भारतीय राजनीति के दादा

हिमालिनी डेस्क
सन् १९६९, जब प्रणब मुखर्जी पहली बार राज्यसभा सदस्य बने तो संयोग से उनका सरकारी निवास राष्ट्रपति भवन के नजदीक था। अपने घर से ही उन्होंने पहली बार राष्ट्रपति Pranab-Mukherjee-UPA hindi magazineभवन की शाही शानोशौकत देखी। जहां उनकी नजर टिकी प्रथम नागरिक की बग्घियों में इस्तेमाल होने वाले घोडÞों पर। घर लौटकर प्रणब ने आंखों देखा हाल विस्तार से सुनाया। उन्होंने हंसते हुए कहा था, ‘राष्ट्रपति भवन में दाखिल होने के लिए तो अगली बार घोडÞा बनकर जन्म लेना होगा। वह पल उनकी बडÞी बहन ८२ वषर्ीया अन्नपूर्ण्ाा बनर्जी की आंखों में अब तक ठहरा हुआ है।
जिद से लिया डबल प्रमोशन
यकीन करना मुश्किल है कि प्रणब मुखर्जी जिद्दी होंगे। लेकिन घर में आइए तो पता चलेगा कि किस कदर जिद्दी रहे हैं। एक दफा प्रणब ने जिद पकडÞ ली कि मिराटी गांव के स्कूल में और नहीं पढÞेंगे। सीधे पांचवी क्लास में पढÞने किरनाहर जाएंगे। तब वे दूसरी कक्षा में थे। उनसे छह साल बडÞी अन्नपूर्ण्ाा दीदी याद करती हैं कि किरनाहर के हेडमास्टर ने उनका खास टेस्ट लिया। पाया गया कि सात साल का यह बच्च वाकई तेज है। और इस तरह उन्होंने तीसरी-चौथी पास किए बिना डबल प्रमोशन हासिल किया। प्रणब मिराटी से तीन किलोमीटर दूर खेतों के बीच कच्चे रास्ते से पैदल जाकर पांचवी की पढर्Þाई करने लगे। बाद में प्रणब ने ही स्वाधीनता संग्राम सेनानी पिता कामोदकिंकर मुखर्जी के नाम पर यहां पक्की सडक बनवाई।
राजा शशांक की दोनों राजधानियों से राज किया
कोलकाता से करीब २० किमी दूर किरनाहर में रह रहीं अन्नपूर्ण्ाा बताती हैं कि उन्होंने तभी कह दिया था कि इतिहास प्रणब का पसंदीदा विषय है। अखंड बंगाल के प्रसिद्ध राजा शशांक -५८०-६२र्५र् इस्वी) का बनवाया जपेश्वर महादेव मंदिर प्रणब दा के पैतृक गांव के पास किरनाहर में है। १९९९ में यह मंदिर गिर गया था। प्रणब ने एक करोडÞ रुपए की लागत से इसे फिर बनवाया। राजलक्ष्मी देवी ट्रस्ट ने यह काम किया, जो प्रणब की मां के नाम पर है। ट्रस्टी रवि चर्टर्जी कहते हैं कि राजा शशांक की राजधानी कर्ण्र्ाावर्ण्र्ााअब मर्ुर्शिदाबाद जिले में) थी, जिसे उन्होंने बाद में गौडÞ -अब मालदा में) में स्थानांतरित किया। प्रणब दा दोनों जगह से सांसद रह चुके हैं। अगले जन्म में घोडÞा बनकर क्यों, इसी जन्म में राष्ट्रपति बनकर जाओगे !
एक जिला, दो देश, दो राष्ट्रपति
प्रणबदा के राष्ट्रपति बनने से बीरभूमि को दो-दो राष्ट्रपति देने का गौरव प्राप्त हो जाएगा। उनसे पहले इसी जिले के डकार गांव के अब्दुल सत्तार १९८१ से १९८२ तक बांज्लादेश के राष्ट्रपति बने थे। विभाजन के वक्त वे ढाका चले गए थे और पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश और पाकिस्तान के मुख्य चुनाव आयुक्त भी रहे। उनके अलावा बीरभूमि के ही एसपी सिन्हा आजादी के बाद बिहार के पहले राज्यपाल बनाए गए थे।
पिता स्वतंत्रता सेनानी, भाई प्रोफेसर
पिता कामाद किंकर मुखर्जी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे १२ साल तक जेल में रहे। उनका सात कमरों वाला पैतृक निवास- मुखर्जी भवन- मिराटी गांव में है। इसी के प्रांगण में प्रणवदा हर साल दर्ुगापूजा आयोजित करते हैं। इस मौके पर पूरा परिवार इकÝा होता है। बडÞे भाई पीयूष मुखर्जी शांति निकेतन में गुरुदेव रबीन्द्र नाथ टैगार द्वारा स्थापित विश्वभारती यूनिवर्सिटी के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता केंद्र के निदेशक पद से कुछ ही साल पहले रिटायर हुए। वे आज भी बोलपुर के जांबुनी मोहल्ले की एक संकरी गली में दो कमरों के मकान मे पत्नी के साथ रह रहे हैं।
बतौर नेता सोमनाथ और प्रणब दा
बोलपुर संसदीय क्षेत्र की पहचान पर्ूव लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चर्टर्जी से है। वे १९८५ से लगातार सांसद रहे। यह वही सीट है, जहां से प्रणब मुखर्जी १९८० में ६२ हजार वोटों से हारे थे। कांग्रेसियों के लिए सोमनाथ और प्रणब दा की तुलना लाजिमी है। लोग बताते हैं कि सोमनाथ अपने इलाके से दिल्ली पहुंचे किसी भी व्यक्ति का हमेशा पूरा ख्याल रखते थे। जैसे-किस काम से आए, कहां ठहरे हो, कैसे जाओगे, खाना खाया या नहीं, कोई मुश्किल हो तो बेझिझक बताओ ! जबकि प्रणब दा इतने सहज कभी नहीं रहे। उनके करीबी भी मानते हैं कि दिल्ली में वे मिलेंगे। चाय भी पिलाएंगे। लेकिन इससे ज्यादा आत्मीय कभी नहीं। इसकी वजह लोग यह मानते हैं कि प्रणब अपनी बौद्धिक क्षमता के बूते ही राजनीति में टिकाऊ साबित हुए। जनता और चुनावी राजनीति से उनका वास्ता वैसे भी ज्यादा नहीं रहा। चार दशक की राजनीति में चार चुनाव लडÞे। दो हारे। दो ही जीते। प्रणब दा ने शादी के लिए पेशे से अध्यापक शुभ्रा को पसंद किया तो दिल की बात सबसे पहले दीदी अन्नपूर्ण्ाा को बताई। घर वाले राजी हुए। तब फेरे हुए।
सबसे बड कामयाबी
घर वालों की नजर में उनकी सबसे बडÞी कामयाबी वह प्रशंसा है जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राज्यसभा में उनके पहले भाषण को सुनकर की थी।
सबसे बड नाकामी
१९८६ में राजीव गांधी से अलग होकर प्रणब दा ने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाई। लेकिन कोई संगठन खडÞा नहीं कर पाए। विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार तो उतारे मगर जीता कोई नहीं। १९८९ में कांग्रेस में लौट आए।
सबसे पसंदीदा गीत
सुकांत भट्टाचार्य का लिखा और हेमंत मुखोपाध्याय का गाया बंगाली गीत ‘आबाक पृथ्वी, तोमार सलाम। उन्हें सबसे ज्यादा पसंद है। इसे वे खूब गुनगुनाते हैं। कार में रबींद्र संगीत सुनना पसंद।
चाँकलेट दिख भर जाए
चाँकलेट के भारी शौकीन हैं। कहीं दिख भर जाए, खाएंगे भी और जेब में भी भर लेंगे। बचपन की यह आदत अभी भी गई नहीं है।
दिमाग चाचा चौधरी से भी तेज
चाचा चौधरी के काँमिक्स अब तक पढÞते हैं। कांग्रेसी बताते हैं कि प्रणब दा का दिमाग चाचा चौधरी की तरह कम्प्यूटर से तेज है। ५० साल की कई घटनाएं जस की तस याद हैं।
भारतीय राजनीति के असली “दादा”
संप्रग सरकार ने राष्ट्रपति पद के लिए अपने सबसे सफलतम उम्मीदवार पर्ूव वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के नाम को प्रेषित कर ना सिर्फउन्हें कांग्रेस का वषर्ाें साथ निभाने का इनाम दिया है बल्कि उनको उम्र के इस पडÞाव पर देश का र्सवाेच्च पद देने की कवायद कर उनका मान भी बढÞा दिया है।
बंगाल में खुशी की लहर
राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब के नाम की घोषणा के बाद से ही पश्चिम बंगाल में खुशी की लहर दौडÞ गई है। इसका एक कारण यह भी है कि राष्ट्रपति पद के लिए पहली बार बंगाल से किसी को चुना गया है। गौरतलब है कि गुरुवार को प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन पत्र दाखिल करेंगे। राष्ट्रपति पद के लिए इससे पहले भी प्रणब मुखर्जी का नाम यदाकदा सामने आया था, लेकिन केद्रीय मंत्रिमंडल में व्यावहारिक रूप से उनके अपरिहार्य योगदान को देखते हुए उनका नाम हटा लिया गया था।
प्रणब का सफरनामा
एक आम आदमी से शिक्षक, वकील, प्रोफेसर, सासद और फिर देश के वित्त मंत्री बनने तक का सफर काफी उतार चढÞाव भरा रहा। प्रणब मुखर्जी वर्तमान यूपीए सरकार में इससे पहले वित्त मंत्री थे। राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद उन्होंने संगठन और सरकार से खुद को मुक्त कर दिया। एवं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेता है। प्रणब ने भारतीय राजनीति में करीब पाच दशक के करियर में सब कुछ देखा। १९६९ में कांग्रेस पार्टर्ीीे राज्यसभा सदस्य के रूप में उच्च सदन से उन्होंने इस करियर की शुरुआत की थी।
छह बार चुने गए सांसद
उन्हें कुल छह बार सासद चुना गया। १९७५, १९८१, १९९३ और १९९९ में फिर से चुने गए। १९७३ में वह औद्योगिक विकास विभाग के केद्रीय उप मंत्री के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल हुए। प्रणब वर्ष१९८२ से १९८४ तक कई कैबिनेट पदों के लिए चुने जाते रहे। इसके बाद वर्ष१९८४ में वह पहली बार भारत के वित्त मंत्री बने। वर्ष१९८४ में ही यूरोमनी पत्रिका के एक र्सवेक्षण में उनको विश्व के सबसे अच्छे वित्त मंत्री के रूप में मूल्याकित किया गया।
पिता से मिली राजनीतिक विरासत
प्रणब मुखर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून की उपाधि प्राप्त की। प्रणव इतिहास और राजनीति विज्ञान के छात्र रह चुके हैं। सिर्फप्रणब ही नहीं बल्कि उनके पिता भी पहले से ही राजनीति में सक्रिय थे। उनके पिता १९२० से कांग्रेस पार्टर्ीीें कार्यरत थे। पिता का हाथ पकडÞ कर ही उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। प्रणव के पिता पश्चिम बंगाल विधान परिषद १९५२-६४ के सदस्य और वीरभूम पश्चिम बंगाल जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। उनके पिता एक सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी भी थे, जिन्हें ब्रिटिश शासन की खिलाफत के लिए १० वषर्ाे से अधिक समय के लिए जेल भेजा गया था।
प्रणब का अध्यापन
इतिहास व राजनीति में ड्रि्री प्राप्त करने के बाद प्रणब ने एक काँलेज प्राध्यापक के रूप में अपने करियर की शुरूआत की। इसके बाद एक पत्रकार के रूप में अपने करियर को आगे बढÞाया। उन्होंने जाने-माने बाग्ला प्रकाशन संस्थान देशेर डाक मातृभूमि की पुकार के लिए काम किया। इसके बाद वह बंगीय साहित्य परिषद के ट्रस्टी बने। बाद में निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी बने।
राजीव गांधी से मतभेद
वर्ष१९८४ में राजीव गाधी सरकार के कार्यकाल के दौरान पहली बार वित्त मंत्री बने प्रणब ने पार्टर्ीीे मतभेदों के चलते अपनी अलग पार्टर्ीीाष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बना डाली, लेकिन बाद में वर्ष१९८९ में राजीव गाधी के साथ समझौता होने के बाद कांग्रेस पार्टर्ीीें ही प्रणब की पार्टर्ीीा विलय हो गया। तब उनका राजनीतिक करियर पुनर्जीवित हो गया।
राजनीति में मिली सफलता
इसके बाद पीवी नरसिम्हा राव ने उन्हें योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में चुन लिया। इसके बाद वह केद्रीय कैबिनेट मंत्री के तौर पर नियुक्त किए गए। उन्होंने राव के मंत्रीमंडल में १९९५ से १९९६ तक पहली बार विदेश मंत्री के रूप में भी कार्य किया। १९९७ में उन्हें उत्कृष्ट सासद चुना गया। वर्ष१९८५ के बाद से वह कांग्रेस की पश्चिम बंगाल राज्य इकाई के भी अध्यक्ष बने। सन २००४ में जब कांग्रेस ने गठबंधन सरकार के अगुआ के रूप में सरकार बनाई तो कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सिर्फएक राज्यसभा सासद ही थे। इसलिए जंगीपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र ७ जंगीपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतनेवाले प्रणव मुखर्जी को लोकसभा में सदन का नेता बनाया गया। उन्हें रक्षा, वित्त, विदेश विषयक मंत्रालय, राजस्व, नौवहन, परिवहन, संचार, आर्थिक मामले, वाणिज्य और उद्योग, समेत विभिन्न महत्वपर्ूण्ा मंत्रालयों के मंत्री होने का गौरव भी हासिल हुआ। वह कांग्रेस संसदीय दल और कांग्रेस विधायक दल के नेता भी रह चुके हैं।
साथ-साथ वह लोकसभा में सदन के नेता, बंगाल प्रदेश कांग्रेस पार्टर्ीीे अध्यक्ष, कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रीपरिषद में केद्रीय वित्त मंत्री रहे हैं। लोकसभा चुनावों से पहले जब प्रधानमंत्री ने बाई-पास र्सजरी कर्राई, प्रणब, विदेश मंत्रालय में केद्रीय मंत्री होने के बावजूद राजनैतिक मामलों की कैबिनेट समिति के अध्यक्ष और वित्त मंत्रालय में केद्रीय मंत्री का अतिरिक्त प्रभार लेकर मंत्रिमंडल के संचालन में महत्वपर्ूण्ा भूमिका निभाई।
एडीबी से जुडÞे प्रणब
१० अक्टूबर २००८ को मुखर्जी और अमेरिकी विदेश सचिव कोंडोलीजा राइस ने धारा १२घ समझौते पर हस्ताक्षर किए। वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक और अप|mीकी विकास बैंक के प्रशासक बोर्ड के सदस्य हैं। मुखर्जी की अपनी पार्टर्ीीे भीतर व विपक्षी पार्टियों में भी एक साफ छवि बनी हर्ुइ है।
सोनिया को राजनीति में लाने वाले प्रणब
जब सोनिया गाधी अनिच्छा के साथ राजनीति में शामिल होने के लिए राजी हर्ुइं तब प्रणब मुखर्जी उनके प्रमुख परामर्शदाताओं में से एक थे। मुखर्जी की अमोघ निष्ठा और योग्यता ने उन्हें सोनिया गाधी और मनमोहन सिंह के करीब लाया। इस वजह से जब २००४ में पार्टर्ीीत्ता में आई तो उन्हें भारत के रक्षा मंत्री के प्रतिष्ठित पद पर पहुंचने में मदद मिली। सन १९९१ से १९९६ तक वह योजना आयोग के उपाध्यक्ष पर रहे।
पेटेंट संशोधन बिल पर दिखी प्रतिभा
२००५ के प्रारंभ में पेटेंट संशोधन बिल पर समझौते के दौरान उनकी प्रतिभा के दर्शन हुए। रक्षा मंत्री के रूप में प्रणब मामले में औपचारिक रूप से शामिल नहीं थे, लेकिन बातचीत के कौशल को देखकर उन्हें आमंत्रित किया गया था। ज्योति बसु सहित कई पुराने गठबंधनों को मनाकर मध्यस्थता के कुछ नये बिंदु तय किये, जिसमे उत्पाद पेटेंट के अलावा और कुछ बातें शामिल थीं। तब उन्हें, वाणिज्य मंत्री कमलनाथ सहित अपने सहयोगियों को यह कहकर मनाना पडÞा कि कोई कानून नहीं रहने से बेहतर है एक अपर्ूण्ा कानून बनना। अंत में २३ मार्च २००५ को बिल को मंजूरी दे दी गई।
पद्म विभूषण से सम्मानित
२४ अक्टूबर २००६ को उन्हें भारत का विदेश मंत्री नियुक्त किया गया। मुखर्जी की वर्तमान विरासत में अमेरिकी सरकार के साथ असैनिक परमाणु समझौते पर भारत-अमेरिका के सफलतापर्ूवक हस्ताक्षर और परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत नहीं होने के बावजूद असैन्य परमाणु व्यापार में भाग लेने के लिए परमाणु आपर्ूर्तिकर्ता समूह के साथ हुआ हस्ताक्षर शामिल है। सन २००७ में उन्हें भारत के दूसरे सबसे बडÞे नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया।
वित्त मंत्री के रूप में बाजार ने सराहा
इन सबके बाद मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार में भी मुखर्जी ही भारत के वित्त मंत्री बने, जिस पद पर वे पहले १९८० के दशक में काम कर चुके थे। ६ जुलाई, २००९ को उन्होंने सरकार का सालाना बजट पेश किया। वह कुल आठ बार बजट पेश कर चुके हैं। उन्होंने ऐलान किया कि वित्त मंत्रालय की हालत इतनी अच्छी है कि माल और सेवा कर लागू कर सके, जिसे महत्वपर्ूण्ा काँरपोरेट अधिकारियों और अर्थशास्त्रियों ने सराहा। उन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, लडÞकियों की साक्षरता और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए और धन का प्रावधान किया। इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम, बिजलीकरण का विस्तार और जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन की तरह बुनियादी सुविधाओं वाले कार्यक्रमों का भी विस्तार किया। हालाकि, कई लोगों ने १९९१ के बाद से सबसे अधिक बढÞ रहे राजकोषीय घाटे के बारे में चिंता व्यक्त की। श्री मुखर्जी ने कहा कि सरकारी खर्च में विस्तार केवल अस्थायी है और सरकार वित्तीय दूरदर्शिता के सिद्धात के प्रति प्रतिबद्ध है।
आकंडÞों का खेल
राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव के लिए राजनीतिक गठजोडÞ लगातार जारी है। गृह मंत्री पी चिदंबरम ने अपने हालिया बयान में राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी को ७० फीसद से ज्यादा मतों से जीतने की बात कहीं थी। संप्रग को यदि छोडÞ दिया जाए तो राजग में अभी यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि मतों का गणित किसकी ओर झुकेगा।
राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुल वोट १०.९८.८८२ लाख हैं। वहीं जीतने वाले उम्मीदवार को ५.४९.४४२ लाख वोट हासिल करने होंगे। ममता के र्समर्थन को हटाकर यूपीए की ओर से प्रणब मुखर्जी को ३६.६७ फीसद वोट मिलने की उम्मीद हैं। वहीं सपा व बीएसपी की ओर से प्रणब को १०.३ फीसद वोट मिलेंगे। जदयू व शिव सेना ५.५ के फीसद वोट। वहीं सीपीआईएम व फाँरवार्ड ब्लाँक की ओर से ३.७ फीसद वोट मिलने की उम्मीद हैं। प्रणब मुखर्जी को कुल ५६.१७ फीसद वोट मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
दूसरी ओर प्रणब को इस चुनाव में कडÞी टक्कर देने वाले पीए संगमा को भाजपा की ओर से २१.२ फीसद वोट मिल सकते हैं। वहीं शिरोमणि अकाली दल की ओर से १.१ फीसद व एआईएडीएमके का ३.३ फीसद वोट का र्समर्थन और बीजेडी की ओर से २.८ फीसद वोट प्राप्त हो सकते हैं। संगमा को ३१.७ फीसद कुल वोट मिल सकते हैं।
प्रणब की कर्ुर्सर्ीीर बैठने के ये पांच दावेदार
भारत के १३वें राष्ट्रपति बनने की तरफ मजबूती से बढÞ रहे प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार को नामांकन कर दिया है। उनके बाद वित्त मंत्रालय की कमान फिलहाल प्रधानमंत्री ने संभाल रखी है, लेकिन फुल टाइम वित्त मंत्री किसे बनाया जाए, यह सवाल यूपीए सरकार के सामने है।
नीतिगत फैसलों में ठहराव, महंगाई और निवेश में गिरावट जैसी खामियों से जूझ रही अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए खुद प्रधानमंत्री ने अभी वित्त मंत्रालय की कमान संभाल रखी है। १९९१ में बेहद खराब अर्थव्यवस्था के दौर में वित्त मंत्रालय संभालने वाले डाँ. मनमोहन सिंह खुद अर्थशास्त्री हैं जिन्होंने आर्थिक सुधार लागू किए थे, जिसके बाद भारत ने आर्थिक मोर्चे पर तेजी से तरक्की की थी। लेकिन मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए वह खुद फुल टाइम वित्त मंत्री जल्दी ही नियुक्त करना चाहेंगे। इस पद के लिए उनकी नजर सरकार के कुछ जाने पहचाने चेहरों पर रह सकती है। इनमें पी. चिदंबरम, जयराम रमेश, आनंद शर्मा, मोंटेक सिंह आहलूवालिया और सी. रंगराजन शामिल हैं।

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