भारतीय लोकपाल और हमारा अख्तियार:
हरिबहादुर थापा

भारत में जैसे भ्रष्टाचार विरूद्ध सशक्त कानून की मांग करते हुए नागरिक अभियानकर्ताओं द्वारा सडक आन्दोलन किया जा रहा है, नेपाल में पहले से ही उससे भी सशक्त और कठोर कानून नौ वर्षपहले ही बन चुका है। भ्रष्टाचारी पर कार्रवाही करने की शक्तिशाली लोकपाल विधयेक के पक्ष में अभियान चलाने वाले  अन्ना हजारे को भारत की सरकार ने पहले तो गिरफ्तार किया जिससे ना सिर्फउनकी लोकप्रियता बढ गई बल्कि उनके आन्दोलन को और हवा मिली।
भारतीय सर्ंदर्भ से नेपाल का भ्रष्टाचार निरोधक कानून र्सवथा भिन्न है। करीब दश वर्षपहले २०५९ वैशाख में संसद से पारित कानून ने प्रधानमंत्री से लेकर कार्यालय सहायक तक को भ्रष्टाचार में संलग्न होने की आशंका में जांच करने से लेकर आरोप सिद्ध करने का अधिकार देते हुए अख्तियार दुरूपयोग अनुसंधान आयोग का गठन हुआ था। भ्रष्टाचार निवारण ऐन २०५९ की भावना का अक्षरशः पालन किया जाए तो अनुचित तरीके से सरकारी सुविधा लेने वाले बडे बडे लोग जेल की चारदिवारी के पीछे खडे नजर आएंगे।
भारत की तरह नेपाल में इस समय कानून की समस्या नहीं है। २०५६ साल में भ्रष्टाचार नियंत्रण संबंधी कानून में हम भारत से कहीं आगे हैं। कानून के दायरा से बाहर कोई भी नहीं है। समस्या कानून में नहीं बल्कि इसके कार्यान्वयन में है। इस कानून के तहत नवधनाढ्य राजनीतिक तथा सरकारी अधिकारी द्वारा संपत्ति का वैधानिक श्रोत दिखाना अनिवार्य है। यदि कोई व्यक्ति श्रोत दिखाने में असफल रहता है तो उसे जेल की हवा खानी पड सकती है और उसकी संपत्ति जब्त हो सकती है।
इतना ही नहीं सामान्य शिकायत या मीडिया में आई खबर के आधार पर भी अख्तियार जिस किसी व्यक्ति  के खिलाफ भी जांच कर सकती है। इसके लिए उसे किसी की भी अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। इस तरह का कानून दक्षिण एशिया के देश में शायद ही देखने को मिले।  भारत में लोकपाल की मांग १९६८ से ही की जा रही है। लेकिन अभी तक उसे संसद में पारित नहीं कराया जा सका। लेकिन इसके ठीक विपरित नेपाल में महज चार-पांच सालों के ही बहस के बाद इसे कानूनी रूप दे दिया गया था।
२०५६ साल में तत्कालीन प्रधानमंत्री कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई ने स्वयं की पहल पर प्रधानमंत्री को भी इस कानूनी दायरे में लाने की प्रक्रिया की शुरूआत की थी। उन्होंने भ्रष्टाचार नियंत्रण संबंधी कानून बनाने के लिए एक अलग ही उच्च स्तरीय आयोग बनाया था। भट्टर्राई ने इस आयोग को यह निर्देश दिया था कि इस भ्रष्टाचार विरोधी कानून के दायरे में प्रधानमंत्री तक को रखा जाए।  हालांकि उस समय कांग्रेस पार्टर्ीीे आन्तरिक विवाद के कारण यह तत्काल कानून का रूप नहीं ले पाया था। लेकिन बाद में जन दबाब के बाद आखिरकार २०५९ साल में संसद से इसे पारित कर दिया गया। विधेयक पारित होते समय शेरबहादुर देउवा प्रधानमंत्री थे। उस समय भ्रष्टाचार विरोधी कानून को पारित करवाने के लिए कांग्रेस के जिन लोगों ने भूमिका निभाई थी उनमें से कुछ अभी उसी कानून के तहत या तो जेल में हैं या फिर अदालती कठघरे में खडे हैं।
भारत में दूसरा एक विवादित विषय है न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे में लाना। इस विषय पर नेपाल में भी विवाद है। जिस समय नेपाल में भ्रष्टाचार निरोधक कानून को संसद से पारित कराया जा रहा था उस समय इस बात पर काफी चर्चा और विवाद हुआ था। आखिरकार न्यायालय और न्यायाधीश को अख्तियार के दायरे से बाहर रखा गया। लेकिन बाद में न्यायालय की छवि पर भी दाग लगा और उसकी काफी आलोचना भी हर्ुइ। बाद में जब नेपाल में लोकतंत्र की पर्ुनर्बहाली हर्ुइ तो अन्तरिम संविधान में यह व्यवस्था की गई कि न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग लगाकर उन्हें हटाया जा सकता है। और यदि वो पद से अवकाश ले चुके हैं तब भी उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाही की जा सकती है। इसी तरह नेता या अन्य सरकारी अधिकारी के भी पद से हट जाने या अवकाश प्राप्त होने के बाद भी उनपर मुकदमा चलाया जा सकता है।
इतने कानून होने के बावजूद जब अख्तियार को ही राजनीति का अखाडा बना दिया गया तो देश में भ्रष्टाचार और अधिक बढ गया। हमारे देश में राजनीतिक कलह की वजह से पिछले कई सालों से भ्रष्टाचार की जांच करने वाली संस्था में प्रमुख पद पर नियुक्ति ही नहीं हर्ुइ है।   २०६३ साल के बाद तो अख्तियार पर्ूण्ातः पदाधिकारी विहीन हो गया है। इस समय वो सिर्फसरकारी कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है।
भारत में अन्ना हजारे को आन्दोलन के लिए बाध्य करना और नेपाल में अख्तियार को निष्त्रिmय करना दोनों एक जैसा ही है। इससे यही साबित होता है कि देश के राजनेता खुद को भ्रष्टाचार की जांच से बाहर रखना चाहते हैं। कहीं कानून ना बनाकर भ्रष्टाचार से उन्मुक्ति की बात हो रही है तो कहीं कानून को ही पंगु बनाकर भ्रष्टाचारी को कानूनी फंदे से बाहर रखने की साजिश हो रही है।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz