बोली

बोली

अयोध्यानाथ चौधरी

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क्याें मारते हो मरते हुए को ?
बोली को गोली से मत दबाओ
बोली को बोली से चुप करो
महज बोली से बेचैन हो गए
एकबार………….
तुम्हारी बोली का भी अपहरण हुआ था
याद है ना वो दिन
भलीभाँति याद करो
और तुम आग हो गए थे
तुमने आग उगला था

और उसी दिन………
गोली चलाने वाले का महल थर्रा गया था
तुम्हारी बोली को दबाया न जा सका
फिर तुमने……….
अतिरिक्त खुशी का इजहार किया था
गगनभेदी नारा लगाकर

राम गोपाल आशुतोष भाई ने
एक कविता लिखी है
‘इतिहास न जाननेवालो के नाम’
आज मैं उनकी कुछ पंक्तिया
कृतज्ञतापूर्वक उधार ले रहा हूँ,
“जानते हो अंसतुष्ट होने के बाद क्या होता
जानते हो ‘किनारी कृत’ होने की पीड़ा
बाढ़ जैसी हिंसात्मक होती है
‘पहिरो’ जैसी विध्वंसात्मक होती है”
मरता क्या नही करता
करोंड़ो मे कोई एक
अनसन करने का सामथ्र्य रखता है ।
क्रमशः….
वह बहुत कमजोर हो जाता है
और तुम उसे मार डालते हो,
इसीलिए न …….. अगर
वह जिन्दा रहेगा तो बोलेगा ।

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