भारत का ७० वाँ स्वतंत्रता दिवस पर एक नजर: कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी , १८, अगस्त |

भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुए ६९ साल हो गए हैं । १५ अगस्त २०१६ को भारत ने अपना ७०वाँ स्वतन्त्रता दिवस बडेÞ धमधाम के साथ मनाया है । हम मधेशियों ने भी भारत के इस महान राष्ट्रीय पर्व को नमन किया है ।

भारत ने १९४७ से आजतक स्वतन्त्रता का जो ६९ दिवस मनाया है, वे केवल भौतिक स्वतन्त्रता दिवस ही रहे हैं या मानसिक स्वतन्त्रता दिवस भी ? इनकी खोज तलाश भी जरूरी है । जैसे कि भारत के अमरावती से मिर्जापुर तक के १८९ कि.मी चलने बाली शकुन्तला एक्सपे्रस, उस रुट पर चल रही उस एक्सपेस के कारण ब्रिटेन के एक निजी कम्पनी को आज भी भारतीय सरकार के तरफ से दी जाने वाली १ करोड़ २० लाख की रकम यही सावित करती है कि भारत आज भी कुछ जगहों पर भौतिक रुप में परतन्त्र है । वैसे ही भारतीय किसानों से लगान वसूल करने के लिए निर्माण किए गए कलेक्टर तथा अंगे्रजों के खिलाफ संगठित होकर आन्दोलन करने बाले समूहों पर लाठी बरसाने के लिए उनके द्वारा पुलिस के हाथों में थमाये गए डण्डे आज भी ज्यों के त्यों मौजद हंै ।

उससे भी ज्यादा लोकतान्त्रिक भारत के किसी सांसद या मन्त्री से वहाँ के जनता को मिलना करीब–करीब सपना ही होता है जितना अंग्रेज शासकों से मिलना कठिन नहीं होता था । वहाँ के किसी बड़े अधिकारी तक से भी सामान्य लोग अपनी बातों को नहीं रख पाते । सामान्य कर्मचारियों या पुलिसों की शान और रवैयों को भी देखें तो किसी अंगे्रज से कम तो होता ही नहीं, ज्यादा जरूर होता है । प्रजा के लिए निर्माण किए गए लोकतन्त्र का सारा रस वहाँ की राजनीतिक नेता और अधिकारियों में सिमटी हुई हैं और सामान्य जनता आज भी लोकतन्त्र की राह में हैं ।

भारत भारतीय जनता के लिए देश होने से पहले उनकी भावना है । उस अलौकिक भावना से उनका कितना गहरा सम्बन्ध और लगाव है उसका कोई मापन यन्त्र नहीं हो सकता । भारत को वे देश मानने से पहले अपना राष्ट्र मानते हैं जिसके लिए कालान्तर से आजतक भारत के जवानों से लेकर आम आदमी तक अपनी कुर्बानी देने को तैयार हंै ।

राष्ट्र लोगों के भावना से सम्बन्धित होता है और देश मानसिकता से । राष्ट्र लोगों के रगों में होता है तो देश उसकी सोच में । राष्ट्र त्याग और प्यार से बनता है तो देश शासन और राजनीतिक रणनीतियों से । राष्ट्र लोगों के धमनियों में लहु की तरह प्रवाहित रहता है, तो देश उनकी आकांक्षाओं में । भारत भीे भारतियों के लिए पहले राष्ट्र है, शासकों और प्रशासकों के लिए भारत पहले देश सावित किया जा रहा है ।

सन् १९१० के दशक में भारत में राज कर रहे एक अंग्रेज अधिकारी जॉन स्टै«ची ने कहा था, “भारत न है न कभी था । भारत नाम का ऐसा देश कभी था ही नही जिसमें यूरोपीय विचारों के अनुसार किसी तरह की भौगोलिक, राजनीतिक, सामाजिक अथवा धार्मिक एकता रही हो । ऐसे किसी राष्ट्र अथवा भारत की जनता का वजूद कभी था ही नहीं जिसकी इतनी चर्चा सुनी जाती है ।”

वैसे ही १८९९ के इर्दगिर्द एक दूसरा अंगे्रज अधिकारी लार्ड कर्जन ने कहा था, “भारतीय राष्ट्रीयता का कोई स्वाभाविक रुप ही नहीं है ।” उन्होंने भारत के प्राकृतिक सीमाओं को भी ठुकरा दिया था ।

लेकिन भारत के लोगों ने अंगे्रजों के लाख बहकाने के बावजुद अपने भारत की सीमा और सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक मानचित्रों को बहुत पहले ही प्रमाणित कर चुका था । इसलिए सन् १८३५ में लार्ड मैकाले नाम के एक अंग्रेज ने अपने शासकों से कहा था, “अगर भारत पर शासन करना है तो भारतियों के भीतर रहे आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं एकता को तोडना होगा । क्यूँकि मेरे अध्ययन में भारतीय लोग इनमें बहुत संगठित हैं ।”

भारतीय लोगों को समझाने का प्रयास भी खुद तत्कालीन ब्रिटीश प्रधानमन्त्री विन्सटन चर्चिल ने की थी कि भारत से अंग्रेजों के चले जाने से भारत बच नहीं पायेगा, भारतीय लोग भारत को चला नहीं पायेगा । अंग्रेज ही भारत को अच्छा बनायेगा । (वही बात नेपाली लोग और नेपालियों के जूठे को ही अमृत समझने बाले कुछ मधेशी लोग बता रहे हैं, आम मधेशियों को समझा रहे हैं ।) मगर भारतीय जनता ने उनकी एक न सुनी और भारत को मुक्त कर ही लिया जो भारत आज दुनियाँ के सामने एक ताकतवर देश बनकर खडा है, वहींं वो बेलायत आज छोटे से भूगोल में सिमट गयी है ।

सन् १९१९ में ब्रिगेडियर रेजिनोल्ड डायर के निर्देशन में उनके मातहत में रहे गोर्खाली सैनिकों द्वारा अमृतसर के जालियाबाला बाग में दस मिनट के अन्दर गोलियों से हजारों भारतीय आन्दोलनकारी नागरिकों को मारा गया ।

सन् १८१५ में अंग्रेजों द्वारा ब्रिटीश राज को सुरक्षा देने हेतु निर्माण किए गए गोर्खालियों की भर्ना को आजतक कायम रखने में भारत भी अपनी कामयाबी मानता रहा है ।

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