सहयोग पर शंका नहीं, भविष्य की चिन्ता करें : डा. श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति

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देश जिस वक्त विनाश की स्थिति से उबरने की कोशिश कर रहा था, उसी समय पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता ने एक और विवाद को जन्म दे दिया था । अफरातफरी के उस माहौल में भी एक पक्ष ऐसा था, जो सहयोग और सद्भावना की ऐसी व्याख्या कर रहा था, जो चाहे–अनचाहे वातावरण में विष घोलने का काम कर रहा था । हमारी संस्कृति कहती है कि किसी ने आपकी मदद एक प्रतिशत की है, तो उसे आप सौ प्रतिशत समझें । किन्तु हमने क्या किया ? सद्भावना, सदाशयता और सहयोग देने वाले मित्र राष्ट्र की भत्र्सना की और विपत्ति के समय त्वरित निर्णय लेने वाले का पुतला जलाया । क्या यही हमारी संस्कृति है ? हम क्यों भूल गए कि आपदा के आधे घंटे भी नहीं गुजरे थे और भारत ने सहयोग करने का निर्णय ही नहीं लिया For Shwata Aritcle (2) For Shwata Aritcle (3) For Shwata Aritcle (1)बल्कि उसका कार्यान्वयन भी किया । पीडि़तों के आँसू पोछे, उनके लिए सहयोग का हाथ बढ़ाया और उनके साथ खड़ा रहा । भारतीय प्रधानमंत्री ने तत्काल नेपाल के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से बात की और हर सम्भव सहयोग देने की प्रतिबद्धता जताई । पहली भारतीय वायुसेना विमान नेपाल के लिए राहत सामग्री लेकर ६ घन्टे के भीतर आ गई थी । १० एनडीआरएफ टीम, एक सेना इंजीनियरिंग टास्क फोर्स, १८ सेना चिकित्सा इकाइयों को भारत सरकार ने हमारी सहायता हेतु २४ घन्टे के भीतर भेजा । उस वक्त की स्थिति की भयावहता को हमारे जेहन ने भुलाया नहीं है । उस वक्त की इस सहायता ने हमारी डूबती नब्ज को जिन्दा रखा था । हमारे नेता स्वयं असमंजस की स्थिति में थे, शायद यह उस वक्त का तकाजा था कि वो भी संज्ञाशून्य हो गए थे । इस भयंकर विपत्ति का सामना करने के लिए  हमारे स्रोत, साधन, और क्षमता सभी अक्षम थे । तत्कालीन उद्धार और राहत के लिए तत्काल दुर्गम जगहों पर जाना आवश्यक था । पर हमने देखा कि हमारी सरकार और सरकारी तंत्र असमंजस और असमर्थ अवस्था में थी । किन्तु भारतीय प्रधानमंत्री की नजर हर परिस्थिति पर थी । भारत में केबिनेट सचिव की अध्यक्षता में राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति की बैठक बुलाई जा रही थी । सभी चिन्तित थे और सहयोग के लिए तत्पर भी, मानो प्रकृति की कुदृष्टि नेपाल में नहीं भारत पर पड़ी हो ।
भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल के ७०० से अधिक अधिकारी बस पार्क, गौरीशंकर गेस्ट हाउस, व्हाइट गुम्बा, स्यूचाटार, गोगुबु, संगमटोल, बृजेश्वरी, शोभा भगवती पुल, बालाजु, तिलगंगा, साँखु में तैनात किए गए थे । नेपाल सेना प्रमुख विनोद श्रेष्ठ के साथ मिलकर कितनों का जीवित उद्धार किया, मृत शरीरों को निकाला । छः स्थानों में एनडीआरएफ ने चिकित्सा शिविरों की व्यवस्था की और घायलों का उपचार किया । भारत में संकट प्रबन्धन मशीनरी को स्थापित किया और संचार लिंक को जोड़ा । सी–१७, सी–१३०, आइएल–७६ और भारतीय वायुसेना के ३२ से अधिक उड़ानों की सहायता से भोजन सामग्री, कम्बल, पानी, बेबी खाद्य, चिकित्सा सामग्री, इंजीनियरिंग और संचार उपकरण आदि को यहाँ लाया गया । एम्बुलेन्स, ऑक्सीजन, जेनरेटर, १८ मेडिकल टीम, १८ सेना इंजीनियरिंग टीम और नेपाल सेना के साथ मिलकर राहत और उद्धार के कार्य में अपना भरपूर सहयोग दिया है और यह सहयोग आज तक जारी है । सहयोग की इन सब बातों को यहाँ दुहराने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि किसी एक पक्ष के सहयोग का यहाँ बखान किया जा रहा है । हमने देखा कि विपत्ति की इस घड़ी में दो विपरीत दिशा में चलने वाले देश भारत और चीन ने मिलकर उद्धार कार्य में हाथ बँटाया । किन्तु भारत की भूमिका पर जो प्रश्न चिह्न लगाए गए, उसकी वजह से यह कहने की आवश्यकता पड़ी कि आखिर हम क्यों उस सहयोग को अनदेखा कर गए जिसने हर तरह से हमारी सहायता की । सहयोग को अनदेखा कर हमने कई विवादों को जन्म दिया । कभी विमानस्थल की व्यवस्था बिगड़ने की बात सामने आई, तो कभी सिर्फ अपनों की सहायता करने का आरोप लगाया गया । किन्तु सोचने वाली बात यह है कि, क्या बेवजह हेलीकॉप्टर या हवाई जहाज आए थे ? जो भी आए वो राहत सामग्री लेकर आए और यहाँ से भारतीय पर्यटक और अन्य लोगों को लेकर गए । अगर ऐसा नहीं करते तो क्या उन्हें यहाँ फँसा रहने दिया जाता ? पूर्व काठमान्डू और पूर्व पोखरा से लगभग हजारों पर्यटकों और नेपालियों का उद्धार किया गया  । जिसमें नेपाली सेना का पूरा सहयोग इन्हें मिला । बारपाक और अन्य दुर्गम स्थानों पर जहाँ उस वक्त जाना सहज नहीं था वहाँ जाकर भारतीय सेना ने सहायता सामग्री पहुँचाई, मलबों में दबे लोगों को निकाला, लाशों को निकाला । किन्तु यह सब एक क्षण में भुला दिया गया । भारतीय मीडिया की भूकम्प सम्बन्धी प्रस्तुति और चंद ऐसे भारतीय पत्रकार जो विवादित बयान देकर ही सुर्खियों में रहना चाहते हैं, उनके बयानों का आसरा लेकर जमकर भारत विरोधी नारे लगाए गए, भारतीय प्रधानमंत्री के पुतले जलाए गए । क्या ये शोभनीय था ? यह आक्रोश उस वक्त सामने क्यों नहीं आया जब राहत सामग्री के साथ बाइबल बाँटा गया, जब खाद्य पदार्थों में गोचर्बी और गोमाँस शामिल होने की बात सामने आई । क्या ये हमारे धर्म, हमारी संस्कृति के खिलाफ नहीं था ? उस वक्त कोई प्रदर्शन, कोई पुतला क्यों नहीं जला ? विध्वंश की जो कहानी भारतीय मीडिया ने दिखाई, यह उसी का प्रभाव था कि हर ओर से सहायता के हाथ तत्काल बढ़े । विश्व के हर कोने में हमारी स्थिति तुरन्त पहुँची । नेपाली मीडिया जिन खबरों तक पहुँच नहीं पा रही थी, उन खबरों को जन–जन तक भारतीय मीडिया ने पहुँचाया । भारत की अरबों जनसंख्या हमसे और हमारी तकलीफ से परिचित हुई और हर प्रांत हमारी सहायता के लिए आगे आया । काठमान्डू में लंगर डाले गए हजारों की संख्या में पीडि़तों को भोजन उपलब्ध कराया गया । भारतीय दूतावास की ओर से जगह–जगह पर खाने की व्यवस्था की गई स्वयं भारतीय राजदूत महोदय ने शिविरों में जाकर व्यवस्था का जायजा लिया और हम ये सब भूल गए । किसी एक की गलती की सजा सबको तो नहीं दी जा सकती है । वर्षों से जो भारत के प्रति एक विरोधी भावना यहाँ के चंद जनमानस में पनपती रही है, उन्हें यह सहन नहीं हुआ कि, अचानक भारत विरोधी उस भावना का अंत हो जाय जिसे वर्षों से वक्त–वे–वक्त जिन्दा किया जाता रहा है, और विरोध की अग्नि को भड़काने के लिए उसे हवा दी जाती रही है । यही वजह थी कि एक कमजोर से मुद्दे को हवा देकर सहयोग की धार को मोड़ दिया, उन्होंने विरोध की ओर । यह राष्ट्रीयता की भावना सिर्फ भारत के सम्बन्ध में ही उभर कर क्यों आती है ? उस वक्त क्यों नहीं उभरती जब अन्य पड़ोसी मित्र हमारी भावनाओं से खेलते हैं और हमारी परम्परा तथा संस्कृति का मखौल उड़ाते हैं ? जनता उद्धार की प्रतीक्षा में मर रही थी और ऐसे में देश की सुरक्षा और राष्ट्रीयता का हवाला देकर विदेशी सहयोग को ठुकराया जा रहा था । नेपाल और नेपाली शान से कहते हैं कि यही एक देश है जिसका कोई दुश्मन नहीं है तो फिर आने वाले हर सहयोग को शंकित निगाहों से क्यों देखा जा रहा है ? माने या ना माने किन्तु विपत्ति में ही मित्र और विरोधियों की पहचान होती है । पड़ोसी बदले नहीं जा सकते और हमारे सुख दुख में वही हमारे साथ होते हैं ।
