भारत की नेपाल नीति बदली या उग्र राष्ट्रीयता का शोर थमा ? डा. श्वेता दीप्ति

जहाँ चंद जनता भारत के विरुद्ध खड़ी हो जाती हंै । गालियों की बौछार होती है, नारे लगते हैं और भारत के खिलाफ चाइना कार्ड खेला जाता है । वर्षों से यही होता आया है । सत्ता बच जाती है और फिर नारे भी थम जाते हैं और गालियाँ भी । आखिर क्यों होता है ऐसा ? क्या नेपाल की राजनीति को अपने देश में कोई ज्वलन्त समस्या या मुद्दा नहीं दिखता, जिसका प्रयोग कर वो सत्ता पर काबिज हो सकें या टिके रह सकें ?


चीन की रेल नेपाल में दौड़ने भी लगी थी । किन्तु एक कटु सत्य यह है कि चीन से चाहे कितने भी समझौते नेपाल कर ले परन्तु उसका कार्यान्वयन यथार्थ में सहज नहीं है । चीन से हुए समझौते कर्णप्रिय अवश्य थे किन्तु उसका सुख नेपाली जनता कब लेगी यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि चीन और नेपाल की भौगोलिक परिस्थितियाँ या संरचना ऐसी है कि यह सब सहज हो ही नहीं सकता ।


नेपाली टोली ने भारत के विशाखापट्टनम पहुँचकर बन्दरगाह का सांकेतिक उद्घाटन किया है । वैसे यह अलग बात है कि हमारे प्रधानमंत्री ने आगामी दिनों में नेपाल में ही पानी जहाज चलाने की घोषणा कर दी है । विशाखापट्टनम बन्दरगाह के सम्बन्ध में प्रधानमंत्री ओली की भारत यात्रा के समय में ही समझौता हुआ था ।

डा. श्वेता दीप्ति
कुछ रिश्तों की जड़ें इतनी गहरी होती हंै कि वो चाह कर भी सूखती नहीं, ठीक अमरबेली की तरह, चाहे उसकी जड़ें कितनी भी खोदी जाय उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता, वह बरकरार रहता है । नेपाल–भारत सम्बन्ध सदियों का है और अपनी भौगोलिक, साँस्कृतिक और सामाजिक वजहों से अटूट भी, जिसे राष्ट्रवाद के नाम पर जितनी भी तोड़ने की या कमजोर करने की कोशिश की जाय यह सम्बन्ध टूट नहीं सकता । इस रिश्ते में कड़वाहट जब भी आई है, तो साफ तौर पर राजनीतिक वजहों से आई है । इस रिश्ते को हमेशा नेपाल की राजनीति ने भँजाने की कोशिश की है । जब भी सत्तानसीन को अपनी कुर्सी बचानी होती है, या सत्ता से बाहर वाले को सत्ता तक पहुँचना होता है, तो वो भारत के साथ के रिश्ते को अपनी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना लेते हैं और फिर ऐसी परिस्थितियाँ तैयार करते हैं, जहाँ चंद जनता भारत के विरुद्ध खड़ी हो जाती हंै । गालियों की बौछार होती है, नारे लगते हैं और भारत के खिलाफ चाइना कार्ड खेला जाता है । वर्षों से यही होता आया है । सत्ता बच जाती है और फिर नारे भी थम जाते हैं और गालियाँ भी । आखिर क्यों होता है ऐसा ? क्या नेपाल की राजनीति को अपने देश में कोई ज्वलन्त समस्या या मुद्दा नहीं दिखता, जिसका प्रयोग कर वो सत्ता पर काबिज हो सकें या टिके रह सकें ? राजनीति में विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है, जिस पर देश की आर्थिक स्थिति का बहुत भार टिका होता है । पर हमारे देश की यह विडम्बना है कि देश की अर्थव्यवस्था से अधिक हमारे नेताओं को अपने बैंक की अर्थव्यवस्था अधिक नजर आती है । जिसके कारण वो बेवजह की बातों या बयानों से पड़ोसी राष्ट्र से अपना रिश्ता बिगाड़ लेते हैं । परन्तु यह भी अकाट्य सत्य है कि यह रुख इनका बहुत कम समय तक टिकता है । इनकी पहली दौड़ फिर उधर ही होती है जिसके खिलाफ जनता को भड़का कर ये सत्ता हासिल करते हैं । इसी नीति के तहत आज तक सत्ता चलती रही और बदलती रही है ।
कुछ महीने पहले नेपाल और भारत के रिश्ते में जो कटुता दिख रही थी अचानक लगने लगा है कि वो कटुता मिठास में बदल गई है । इसका क्या कारण हो सकता है ? क्या भारत का रुख बदल गया या राष्ट्रवाद की जो लहर चलाई थी सरकार ने वो मद्धम हो गई है ? विगत एक महीने में कई वार्ताओं का होना और रुके हुए कामों में तीव्रता आना क्या नेपाल भारत के रिश्तों में आ रहे सुधार की निशानी है या विश्व पटल पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बढ़ते कद और प्रभाव का असर है, जिसकी वजह से नेपाल की नीति नम्र हो चली ?
पिछले दिनों हुए कुछ बातों पर अगर दृष्टि डाली जाय तो लगता है कि सब कुछ सहज हो चला है । लम्बित सिंचाई सम्बन्धी सहसचिव स्तरीय बैठक कुछ समय पहले सम्पन्न हुई है । इसके साथ ही सुरक्षा सम्बन्धी द्विपक्षीय परामर्श समिति की बैठक भी हो चुकी है । दिल्ली में उर्जा सम्बन्धी सचिव स्तरीय बैठक हुई । वर्षों से विवादित सीमा सम्बन्धी द्विपक्षीय बैठक भी हाल में ही काठमान्डौ में सम्पन्न हुआ है । द्विपक्षीय अन्तरसरकारी समिति की बैठक भी हो रही है । सन् १९५० की संधि समझौते के पुनरावलोकन के लिए बने प्रबुद्ध समूह की बैठक भी काठमान्डौ में शुरु हो चुकी है । अन्य समस्याओं जैसे पेट्रोलियम पदार्थ, गैस आदि की आपूर्ति के विषय में भी सम्बन्धित निकायो के अधिकारियों की भारत से बातचीत प्रारम्भ है । इन सारे कार्यों की तीव्रता कुछ तो संदेश देती है । या तो भारत का रुख बदला है या फिर नेपाल का चीन मोह कम हुआ है । प्रधानमंत्री ओली ने भारत यात्रा में सात सूत्रीय समझौते किए थे और चीन यात्रा में १० सूत्रीय समझौते हुए थे और चीन के साथ हुए समझौते से सरकार ही नहीं यहाँ की जनता विशेष भी काफी उत्साहित थी । चीन की रेल नेपाल में दौड़ने भी लगी थी । किन्तु एक कटु सत्य यह है कि चीन से चाहे कितने भी समझौते नेपाल कर ले परन्तु उसका कार्यान्वयन यथार्थ में सहज नहीं है । चीन से हुए समझौते कर्णप्रिय अवश्य थे किन्तु उसका सुख नेपाली जनता कब लेगी यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि चीन और नेपाल की भौगोलिक परिस्थितियाँ या संरचना ऐसी है कि यह सब सहज हो ही नहीं सकता । चीन भारत की तरह तो सहृदय हो ही नहीं सकता । चीन की विस्तारवादी नीति और महात्त्वाकाँक्षा जग जाहिर है और वह अपनी सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं कर सकता है । उसे तो अपनी जनता पर यकीन नहीं है तो वह किसी और देश पर कैसे यकीन करेगा ? हाल में ही चीन ने अवांछित गतिविधि का हवाला देते हुए कोरला नाका को बंद कर दिया है । व्यापारिक मेला के लिए खोले गए नाका को बिना किसी पूर्व सूचना के चीन ने बंद कर दिया है । पर चीन की इस हरकत पर कहीं कोई सुगबुगाहट नजर नहीं आई जबकि अगर यही काम भारत ने किया होता तो आलम कुछ और होता । सीमाएँ तो भारत और नेपाल की खुली हुई हैं और नेपाल की भूमि से जिस सहजता के साथ भारत विरुद्ध घटनाओं को अंजाम दिया जाता है वो भी सर्वविदित है । ऐसे में भारत का नेपाल की राजनीति में दिलचस्पी लेना स्वाभाविक सी बात है ।

प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा है कि संविधान का पुनर्निमाण नहीं होगा । बात उन धाराओं में संशोधन की थी जिससे मधेश असंतुष्ट है, पर यह बात भी आज तक अपनी जगह ही कायम है ।

परन्तु यही नेपाल की सत्ता और जनता को पचती नहीं है । यह तो स्पष्ट है कि नेपाल चाहे कितनी भी दुहाई दे या वितृष्णा के बीज बोए अन्ततः इसके विकास की सम्भावना भारत से ही जुड़ती है । फिलहाल नेपाल और भारत के बीच पारवहन एवं रेलवे समझौता के लिए बातचीत चल रही है ।
हाल ही में मुख्य सचिव सोमलाल सुवेदी सहित उच्चस्तरीय नेपाली टोली ने भारत के विशाखापट्टनम पहुँचकर बन्दरगाह का सांकेतिक उद्घाटन किया है । वैसे यह अलग बात है कि हमारे प्रधानमंत्री ने आगामी दिनों में नेपाल में ही पानी जहाज चलाने की घोषणा कर दी है । विशाखापट्टनम बन्दरगाह के सम्बन्ध में प्रधानमंत्री ओली की भारत यात्रा के समय में ही समझौता हुआ था । ध्यातव्य है कि इस बन्दरगाह में सभी आधुनिक सेवा उपलब्ध है और बड़े जहाजों से सामान लाने की सुविधा भी है । कोलकाता से करीब दोगुना दूरी होने के बावजूद भी यहाँ से पारवहन करना नेपाल के लिए १५प्रतिशत सस्ता पड़ता है । इसी बीच नेपाल भारत पेट्रोलियम पाइपलाइन निर्माण कार्य बढाने के लिए भारतीय टोली का भ्रमण हो चुका है । भारतीय आयल कार्पोरेशन के महाप्रबन्धक सुब्रता गाँगुली के नेतृत्व की टोली ने रक्सौल अमलेखगंज पाइपलाइन का कार्य आगे बढाने के सम्बन्ध में बातचीत शुरु कर चुके हैं ।
इन सारी बातों से जो तथ्य सामने आ रहा है, वो यह कि नेपाल भारत के बीच जो रिश्ते ठण्डे होने लगे थे, उस रिश्ते में एक बार फिर गर्माहट नजर आ रही है । ओली के चीन भ्रमण और उसके बाद की राष्ट्रवाद को उकसाने वाली बयानबाजी और फिर राष्ट्रपति विद्या भंडारी की भारत भ्रमण का स्थगन, भारत से नेपाल के राजदूत दीपकुमार उपाध्याय को वापस बुलाने की कार्यवाही और इतना ही नहीं काठमान्डौ स्थित भारतीय दूतावास से भारतीय राजदूत रंजीत राय की वापसी की चर्चा ने दोनों देशों के बीच गहरी दूरी ला दी थी । इस दूरी को कम करने की पूरी कोशिश जारी है । इस सन्दर्भ में यह भी देखा जा सकता है कि विश्वयोग दिवस में नेपाल ने भी भारतीय दूतावास के साथ मिलकर इसे मनाया, स्वयं प्रधानमंत्री इस समारोह में शरीक हुए । यह शायद रिश्तों को सुधारने की पहल ही मानी जानी चाहिए । विदेश मंत्री कमल थापा की पिछली भारत यात्रा से भी सम्बन्ध में कुछ सुधार नजर आ रहे हैं । सम्बन्ध को सुधारने के क्रम में ही दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय भ्रमण की व्यवस्था में अधिकारी लगे हुए हैं । भारतीय राजदूत श्री रणजीत राय ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यह कहा है कि बहुत जल्द दोनों देशों के राष्ट्रपति की भ्रमण की सम्भावना है । अर्थात् जो दरार आई थी उसे भरने की पुरजोर कोशिश की जा रही है ।

मधेश को भारत ने एक मौका दिया तो अवश्य था कि वो अपने अधिकार को हासिल कर सके, किन्तु एक लम्बे आन्दोलन और असंख्य शहादत के बाद भी मधेश आज तक खाली हाथ है ।
इन सब के बीच जो एक अहम बात है, वो यह कि दो देशों के बीच कड़वाहट की जो मूल वजह थी अर्थात् मधेश मसला क्या वो खत्म हो गया है ? भारत के उपर ये आरोप लगा कि उसने मधेश आन्दोलन को समर्थन दिया इसलिए नाकाबन्दी का सीधा आरोप भारत पर लगाया गया । भारत विरोध की ऐसी हवा चली कि भारत के झंडे जलाए गए, गालियाँ दी गई । देखा जाय तो यह माना जा सकता है कि परोक्ष या अपरोक्ष रूप से भारतीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने मधेश का साथ दिया यह कह कर कि, संविधान में मधेशियों के अधिकार को सुनिश्चित किया जाय । यही बात यहाँ की सत्ता को गँवारा नहीं हुई और राष्ट्रवाद की तीखी बयार चल पड़ी ।

सवाल यह है कि यह कैसे मान लिया जाय कि इन सारी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति फिर नहीं होगी ? क्या अब भारत की आवाज मधेश के लिए नहीं उठेगी ? क्या भारत यह नहीं समझता कि मधेश उसके लिए कितना अहम है ? मधेश अगर आन्दोलित रहा और अव्यवस्थित रहा तो इसका सीधा असर भारत की सीमावर्ती राज्यों पर पड़ेगा । जो शायद भारत नहीं चाहेगा, वैसे इसका खामियाजा सिर्फ भारत को नहीं बल्कि दोनों देशों को उठाना पड़ सकता है, क्योंकि मधेश आज भी आन्दोलित ही है । आन्दोलन आज भी बिना किसी निष्कर्ष के खुला मंच पर अनशन के रूप दिखाई दे रहा है ।

यह और बात है कि मोर्चा के नेता अपनी पार्टियों को मजबूती प्रदान करने में लगे हुए हैं । परन्तु एक असर यह दिख रहा है कि जिस काँग्रेस ने संविधान जारी किया आज वही काँग्रेस मोर्चा के अनशन में अपनी एक्यबद्धता दिखा रही है और जिस सत्ता ने मौत बाँटी वही सत्ता आन्दोलन में शहादत हुए परिवार को राहत बाँट रही है, संविधान निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रचण्ड मधेशियों की माँग को अब सही बता रहे हैं, तो बाबूराम भट्राई अचानक देश और जनता के हितों के फरिश्ते के रूप में स्वयं को स्थापित करने और शक्ति प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं । अर्थात् चेहरे वही हैं, परिस्थितियाँ भी ज्यों की त्यों है पर कुछ महीने पहले आखिर इन सबकी सोच किस दिशा में जा रही थी कि ६० से अधिक बेकसूर इसी सरकार की गलत नीति और सोच का शिकार होकर असमय कालकवलित हो गए, देश की आर्थिक स्थिति चरमरा गई, आम जनता तस्करी, कालाबाजारी और मंहगाई की मार झेलने को विवश हो गई और आज यही नेतागण मधेश समर्थन की भाषा किस आधार पर बोल रहे हैं ? अर्थात् सीधा सा जवाब है कि यह सब सत्ता प्राप्ति के लिए ही किया जा रहा है जहाँ न तो जनता मायने रखती है न उसकी मौत और न ही उनकी अधिकार प्राप्ति की इच्छा ।
इस बदलते परिवेश में क्या यह माना जाय कि आन्दोलन ठन्डा हो गया या वत्र्तमान सरकार अनायास मधेश के लिए सकारात्मक हो गई है ? जी नहीं परिदृश्य आज भी ज्यों की त्यों है । मधेश की माँग आज भी पूर्ववत है और सरकार की उदासीनता भी अपनी जगह कायम है । संविधान संशोधन की माँग को संविधान पुनर्लेखन का एक नया नाम देकर और इसकी गलत व्याख्या कर के बातों को आज भी उलझाने की कोशिश जारी है । संविधान पुनर्लेखन का तात्पर्य यह तो बिल्कुल नहीं है कि पूरे संविधान की धाराओं का पुनःलेखन । हाँ जो विवादित हैं, अस्पष्ट हैं, जिनसे मधेश की जनता असंतुष्ट है उन्हें परिमार्जित करने की माँग अवश्य है और यह कोई ऐसी माँग नहीं है जिसे माना न जा सके । बल्कि संशोधन भी हो ही चुका है, भले ही यह किसी पक्ष विशेष को दिखाने के लिए या तुष्ट करने के लिए हुआ हो । सत्ता आज भी अपनी ही जिद पर अड़ी हुई है । संविधान संशोधन को पुनर्निमाण का नाम देकर उससे बचा जा रहा है ।

प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा है कि संविधान का पुनर्निमाण नहीं होगा । बात उन धाराओं में संशोधन की थी जिससे मधेश असंतुष्ट है, पर यह बात भी आज तक अपनी जगह ही कायम है ।
समस्या पूर्ववत है, किन्तु नेपाल और भारत की राजनीति की हवा ने अपना रुख बदल लिया है । मधेश को भारत ने एक मौका दिया तो अवश्य था कि वो अपने अधिकार को हासिल कर सके, किन्तु एक लम्बे आन्दोलन और असंख्य शहादत के बाद भी मधेश आज तक खाली हाथ है । मधेशी मोर्चा आज जिस गठबन्धन के साथ आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है, उसकी जरुरत उस वक्त थी । लेकिन सबने वर्चस्व की भावना को सर्वोपरि रखा और वक्त बिना निष्कर्ष के आगे बढ़ गया । विडम्बना तो यह है कि एक मंच पर आने के बाद भी मोर्चा और गठबन्धन इन दो शब्दों की लड़ाई में लक्षित लक्ष्य पीछे पड़ रहा है । इस मतभेद का सीधा फायदा अगर किसी को मिलेगा तो वह है सत्ता पक्ष । सत्ता इस बात का पूरा फायदा लेगी क्योंकि वार्ता का अवसर एक बार फिर टल चुका है । जाहिर तौर पर अगर देखा जाय तो सत्ता वार्ता के लिए गम्भीर है ही नहीं । वो हर बार एक पाशा फेकती है कि क्या पता यह दाँव चल जाय और फिर सम्भावना ना देख कर अपने पैर पीछे कर लेती है । यह तो तय है कि मधेश को अपनी अधिकार की लड़ाई स्वयं लड़नी होगी । क्योंकि कोई भी तीसरा पक्ष अपनी हानि कर के साथ नहीं दे सकता । फिलहाल नेपाल की राजनीति में सत्ता परिवत्र्तन के लिए भीतरी तौर पर रस्साकशी जारी है । प्रचण्ड की असंतुष्टता कोई ना कोई रंग तो अवश्य दिखाएगी क्योंकि प्रधानमंत्री अपनी भद्र सहमति से पीछे हट चुके हैं । देखना अब यह है कि राजनीति का ऊँट किस करवट बैठता है ।

Loading...