ब्रिटिशों को बुरी तरह फेल किया था ‘असहयोग आन्दोलन’, अब बारी मोर्चा की, देखें क्या रंग लायेंगें ?

vijay-morcha
विजय यादव
काठमांडू, २४ मार्च ।

भारत की स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में असहयोग आन्दोलन का एक विशिष्ट महत्व है । १९१५ में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद महात्मा गाँधी ने भारतीय राजनीतिक परिस्थिति का अध्ययन किया ।
और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जब तक भारतीय राजनीतिक बागडोर को मुट्ठी भर अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों के चंगुल से मुक्त कराकर उसे जन आंदोलन का रूप नहीं दिया जाएगा । तब तक स्वतंत्रता की प्राप्ति असंभव है ।
अत : उन्होने स्वतंत्रता आंदोलन को जन आंदोलन बनाने पर जोर दिया प्रथम विश्व युद्ध में भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार को अपनी सहायता प्रदान की थी और सरकार ने यह आश्वसन दिया था कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य दिया जाएगा ।
लेकिन ऐसा नहीं किया गया इसी समय रालेक्ट एक्ट का सृजन किया गया इसी के फलस्वरुप जालियांवाला बाग की दूर्घटना घटी इन सब कारणों के चलते महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार के साथ असहयोग की नीति अखतियार की और १९२० में असहयोग आंदोलन प्रारम्भ किया था ।

 

सितम्बर १९२० से फरवरी १९२२ के बीच महात्मा गांधी तथा भारतीय राष्ट्रिय काँग्रेस के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चलाया था, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई जागृति प्रदान की थी ।

 

मधेशी मोर्चा सहित कें गठबन्धनों के असहयोग आन्दोलन

नेपाली राजनीति में भी असहयोग आन्दोल का दौड चल रहा हैं । एक सप्ताह पहले ही संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चा और संघीय गठबन्धन ने तराई–मधेस के जिलें में निर्वाचन–असहयोग आन्दोलन करतें आ रहें हैं ।

 

संविधान संशोधन के बाद ही चुनाव करनें के बातों को कहतें आ रहें मार्चा और गठबन्धन ने बिती शुक्रबार से निर्वाचन–असहयोग आन्दोलन कर रहें हैं पर अभि तक कोइ फाइदा नहीं हुआ हैं ।

 

मोर्चा ने स्थानीय तह के साइन बोर्ड हटाते आ रहें और निर्वाचन आयोग के कर्मचारीओं को किसी भी तरह कें काम न करनें के लिए दबाब देते आ रहें हैं । साथ ही विभिन्न सरकारी कार्यालयाें में नेपाल सरकार कें बोर्ड हटाकर मधेश सरकार कें बोर्ड लगाकर आन्दोलन कर रहें हैं ।
सद्भावना पार्टी के नेता लक्ष्मणलाल कर्ण नें कहा हैं कि मधेश के सभी जिलें और नगर के बोर्ड हटादेंगें । साथ ही गठबन्धन के संयोजक उपेन्द्र यादव नें भी जनअवज्ञा तथा असहयोग आन्दोलन में कर रहें हैं ।
गठबन्धन के मुताबिक कल सें अर्थात चैत १२ गते स्थानीय तह के निर्वाचन प्रादेशिक क्षेत्राधिकार कें अन्दर क्यों कहेंगें ? शिर्षक मे जिला जिला में कार्यक्रम करेंगें । चैत १४ गते स्थानीय तह के प्रतिवेदन जलाने के साथ साथ चैत १५ से २१ त्क विभिन्न जिलों में विरोधसभा करनें के बात जनाइ हैं । अब देखना यें हैं की मोर्चा के असहयोग आन्दोलन क्या रंग लायेंगें ।
जलियांवाला बाग नर संहार सहित अनेक घटनाओं के बाद गांधी जी ने अनुभव किया कि ब्रिटिश हाथों में एक उचित न्याय मिलने की कोई संभावना नहीं है इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार से राष्ट्र के सहयोग को वापस लेने की योजना बनाई और इस प्रकार असहयोग आंदोलन की शुरूआत की गई और देश में प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रभाव हुआ । यह आंदोलन अत्यंत सफल रहा, क्योंकि इसे लाखों भारतीयों का प्रोत्साहन मिला । इस आंदोलन से ब्रिटिश प्राधिकारी हिल गए थें ।
असहयोग आन्दोलन के उद्देश्य के सम्बंध में गाँधी जी ने कहा था कि, हमारा उद्देश्य है स्वराज्य । यदि संभव हो, तो ब्रिटिश साम्राज्य के अंर्तगत और यदि आवश्यक हो, तो ब्रिटिश साम्राज्य के बाहर ।
असहयोग आन्दोलन प्रथम राष्ट्रव्यापी आन्दोलन था, जिसमें समस्त भारत की जनता ने उत्साह से भाग लिया था । मुस्लिम लीग का खिलाफत आन्दोलन भी असहयोग आन्दोलन के साथ था ।

