भारत की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम १८५७ : भूमिहार ब्राह्मण का योगदान : प्रेमचन्द्र सिंह

प्रेमचन्द्र सिंह, लखनऊ | भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध पहली बार खूनी क्रांति का श्रीगणेश वर्ष-१८५७ में हुआ और स्वतंत्रता के प्रथम सशस्त्र संघर्ष की शौर्य-गाथा रचनेवाले वीर योद्धाओं, अपनी प्राणों की आहुति देनेवाले राष्ट्रवादी देशभक्त शहीदों को इतिहास के पन्नों से अछूता रखना इतिहासकारों की घोर उपनिवेशवादी मानसिकता को प्रदर्शित करती है। स्वतंत्रता की इस प्रथम भीषण एवम उग्र जनाक्रोश ने भले ही अंग्रेजों को भारत से बिदा करने में सफल नही रहा हो, फिर भी भारत की सत्ता को एक ब्रिटिश निजी कंपनी ( ईस्ट इंडिया कंपनी) के हाथों से छीनकर ब्रिटिश लोकतांत्रिक पार्लियामेंट के हाथों में हस्तांतरण का गौरव एवम श्रेय निर्विवादित तौर पर इन क्रांतिकारी शहीदों के खाते में जाता है। भारत की इस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अनेक महान राष्ट्रप्रेमियों ने अपनी शहादत देकर इतिहास रचा, लेकिन इतिहासकारों की पक्षपातपूर्ण मानसिकता ने उनकी वीरगाथा को गुमनामी के अंधेरों में रहने को विवश किया। कुछ ऐसे ही अछूते प्रसंगों को यहां सार्बजनिक करने का प्रयास है।

स्वतंत्रता-संग्राम के सूत्रधार-मंगल पांडेय :—

             भारत के प्रथम स्वतंत्रता की लड़ाई वर्ष-1857 में प्रारम्भ हुई जिसे अंग्रेजों द्वारा ‘गदर’ कहा गया। इस संग्राम का बिगुल अमर शहीद मंगल पाण्डेय नामक एक भूमिहार ब्राह्मण ने 29 मार्च,1857 को कलकत्ता के समीप बैरकपुर छावनी में फूंका था। मंगल पाण्डेय जी का जन्म 19 जुलाई, 1827 को ग्राम सुरहुरपुर तहसील अकबरपुर जिला फैज़ाबाद में हुआ था। उनके पिता का नाम दिवाकर पाण्डेय था। उनके पिता सुरहुरपुर के मूल निवासी नही थे। उन्हें वहां किसी रिश्तेदारी में नवासा मिला था। कुछ लोग मंगल पांडेय जी का जन्म नगवा, बलिया भी बताते है। मंगल पाण्डेय जी वर्ष-1849 में 22 वर्ष की उम्र में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की इंडियन नेटिव आर्मी (बी.एन.आई.) की 34 वी रेजिमेंट के पांचवी कंपनी के सिपाही बने। अंग्रेज अफसरों, सैनिकों पर उन्होंने ही सबसे पहले गोली चलाई थी और स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई की थी, जिसके कारण 8 अप्रैल, 1857 को उन्हें फाँसी दे दी गयी थी। कहा जाता है कि मंगल पाण्डेय जी की शारीरिक शक्ति अतुलनीय थी। वह गोर, सुंदर, अत्यधिक लंबे और रोबीले सिपाही थे। शहादत के समय उनकी उम्र मात्र 30 वर्ष की थी।

             प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बागडोर बहादुर शाह जफर, पेशवा नाना साहब, बख्त खाँ, अजीमुल्ला खाँ, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मी बाई, बाबू कुँअर सिंह, राजा बेनी माधो सिंह जैसे महानायकों के हाथ मे था। उस समय केवल व्यक्तिगत शूरता के कारण क्रांति के लिए निर्धारित समय से पूर्व ही अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़कर मंगल पांडेय जी ने भारत के साथ-साथ ब्रह्मऋषि वंश की पताका भी ऊंची कर दी।

