैं, ऐसा अनुमान प्रचण्ड का है । स्वयं प्रचण्ड को भी पता है– तत्काल पार्टी एकता सम्भव नहीं है । प्रचण्ड तथा एमाओवादी के लिए तो यह एकता तत्कालीन आवश्यकता भी नहीं हो सकती । माओवादी घटक में से सबसे बड़े दल को ही इसकी आवश्यकता नहीं है तो पार्टी एकता कैसे सम्भव हो सकेगी ?
हाँ, एक शर्त में पार्टी एकता हो सकती है । शर्त है– एकीकृत पार्टी का अध्यक्ष स्वयं प्रचण्ड को ही सुनिश्चित करवाना । जब तक इसकी कोई ग्यारेन्टी नहीं होगी, तब तक तो पार्टी एकता सम्भव नहीं है । स्मरणीय है, माओवादी के नाम में जितनी भी पार्टियाँ हंै, पार्टी से अलग होने वाले सभी ने कहा है कि इसका प्रमुख कारण अध्यक्ष प्रचण्ड तथा उनका नेतृत्व ही है । प्रचण्ड के कारण ही माओवादी पार्टी की दुर्गति हो रही है, ऐसा अनुभव पार्टी से अलग होने वाले सभी कर रहे हैं । इतिहास साक्षी है कि समय–समय में सरकार तथा पार्टी में प्राप्त होने वाले सम्भावित पद सम्बन्धी विवाद को लेकर बहस करना और पार्टी विभाजन करना माओवादी की नियति बन चुकी है । अभी एकता के लिए जो बहस हो रही है, उस में भी सिद्धान्त, मुद्दा, कार्यनीति तथा रणनीति आदि विषय में बहस होना कोई नयी बात नहीं है । जिस तरह का भी शब्दजाल बुन कर बहस किया जाए, फूटना और जुटना यह सभी घटना स्वार्थ के आसपास ही केन्द्रित है । इसलिए एकीकरण बहस सीमित बहस में सीमित रहने  की सम्भावना ज्यादा है । क्योंकि पार्टी विभाजित करने वाले सभी नेता पुनः प्रचण्ड का ही नेतृत्व स्वीकार करने वाले नहीं हंै और प्रचण्ड अपने पद छोड़ने वाले नहीं ।
वैसे तो अभी राजनीतिक सिद्धान्तवाद, कार्यदिशा, नेतृत्व आदि अनेक दृष्टिकोण से भी बहस हो रही है । पार्टी एकता के नाम में गठित वार्ता कमिटी ने दिखाने के लिए ही सही, एकता के लिए सात आधार बनाये हैं । सैद्धान्तिक और राजनीतिक आधार के नाम में तैयार किये गये उक्त एकता प्रस्ताव में मालेमावाद की रक्षा, प्रयोग और विकास का कार्यान्वयन, नेपाली क्रान्ति का स्वरूप, रणनीति, कार्यनीति और विकास, संसदवाद और संसद का उपयोग, प्रयोग सम्बन्धी विषय आदि उल्लेख हंै । इसी तरह सामाजिक क्रान्ति और रूपान्तरण के लिए बल प्रयोग का सिद्धान्त, उसका स्वरूप और कार्यान्वयन, विगत में हुए कमी–कमजोरी का ठोस मूल्यांकन और पार्टी सुदृढ़ीकरण, जनवादी केन्द्रीयता के सम्बन्ध में सृजित धारणा, मूल्यांकन और बहस को पार्टी एकता के लिए प्रमुख आधार माना गया है । लेकिन यह सब दिखाने के लिए अच्छा है, व्यवहार में कुछ भी कार्यान्वयन नहीं हो रहा है और होने वाला भी नहीं है ।
सिर्फ माओवादी के अन्दर ही नहीं, कम्युनिष्ट नामधारी हरेक पार्टी और नेताओं में वैचारिक स्पष्टता नहीं है । द्वैध चरित्र और क्रियाकलाप में ही वे लोग अपनी राजनीति की खेती चला रहे हैं । यह इतिहास द्वारा प्रमाणित सत्य है । सभी ने अपने स्वार्थ और अवसर के अनुसार ही कम्युनिष्ट दर्शन के सम्बन्ध में व्याख्या और बहस किया है । माओवादी एकीकरण के नाम में भी ऐसी बहस हो रही है । अभी तो विभिन्न समूह में विभाजित माओवादी ही इस समस्या से ज्यादा संक्रमित हो रहे हैं । इस अवस्था में उनका सैद्धान्तिक अड़ान क्या है, यह कोई नहीं समझ पाता । कार्यदिशा और रणनीति भी पूर्व–पश्चिम की ओर केन्द्रित है ।
माओवादी में से सब से बड़ा दल एमाओवादी चाहता है– संविधानसभा से संविधान जारी होना चाहिए । दूसरे बडेÞ दल कहलाने वाले नेकपा–माओवादी (वैद्य समूह) चाहता है– संविधानसभा भंग होना चाहिए और गोलमेच सम्मेलन मार्फत संविधान निर्माण करना चाहिए । नेत्रविक्रम चन्द नेतृत्व में रहे तीसरा माओवादी समूह, जो अपने को सबसे क्रान्तिकारी माओवादी भी बताते हैं, वह फिर एक बार क्रान्ति और जनविद्रोह करना चाहते हैं । ऐसी अवस्था में एकता के लिए बहस करने वाले प्रचण्ड, क्या संविधानसभा छोड़ने के लिए तैयार हैं ? यह तो सम्भव नहीं हैं । ऐसी अवस्था में पार्टी एकता कैसे सम्भव रहेगी ?
दूसरी तरफ प्रचण्ड का पार्टी एकीकरण सम्बन्धी बहस सिर्फ कांग्रेस और एमाले को दिखाने के लिए भी हो रहा है, ऐसी चर्चा भी हो रही है । प्रचण्ड का अनुमान है कि कांग्रेस–एमाले माओवादी पार्टी का एकीकरण नहीं चाहते हैं । ऐसी अवस्था में एकीकरण का बहस किया जाए तो कांग्रेस–एमाले को डरा कर माओवादी एजेण्डा को स्वीकार करने के लिए बाध्य बना सकते हैं । जिसके माध्यम से प्रचण्ड सत्ता और शक्ति का वार्गेनिङ भी कर सकते हैं । प्रचण्ड की इस तरह की मानसिकता के कारण भी एकता बहस ज्यादा चर्चा में आ रहा है ।
हाँ, यदि वास्तव में ही एकीकरण चाहने वाले माओवादी कोई है तो वह वैद्य समूह की नेकपा–माओवादी हो सकता है । क्योंकि नेत्रविक्रम चन्द्र विप्लव ने वैद्य का साथ छोड़ कर जब अपनी ही नयी पार्टी बना ली, उसके बाद वैद्य समूह एजेण्डा और मुद्दाविहीन अवस्था में पहुँच गया है । नयाँ जनवादी क्रान्ति का नारा लगाने वाले वैद्य के पास अब ऐसा कोई भी नारा नहीं है, जो वह अपने कार्यकर्ता बता सके । ऐसी अवस्था में वैद्य समूह ने ठान लिया है कि अब तो प्रचण्ड समूह के पास लौट कर जाना ही अपने लिए हितकर रहेगा । अर्थात् अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए भी वैद्य समूह एकीकरण के लिए तैयार हो सकता है । इतना होते हुए भी वैद्य समूह के सभी नेता पुनः प्रचण्ड के नेतृत्व स्वीकार करेंगे, यह तो हो ही नहीं सकता । इसका संकेत भी मिल चुका है ।