 

असहयोग आन्दोलन का प्रमुख उद्देश्य था, ब्रिटिश भारत की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक संस्थाओं का बहिष्कार करना और शासन की मशीनरी को बिलकुल ठप्प करना । असहयोग आन्दोलन सफल बनाने के लिये कई कार्यक्रम आयोजित किये गये । जैसे कि–
१ । सरकारी उपाधियाँ, वैतनिक तथा अवैतनिक पदों का त्याग ।
२. सरकारी उत्सवों अथवा दरबारों में सम्मलित न होना ।
३. सरकारी एवं अर्द्ध सरकारी स्कूलों एवं का‘लेजों का त्याग ।
४. १९१९ के अधिनियम के अन्र्तगत होने वाले चुनावों का बहिष्कार ।
५. सरकारी अदालतों का बहिष्कार ।
६. विदेशी माल का बहिष्कार ।

यहाँ ये जानना आवश्यक है कि, असहयोग आन्दोलन का आगाज आखिर हुआ क्यों ? जबकि जब गाँधी जी राजनीति में आये थे, तब वे ब्रिटिश शासन की त्रुटियों के प्रति सचेत होते हुए भी उनकी न्याय प्रियता पर विश्वास रखते थे ।

 

प्रथम विश्व युद्ध में सम्भवतः गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार को सहयोग देने की अपील जनता से की थी । दरअसल ब्रिटिश वादों के अनुसार गाँधी जी एवं जनता को ये विश्वास था कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में लोकतंत्र कायम होगा किन्तु ऐसा नही हुआ । जिसकी वजह से गाँधी जी को सहयोग के स्थान पर असहयोग का मार्ग अपनाना पडा ।
असहयोग आन्दोलन के और भी अन्य कारण थे। जैसे कि, माण्टफोर्ड सुधार घोषणाओं ने स्वराज के वचन को तोड दिया । ये भारतीयों को अपमानजनक लगा । तिलक ने कहा था कि, हमें बिना सूर्य का सवेरा दिया गया है ।

 

युद्धकाल में अत्यधिक खर्च से भारत की आर्थिक दशा कमजोर हो गई थी, फिरभी अंग्रेजों ने भारतीयों का आर्थिक शोषण किया । १९१८ के रोलेट एक्ट के नियम भी इस आन्दोलन का कारण बनें । रोलेट एक्ट को भारतीयों ने काले कानून की संज्ञा दी थी । जलियावाला बागकांड तथा हंटर समिति की रिपोर्ट ने असहयोग आन्दोलन में आग में घी का काम किया ।
असहयोग आन्दोलन नें राष्ट्रीय असंतोष के प्रवाह को और तीव्र कर दिया । असहयोग आन्दोलन में कांग्रेस के आह्वान पर भारत की जनता हर तरह से साथ थी । गाँधी जी ने कहा था कि, आन्दोलन पूरी तरह अहिंसक होना चाहिये किन्तु फरवरी १९२२ में चौरी–चौरा काण्ड की वजह से असहयोग आन्दोलन को स्थगित करना पडा ।

 

वास्तविकता में असहयोग आन्दोलन जितने दिन भी चला उसने ब्रिट्रिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी । नेहरु जी ने इस आन्दोलन के उत्साह पर कहा था कि, जेल भर गई थी । वातावरण में बिजली भरी हुई थी और चारो ओर गङगङाहट हो रही थी, ऐसा जान पड रहा था कि, अन्दर ही अन्दर क्रान्ति हो रही थी ।

 

असहयोग आन्दोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की जडों पर प्रहार किया था । असहयोग आन्दोलन के दौरान भारत में राष्ट्रीय एकता का अद्भुत वातावरण बना था । सचमुच, असहयोग आन्दोलन एक अद्भुत और अनोखा आन्दोलन था ।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz