भारतीय स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी आमजन आज भी मांग रहे अपने हिस्से की आजादी : मधुरेश

मधुरेश.{बिहार}, १५ अगस्त | अंग्रेजों की दासता से आजाद हुए भारत को आज सात दशक यानि सत्तर साल हो गये।इस लंबी अवधि में ऋषि-मुनियों के इस देश ने सिर्फ राजनैतिक आजादी पायी है।भारत को सोने की चिड़िया का देश कहा जाता है।लेकिन सोने की चिड़िया वाले इस देश के आम लोग खासकर गरीब आज भी फटेहाल हैं।

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गरीबों की फटेहाली के बीच इस आजादी का आखिर क्या मतलब है!अगर आप मानते हैं कि देश सचमुच आज़ाद है तो आप मुगालते में हैं। 69 साल पहले हमें जो हासिल हुआ था, वह मात्र राजनीतिक आज़ादी थी। गोरे साहबों से काले-भूरे साहबों को सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण भर हुआ था।जिस आज़ादी का हम जश्न मना रहे हैं, वह देश के एक प्रतिशत राजनेताओं, धनकुबेरों,सत्ता के दलालों और अफसरशाहों की आज़ादी है।लेकिन हां इतना तो है कि हमारे उपर विदेशी नहीं बल्कि भारतीय शासन कर रहे हैं।हमें अभिव्यक्ति की आजादी है। देश का आमजन आज भी हाशिए पर खड़ा अपने हिस्से की आज़ादी की प्रतीक्षा कर रहा है। उसके लिए आज़ादी का मतलब है भूख, गरीबी, शोषण और बेरोज़गारी से आज़ादी।सामाजिक, धार्मिक, जातीय गैरबराबरी और अपमान से आज़ादी।अपराध और आतंक से आज़ादी।  हो यह रहा है कि आज़ादी के सात दशक बाद भी करोड़ों बच्चे पढने-खेलने की उम्र में रोटी के लिए मजदूरी करने या सड़कों  पर भीख मांगने के लिए विवश हैं। देश के करोड़ों युवा बेरोज़गार, हताश और दिशाहीन हैं। अन्नदाता  किसान बदहाली से तंग आकर आत्महत्या कर रहे हैं। हमारी बच्चियां अपने घरों, समाज और सड़कों पर महफूज़ नहीं हैं। देश में पैसों के बल पर न्याय ख़रीदे और बेचे जा रहे हैं। देश के ज्यादातर लोग भर पेट भोजन और पीने के शुद्ध पानी तक के लिए तरस रहे हैं। जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुएं महंगी और लोगों की पहुंच से बाहर हो रही हैं। सत्ता के लोभ में देश को जातिगत आधार पर बांट कर लोगों को आपस में लड़ाने का ख़तरनाक खेल खेला जा रहा है। अपने देश की जो परिस्थितियां हैं, उनमें देश के आम आदमी के लिए आज़ादी का कोई खासअर्थ नजर नहीं आता। यह एक काल्पनिक झुनझुना है जिसे देश का एक छोटा-सा सुविधाभोगी वर्ग हमारे हाथों में थमाकर हमारी ही खून-पसीने की कमाई से मौज कर रहा है।आजादी का असल मायने तो राजनैतिक आजादी के साथ-साथ आर्थिक एवं सामाजिक आजादी से है।देश की जनता खासकर गरीबों को अगर रोजगार, समुचित इलाज,बच्चों के लिए शिक्षा,सर छुपाने के लिए एक अदद आवास और बहु-बेटियों की सुरक्षा का मुक्कमल इंतजाम हो जाए तो देश की आम जनता को असली एवं पूर्ण आजादी मिल जाएगी।देश की एकता-अखंडता एवं सुरक्षा के साथ ही आतंकवाद का खात्मा जबतक नहीं होगा तबतक हम अपने आप को पूर्ण आजाद कैसे मान सकते हैं।इस स्वतंत्रता दिवस पर अगर वक़्त मिले तो कभी कवि धूमिल की तरह आप भी अपने-आप से यह सवाल पूछकर ज़रूर देखें~

“क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है,
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है”?

Madhuresh priydarsi

Madhuresh priydarsi

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