विप्लव समूह के अलवा मातृका यादव और मणि थापा के नेतृत्व में भी अलग–अलग माओवादी पार्टी अस्तित्व में है । जो अभी अपनी अस्तित्व रक्षा की लड़ाई लड़ रहा है । लेकिन ऐसी ही अवस्था में पार्टी एकता हो तो एकीकृत पार्टी के भीतर यादव और थापा का स्थान और अस्तित्व कहाँ रहेगा ? कोई निश्चित नहीं है । लेकिन पार्टी एकता नहीं होने से उन लोगों की अवस्था जैसी की तैसी ही रहेगी । इसीलिए मातृका और मणि समूह के लिए पार्टी एकता हो या नहीं, इससे खास अन्तर पड़नेवाला नहीं है । वैसे तो मातृका यादव की तुलना में मणि थापा एकता के लिए कुछ जल्दबाजी में दिखाई देते हैं । इसके पीछे एक कारण भी है । अन्य चार पार्टी की तुलना में थापा मूल पार्टी से सबसे पहले अलग हुए थे । इसीलिए पार्टी चलाने का अनुभव अन्य की तुलना में थापा को कुछ ज्यादा ही है । हो सकता है– उन को पता चल चुका है कि पार्टी चलाना और स्थापित करना, उतना सहज नहीं है । पार्टी के लिए आर्थिक स्रोत जुटाना और कार्यकर्ता का पालन–पोषण करना कम चुनौतीपूर्ण नहीं है । यह बात, थापा को मालुम हो चुकी है । इसीलिए हो सकता है कि थापा एकीकरण के लिए सकारात्मक है । पाँच माओवादी में से सबसे क्रान्तिकारी दिखनेवाले विप्लव समूह है । उक्त समूह में अभी दम्भ और भ्रम है कि सभी क्रान्तिकारी कार्यकर्ता हमारे ही पास हैं । इसीलिए उक्त समूह एकता के नाम में कुछ ज्यादा ही बहस और वार्गेनिङ करना चाहता है । लेकिन जितनी भी बहस और बार्गेनिङ हो जाए, यह सब स्वार्थ केन्द्रित ही रहेगा । जिसके चलते भी एकता उतनी सहज नहीं दिखाई देती ।
लेकिन एक बात तो सच है कि सभी माओवादी के पास एक डर है । वे समझते हैं कि अगर एकता नहीं हो जाए तो अपना राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है । इसीलिए सभी माओवादी एकता के लिए बहस करने के लिए बाध्य हैं  । कारण है कि कोई भी माओवादी नेकपा एमाले को कम्युनिष्ट पार्टी स्वीकारने के लिए तैयार नहींं है । लेकिन वही पार्टी अभी सबसे बड़ा कम्युनिष्ट पार्टी के रूप में संसद में हैं । विभिन्न टुकड़ो में विभक्त माओवादी के बीच अगर एकता नहीं हो तो भविष्य में एमाले का ही वर्चस्व कायम रहने वाला है । कम्युनिष्ट के नाम में एमाले को नापसन्द करने वाले पाँच माओवादी के लिए यह बड़ी चुनौती है । कांग्रेस को पराजय करने का सपना हो या नहीं, लेकिन एमाले से कमजोर होने का डर माओवादी में हैं । इसके कारण भी एकता–बहस जबरदस्त चल रही है । यह डर और बहस से कालान्तर में नेता–नेता के बीच एकता हो सकती है, लेकिन कार्यकर्ता और जनता का मन जीतना इतना सहज नहीं है । क्योंकि युद्धकालीन सभी इमानदार कार्यकर्ता अभी माओवादी के पास नहीं है । विभिन्न पार्टी से माओवादी प्रवेश करने वालों से कभी भी पार्टी मजबूत नहीं होगी । दूसरी बात माओवादी के पास जनता का वर्गीय धरातल भी नहीं है । उच्च वर्ग कांग्रेस के पास है तो मध्यम वर्ग एमाले के पास । निम्न वर्गीय जनता का विश्वास माओवादी खो चुका है । इसीलिए अभी माओवादी विभिन्न जातीय नारा को ही अपने राजनीतिक मुद्दा बना रहा है । जातीय मुद्दा क्षणिक काल के लिए प्रभावकारी दिखाई भी दे रहा है, लेकिन दीर्घकालीन राजनीति के लिए यह नारा ठीक नहींं है । यह बहस स्वयं माओवादी के भीतर भी चल रहा है । इसी तरह नेताओं सामन्ती जीवनशैली, मुद्दा और दिशाहीन राजनीतिक यात्रा, लगायत कुछ और कारण भी हंै, जिसके चलते जनता माओवादी से दूर होते जा रहे हैं, जो माओवादी के प्रति पुनः विश्वास करने में सौ बार सोचेंगे ।
दूसरी संविधानसभा निर्वाचन में जनता ने कांग्रेस–एमाले को जिताया है । इसका मतवल यह नहीं है कि जनता कांग्रेस–एमाले को चाहती है । कारण तो यह है कि जनता माओवादी को नहीं चाहती है । वास्तव में नेपाली जनता स्थायी रूप में कांग्रेस–एमाले तथा माओवादी, किसी के प्रति सन्तुष्ट नहीं है । ऐसी अवस्था में अगर कोई तीसरी राजनीतिक शक्ति आ जाए तो जनता उसी को समर्थन करेगी । अर्थात् जनता तीसरी नयी शक्ति तलाश रही है । इस सत्य को माओवादी के कुछ नेता समझते हैं, लेकिन उसके अनुसार वे अपने को सुधार नहीं रहे हैं । किसी के लिए एकता बहस के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है ।
और एक बात, नेकपा एमाले के अध्यक्ष केपी ओली ने बहुत बार युद्धकालीन मुद्दा को लेकर माओवादी नेता को ‘अन्तर्राष्ट्रीय अदालत हेग’ पहुँुचाने की बात कहा है । ओली शक्तिशाली और माओवादी कमजोर होते जा रहे हैं ऐसी ही अवस्था में सर्वोच्च अदालत ने युद्धकालीन मुद्दा सम्बन्धी एक फैसला किया है । ओली की बोली और सर्वोच्च अदालत के फैसले की तुलना करते हुए माओवादी नेता सशंकित भी हो रहे हैं । अन्तर्राष्ट्रीय अदालत ‘हेग’ के डर के कारण भी माओवादी पार्टी एकता–बहस के लिए बाध्य हैं । इसी का परिणाम है– पाँच माओवादी द्वारा घोषित संयुक्त आन्दोलन ।
हाँ एकता की वास्तविक आवश्यकता और चाहना निचले तह के कार्यकर्ताओं को हो सकती है । अभी भी माओवादी के प्रति आस्थावान कार्यकर्ता चाहते हैं कि पार्टी एकीकरण हो जाए तो हम फिर पार्टी शक्तिशाली बना सकते हैं । यह सपना जायज भी है । इसके लिए तो नेतृत्व तह में स्वार्थरहित सहमति बनना चाहिए । संविधान निर्माण में सहमति चाहने वाले माओवादी, क्या पार्टी एकीकरण के लिए सहमति कर सकते हैंै ? हर समय अपने आप को ही शक्ति और नेतृत्व में रखने वाले नेता, क्या कार्यकर्ताओं की भावना को सम्बोधन कर सकते हैं ? जब तक वर्तमान संविधानसभा द्वारा संविधान निर्माण होने का आधार बरकरार रहेगा और प्रचण्ड नेतृत्व त्यागने के लिए तैयार नही होंगे, तब तक पाँच माओवादी के बीच सार्थक एकीकरण सम्भव नहीं दिखाई देता । बहस तो जितनी भी कर सकते हैं !

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