खैर, आज की परिस्थिति में इन बेवजह के पचड़ों मे न पड़ कर देश को फिर से मूल धार में लाने की कोशिश की जानी चाहिए । आज हर ओर सिर्फ और सिर्फ चुनौतियाँ हैं । जिनका सामना सरकार और जनता दोनों को धैर्य और सहनशीलता के साथ करना है । प्रकृति ने जिसे क्षण में नेस्तनाबूत कर दिया उसे फिर से आकार देने में वक्त तो लगेगा । किन्तु सरकार की ओर से जिस रफ्तार से कदम आगे बढ़ रहे हैं, वह जनता को आशान्वित नहीं कर पा रहे हैं । हम वृहत नवनिर्माण, पुनर्निमाण की बात कर रहे हैं । हमारे सामने चुनौती है एक नए नेपाल के निर्माण की । दस वर्ष लम्बे माओवादी द्वन्द्वकाल में तहस–नहस हुए नेपाल की अर्थव्यवस्था अभी सुधर ही रही थी कि भूकम्प ने देश को और भी कई वर्ष पीछे धकेल दिया । कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह पाया है । इसलिए सरकार के सामने चुनौतियों की कमी नहीं है । सबसे पहली जरुरत अगर कुछ है तो वह है पुनर्वास की । मौनसून दस्तक देने वाला है, ऐसे में जो अब तक खुले मैदानों में, त्रिपालों में जीवन यापन कर रहे हैं ,उन्हें सुरक्षित जगहों पर बसाने की आवश्यकता है । विकास निर्माण और आवास व्यवस्थापन में पूर्व में जो गलतियाँ हुईं हैं उन्हें सुधारने का यही अवसर है । नेपाल विश्व में भौतिक पूर्वाधार और विकास की दृष्टि से अत्यन्त पिछड़ा हुआ है और ऐसे में आज के परिवेश में अपनी पुरानी सोच के साथ आगे बढ़ने से सम्भावनाओं के द्वार नहीं खुलने वाले हैं । इसमें परिवर्तन की आवश्यकता है । एक ऐसे अभियान की आवश्यकता है जो व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समग्रता के साथ राष्ट्रहित के लिए हो । विश्व समुदाय सहायता करने को तैयार है परन्तु सही कार्यनीति न होने की वजह से बात आगे नहीं बढ़ रही है । देश के सामने एक अच्छा अवसर है जिसका फायदा लिया जा सकता है । दातृ संगठन द्वारा दिए गए राशि से नए नेपाल की परिकल्पना को साकार रूप दिया जा सकता है ।  राहत व्यवस्थापन का काम सही तरीके से नहीं होने के कारण ही अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय सरकार की एक द्वार प्रणाली पर यकीन नहीं कर पा रही है । हो सकता है कि नीतिगत रूप में इसके फायदे हों किन्तु हमारे नेताओं की जो अन्तर्राष्ट्रीय छवि है यह शायद उसी का परिणाम है कि घोषित अनुदान राशि पर्याप्त मात्रा में जमा नहीं हो पा रही है । सरकार को आत्मविश्लेषण करना होगा और दातृ संगठन को विश्वास दिलाना होगा तभी नेपाल एक बार फिर सँवर सकता है । वैसे सरकार ने विपत व्यवस्थापन करने के लिए दक्ष जनशक्ति साधन स्रोत सम्बन्धी प्रभावकारी राष्ट्रीय विपत व्यवस्थापन संरचना का निर्माण किया है । दलों की मान्यता है कि भूकम्प पीडि़त की पुनसर््थापना और पुनर्निमाण का काम पारदर्शी होना चाहिए । समिति के संयोजक प्रधानमंत्री ने भी कहा कि सहमति, सहकार्य, एकता और मेलमिलाप की भावना द्वारा ही हम इस विपत्ति का सामना कर सकते हैं । उन्होंने सदस्यों से यह आशा जताई कि वो एकताबद्ध होकर सहकार्य करेंगे । जनता उम्मीद पर जीती है कि, उनका कल बेहतर होगा और जनता के कल को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी सरकार और सरकारी प्रतिनिधियों की होती है । नजरें उनपर टिकी हुई हैं । किन्तु जिस द्रुत गति की अपेक्षा सरकार से है वह नजर नहीं आ रही ।
नेपाल प्राकृतिक सौन्दर्य का देश है और यही प्राकृतिक सौन्दर्य यहाँ के कई क्षेत्रों में जीविका का आधार है । आर्थिक दृष्टिकोण से चरमराई व्यवस्था को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए सरकार को इस ओर तत्काल ही ध्यान देना होगा । पर्यटन की सम्भावनाएँ आज भी बरकरार हैं । प्रकृति ने सौन्दर्य का जो अकूत भण्डार देश को दिया है वह आज भी जीवित है । सरकार उसका कैसे उपयोग करे यह तय करने की आवश्यकता है । विगत में भी अनुदान राशि मिलती आई है और उनका या तो बन्दरबाँट हुआ है या फिर वो फ्रिज हो गया है । यह हमारी नाकामी रही है । इन सबका विश्लेषण किया जाना चाहिए । गोरखा के बारपाक के एक युवक ने कहा था भूकम्प ने हमारे घरों को उजाड़ा है किन्तु, यहाँ की पर्यटकीय सम्भावनाएँ, प्राकृतिक सौन्दर्य और हमारे संकल्प को नहीं उजाड़ पाई  है । अब हम यहाँ के पर्यटन को पुनर्जीवित करेंगे । यह सिर्फ एक अभिव्यक्ति नहीं है, यह प्रण है फिर से खुद को स्थापित करने की और यही प्रण सरकार को भी लेनी होगी । पिछली गलती से सीख लेनी होगी । क्योंकि विगत का इतिहास बताता है कि भूकम्प की दृष्टिकोण से अत्यन्त जोखिमपूर्ण होने के बावजूद सरकार और जनता दोनों की ओर से लापरवाही की गई है । प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया गया है । प्रकृति के साथ समन्वयात्मक और सृजनात्मक सम्बन्ध को न रखकर ध्वंसात्मक सम्बन्ध पर केन्द्रित किया गया है । प्राविधिक ज्ञान होने के बावजूद प्रकृति द्वारा निर्धारित परिधि और नियम का उल्लंघन किया गया है । व्यक्तिगत स्रुवार्थ के लिए प्रकृति को चुनौती दी गई और उसका परिणाम आज सामने है। वन क्षेत्र का विनाश और बेतरतीब बहुमंजिली इमारतों ने पर्यावरण और धरती दोनों को कमजोर कर दिया है। वक्त रहते इस परिस्रिुरुथति की ओर ध्यान देना होगा और जनता में चेतनामूलक कार्यक्रम चलाकर भावी आपदा से अवगत कराना होगारु। इसमें सरकार की अहम भूमिका तो है ही, उसके साथरुसाथ संचार माध्यम को भी सजगता के साथ आगे आना होगारु। इस महाभूकम्प ने हमें हमारी प्रकृति और अर्थ राजनीतिक संरचना के बीच के सम्बन्ध को नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर दिया है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हमें क्या करना है, क्या एक बार पुनः प्रकृति के साथ खिलवाडरु करना है और अपने संतति के भविष्य को खतरे में डालना है या फिर प्रकृति की चेतावनी को समझते हुए उससे समन्वय स्रुरुथापित कर अपनी संतति को सुरक्षित रखना है।वार्थ के लिए प्रकृति को चुनौती दी गई और उसका परिणाम आज सामने है । वन क्षेत्र का विनाश और बेतरतीब बहुमंजिली इमारतों ने पर्यावरण और धरती दोनों को कमजोर कर दिया है । वक्त रहते इस परिस्थिति की ओर ध्यान देना होगा और जनता में चेतनामूलक कार्यक्रम चलाकर भावी आपदा से अवगत कराना होगा । इसमें सरकार की अहम भूमिका तो है ही, उसके साथ–साथ संचार माध्यम को भी सजगता के साथ आगे आना होगा । इस महाभूकम्प ने हमें हमारी प्रकृति और अर्थ राजनीतिक संरचना के बीच के सम्बन्ध को नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर दिया है । अब यह हम पर निर्भर करता है कि हमें क्या करना है, क्या एक बार पुनः प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना है और अपने संतति के भविष्य को खतरे में डालना है या फिर प्रकृति की चेतावनी को समझते हुए उससे समन्वय स्थापित कर अपनी संतति को सुरक्षित रखना है ।

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