भारतीय नाकाबंदी दिखाने के चक्कर में ओली सरकार के सारे दांव उलटे पड़ गये : मुरलीमनोहर तिवारी

मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), बीरगंज, १८ नोभेम्बर |

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सौ दिन के मधेश आंदोलन में कई उतार-चढ़ाव आएं। कई नायक खलनायक बन गए और कई वक़्त की नज़ाकत और आंदोलन के रुख अनुसार ख़ुद को मधेश मैत्री दिखाने के युक्ति में लग गए। आंदोलन ने सुबह के नाश्ते में गच्छेदार को निगल लिया। दोपहर के खाने में पहाड़ी दल के मधेशी सांसद को खाया। शाम के चाय-नास्ते में कांग्रेस को चीखना की तरह चबाया। अब लगता है रात के खाने में नेपाल को ही ना खा जाएं।

मधेश के लिए बड़ी-बड़ी डींगें हाँकने वाले अमरेश सिंह और बिमलेंद्र निधि किस बिल में छुप गए, पत्ता ही नहीं चला। अभी तक पहाड़ी दल के मधेशी सांसद मधेश में घुसने के चोर रास्ते तलाश रहे है। इसमें एमाले की बेचैनी ज्यादा दिख रही है। एमाले ने आंदोलन कमजोर करने और मधेश में घुसपैठ के लिए संविधान पर चर्चा, भोज और चिया- पान का कार्यक्रम रखा। परन्तु अपने कार्यालय में तीसरी बार आगजनी से एमाले को मुँह की खानी पड़ी।

आंदोलन को भारत के चश्मे से देखने वाले को लगा था, बिहार के चुनाव में मोदी की हार से वे जित गए। पर ध्यान से देखने पर पत्ता चलता है, ये मोदी की हार नहीं जीत है, जहाँ एक तरफ बीजेपी और दूसरे तरफ बाकी सब थे। बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ा है। दूसरी बात ये भी है की बिहार के चुनाव में क्षेत्रीयता की जीत हुई है। ये साबित होता है की क्षेत्रीय अधिकार की बात जनमानस में गहरी पैठ किए हुए है। ये बात नेपाल में भी मधेश के क्षेत्रीय मांग की पुष्टी करता है। राजदूत रंजीत रे का पत्रकार सम्मलेन करके नाकाबंदी पर स्थिति स्पष्ट करना और भारत, बेलायत का संयुक्त वक्तव्य, आंदोलन बिरोधीयो के अरमानों पर पानी फेर दिया।

sipu-2मोर्चा के नेता कभी मिमियाते, गिड़गिड़ाते तो कभी दहाड़ते नज़र आते है। कभी अपनी कमी कमजोरी को भारत से सिर मढ़ते है। मोर्चा अन्य मधेशी दल को अपने साथ आने नहीं देते है, ना ही उनके साथ जाते है। और तो और साजिश के तहत उनके झंडा बैनर भी लगने नहीं देते। आंदोलन का कमजोर पक्ष रहा की ये सिर्फ नाका पर ही सिमट गए है, और सदर मुकाम पर अपनी पकड़ छोड़ दिए है। शुरू के आंदोलन में जब ये सदर मुकाम पर थे, सरकारी कार्यालय बंद थे, वे अब खुलने लगे है। अगर नाका किसी दुर्घटना से खुल भी जाता तो सदर मुकाम का बंदी, आंदोलन को जिन्दा रखता। मोर्चा आंदोलन नहीं राजनीती कर रहा है।

जनता का उत्साह दिनानुदिन बढ़ता ही जा रहा है। लोग खुलेआम हथियार और अलग देश की मांग कर रहे है। किसी भी कार्यक्रम को अहिंसक तरीके से सफल करने में बहुत मशक्त करनी पड़ रही है। पर्सा के पोखरिया में तमरा अभियान के विरोध सभा में इतने लोग आए, जितने पिछले बीस वर्षो में किसी सभा में नहीं आए। ये दर्शाता है की मधेश नई शक्ति की खोज में है। आंदोलन का तालमेल तो देखिए, हिन्दू पर्व के दिन मुस्लिम और मुस्लिम पर्व के दिन हिन्दू स्वस्फूर्त तरीके से नाका पर पहुचते है।

ओली सरकार के सारे दांव उलटे पड़ते जा रहे है। आंदोलन को भारतीय नाकाबंदी दिखाने के चक्कर में आंदोलन का अंतर्राष्ट्रीयकरण करा दिया। चीन से आया तेल मधेश में नहीं दिया गया। सरकार ख़ुद तस्करी करा रही है। जिस भारत को कोशते नहीं थकते, उसी जगह से चोरो की तरह तेल ला रहे है, और राष्ट्रभक्ति दिखा रहे है। काठमांडू में बिक रहा जलावन लकड़ी भी मधेश का ही है। सरकार की मधेश बिरोधी बातों से अब गुस्सा नहीं आता, घिन्न आती है। छठ के बाद आंदोलन बहुत शसक्त होने की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी। sipu-4

बार-बार दिनकर की पंक्तियां स्मरण हो आती है….
दुर्योधन रण ऐसा होगा, फिर कभी नहीं जैसा होगा।
भाई पर भाई टूटेंगे, विष बाण बूँद से छूटेंगे।
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे, वायस शृगाल सुख लूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा, हिंसा का पर्दायी होगा।।

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