क्रांति का विस्तार :—

           स्वतंत्रता संग्राम उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रान्त से लेकर आसाम तक, मध्य भारत तथा दक्षिण-पश्चिम भारत के विभिन्न हिस्सों में घनघोर रूप ले चुका था। मार-काट चरम सीमा पर थी। हैवलाक, आउट्रम, नील, हियूरोज, कोलिन कैम्पवेल जैसे अनुभवी अंग्रेज सेना नायक इसे दबाने के लिए जूझ रहे थे। उस काल में जहाँ भी भूमिहार ब्राह्मणों की उल्लेखनीय आबादी थी, वहाँ-वहाँ उन्होंने पूरी ताकत से फिरंगियों के विरुद्ध लोहा लिया। यह एक अछूता प्रसंग है कि किस प्रकार बिहार में तथा उत्तरप्रदेश के गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़,जौनपुर, देवरिया, बनारस, मिर्जापुर जिलों में, जहां भूमिहार ब्राह्मणों की पर्याप्त आबादी थी, प्रख्यात योद्धा ठाकुर कुँवर सिंह के नेतृत्व में भूमिहार ब्राह्मणों एवम राजपूतों ने अपना साथ-साथ खून बहाया था। अन्य जातियों ने भी उनके साथ अपना कंधा-से-कंधा लगाकर मोर्चा संभाला था। इन प्रसंगों को कही-कहीं विस्तार से, कहीं-कहीं छोटे-छोटे खंडों में लंदन स्थित ब्रिटिश म्युजियम तथा ब्रिटिश पुस्तकालयों में रखा हुआ है। बहुत विस्तार में न जाकर इस यशोगाथा के कुछेक प्रसंगों को यथासंभव यहाँ उद्धृत करने का प्रयास है।

काशी नरेश का रबैया:—

            मुगल और अंग्रेजों की कटुता को देखते हुए काशी नरेश ने मुगल समर्थक मोना राजपूतों को अपने राज्य क्षेत्र, विशेषकर बनारस तथा मिर्जापुर से बाहर कर दिया था ताकि अंग्रेजों से काशी नरेश के संबंध न बिगड़े। परन्तु 37 वी बी.एन. आई. रेजिमेंट के भूमिहार ब्राह्मणों ने महाराजा, बनारस को बहादुर शाह जफर से मिलने को राजी कर लिया। इन भूमिहार ब्राह्मण सैनिकों ने मोना राजपूतों के निर्वासन का भी घोर विरोध किया। मामला यहां तक आ पहुंचा कि जब भूमिहार ब्राह्मण सिपाहिगण महाराजा के विरुद्ध सशत्र संघर्ष पर आमादा हो गए तो काशी नरेश मान गए कि वह क्रांति के दौरान तटस्थ रहेंगे।

             पूर्वांचल में अंग्रेज 7 जून, 1857 को जब विद्रोही 37 वी यूनिट के सैनिकों के हथियार वापस ले रहे थे, तब बनारस तथा गाजीपुर क्षेत्र भड़क गया और जनता विप्लवी बन गयी। काशी नरेश भूमिहार ब्राह्मण थे और उनके विरुद्ध स्वयं भूमिहार ब्राह्मण हीं खड़े हो गए। 17 वी बागी यूनिट के देशी सिपाहियों ने 15 जून, 1857 को सिकंदरपुर तथा बलिया में विद्रोह कर दिया। वे कस्वे को कब्जे में ले लिए। ब्रिटिश खजाने को लूट लिया गया। अंग्रेजों के बंगले जला दिए गए।

               आजमगढ़ तथा बलिया के अंग्रेज अधिकारी और निलहे जमींदार गाजीपुर में शरण लिए हुए थे, तभी सेना की 65 वी यूनिट गाजीपुर में विद्रोह कर दिया। इस यूनिट के अधिकाधिक सैनिक भूमिहार ब्राह्मण थे। गहमर क्षेत्र में अनेक भूमिहार जमींदार अंग्रेजों तथा काशी नरेश के समर्थक थे। इन भूमिहार ब्राह्मण जमींदारों का विरोध सिपाही शंकर राय तथा सिपाही भूमि राय ने किया। इन सिपाहियों ने  क्षेत्र के भूमिहार ब्राह्मणों को अपने पक्ष में कर लिया और अंग्रेजों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। अचरज राय, शिवराज राय, बोदी राय, बालक राय और देवी राय ने भी इसका समर्थन किया।

              शिवराज राय ने अंग्रेज रोबर्ट स्मिथ कुम्ब को ‘गेट आउट’ कहकर बक्सर भगा दिया। फलस्वरूप भूमिहार ब्राह्मणों तथा राजपूतों ने भदौरा तथा चौसा स्थित अंग्रेजों के नील कारखानों में आग लगा दी। उन्होंने अंग्रेजों के सभी प्रतीकों को मिटा दिया। अंग्रेज कुम्ब की जमीन भूमिहार ब्राह्मणों तथा चमारों में बांट दी गयी। भूमिहार ब्राह्मणों की अफवाह दल (प्रोपगंडा पार्टी) द्वारा इस घटना को देवरिया, चंपारण, बेतिया तथा छपरा तक फैला दिया गया जिससे क्रांति और भड़क गई।

लखनऊ-पतन के बाद का घटनाक्रम :—

             बंगाल आर्मी के अधिकांश सिपाही उत्तर बिहार, भोजपुर, मगध यथा उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के थे। लखनऊ के पतन के पश्चात भूमिहार ब्राह्मण एवम पठान सैनिकों ने बनारस के राजा के सैनिकों तथा जौनपुर के पुलिस कर्मचारियों को काट डाला। भूमिहार ब्राह्मण 1857 की क्रांति में बहुत सक्रिय थे, वहीं अहीरों ने 1858 में इसे दुहराया। भूमिहार ब्राह्मण सामाजिक रूप से बहुत दबंग थे। जुलाई,1857 में विद्रोही सिपाहियों में उनके शामिल हो जाने से बेहतरीन लड़ाकू मिलिशिया का गठन हो गया।

               विद्रोहियों की बढ़ती संख्या अंग्रेजों के लिए चिंता का विषय था। अतरौलिया घटना के बाद पूर्वी गाजीपुर, विशेषकर जमानियाँ क्षेत्र मार्च, 1858 तक बहुत उग्र हो गया। उन्होंने सैदपुर-वाराणसी सड़क की घेराबंदी कर दी और बनारस के लिए खतरा बन गए। पूर्वांचल-संघर्ष में भूमिहार ब्राह्मणों का योगदान बहुत अधिक था। भूमिहार ब्राह्मणों ने ठाकुर मैगर राय के नेतृत्व में शाहाबाद और गाजीपुर से अधिकतम लड़ाकों को संघर्ष में झोंक दिया था।

            बाबू कुँवर सिंह के नेतृत्व में अतरौलिया घटना के बाद ग्रामीण पटना क्षेत्र में भूमिहार ब्राह्मणों ने वर्ष-1858 में भारी तबाही मचाई। भूमिहार ब्राह्मणों एवम पठानों ने संग्राम सिंह के नेतृत्व में मड़ियाहूं ( जौनपुर) पर धावा बोल दिया। निचलौल (गोरखपुर जिला) में इंडियन कैवेलरी ( घुड़सवार सैनिक दस्ता और तोपखाना) सलेमपुर, देवरिया में अंग्रेजों के खिलाफ हो गयी। यूनिट का नेतृत्व सर राटन कर रहा था। वहां राजपूतों तथा भूमिहार ब्राह्मणों ने अफीम एजेंटों तथा अंग्रेजों का कत्ल कर दिया। इस घटना से अंग्रेजों के मित्र राज्य हथुआ तथा बेतिया के राजा बहुत डर गए। विद्रोही मुकुंद राय ने चक्रधरपुर ( चाईवासा जिला) में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांतिकारियों की अगुआई की।

बिहार के प्रमुख राजघरानों की भूमिका:—

         उस समय बिहार में सात प्रमुख राजघराने थे और इन राजघरानों का नाम था–टेकारी, हथुआ, बेतिया, दरभंगा, डुमरांव, जगदीशपुर और हसुआ। इनमे से कई के संबंध समय-समय पर अंग्रेजों से खराब रहे। टेकारी के भूमिहार ब्राह्मण राजा तथा हसुआ के मुसलमान राजा की दोस्ती तत्कालीन मुगल सम्राट शाह आलम से थी, जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध वर्ष-1760 में बक्सर का युद्ध लड़ा। जगदीशपुर का राजपूत राजघराना अंग्रेज-मराठा युद्ध में मराठों की ओर से अंग्रेजो से बहादुरी से लड़ा। बेतिया, मुजफ्फरपुर, भोजपुर तथा दरभंगा में भूमिहार ब्राह्मणों एवम राजपूत सैनिकों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे।

                 उत्तरप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में उस समय अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह की आग पट्टीदारों, बड़े तालुकेदारों और मुसलमान(मुगल) अभिजात्य वर्ग ( Elite class) ने लगाई थी। इससे बहुत फर्क नही पड़ता, अगर पूर्वी जिलों के भूमिहार ब्राह्मण एवम राजपूतों ने इस आंदोलन का नेतृत्व न संभाला होता।

        दिलदारनगर संघर्ष (Dildar nagar Stand off) में गहमर के ठाकुर मैघर राय का साथ भूमिहार सरदारों विशेषकर शिवगुलाम राय, रामप्रताप राय, शिवचरण राय, रामजीवन राय, शिवपाल राय, रोशन राय, मोहन राय तथा तिलक राय ने दिया था। ब्रिटिश इतिहासकारों ने अपने अभिलेखों में भूमिहार ब्राह्मणों को बहुत खतरनाक एवम आक्रामक व्यक्तित्व दर्ज किया है।

महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों का युद्ध-कौशल:—

               भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में यदि ब्रहमर्षि वंश का कोई अन्य शाखा ने भूमिहारों जैसा संघर्ष किया तो वे महाराष्ट्र मूल के चितपावन ब्राह्मण ही थे। उनके तत्कालीन कर्णधार पेशवा नाना साहब, रानी लक्ष्मी बाई, तांत्या टोपे के साथ-साथ जालौन, गुरसराय तथा सागर के राजा थे और वे सबके सब चितपावन ब्राह्मण थे। उन्होंने मध्य भारत तथा मध्य उत्तरप्रदेश में कान्यकुब्ज शौर्य को दुहराया। इलाहाबाद एवम झूंसी में विद्रोह की अगुआई मौलवी लियाकत अली तथा भूमिहार ब्राह्मण सुखदाय ने की। इनके साथ मेजा और बारा क्षेत्र के भूमिहार ब्राह्मण एवम मुसलमान सिपाही थे। इनका साथ राजपूतों, कुर्मियों, ब्राह्मणों, कलवारों और चमारों ने दिया था।

           प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व ही अंग्रेजों को राजा राममोहन राय ने चेतावनी दी थी कि वे गंगा के मैदानों की लड़ाकू जातियों के सामाजिक प्रथाओं में हस्तक्षेप न करें। उनसे छेड़छाड़ न करें क्योंकि इन्ही जातियों में क्षेत्रीय एवम जातीय भावना प्रबल है। भूमिहार ब्राह्मण एवम राजपूत जातियों के परम्परा तथा याददाश्त सदियों पीछे तक उन्हें ले जाती थी। पंजाबियों में भी इसीतरह का गर्वीला स्वभाव है, लेकिन अगर एक बार वे पिट गए तो वे पीछे हट जाते हैं तथा हथियार डाल देते हैं।

              कानपुर में नाना साहब की पराजय के बाद संघर्ष का केंद्र उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल एवम बिहार हो गए। दानापुर स्थित 7 वी, 8 वी तथा 40 वी रेजिमेंट बहुत महत्वपूर्ण हो गयी। उनमे अधिकाधिक सैनिक भूमिहार ब्राह्मण एवम राजपूत ही थे, जिनका संबंध भोजपुरी तथा भगाही क्षेत्र से था। यदि इन रेजिमेंटों के सिपाही थोड़ा पहले ही यानी जुलाई, 1857 में ही विद्रोह कर देते, तो कर्नल नील को उनके आक्रामक तूफान को रोक पाना असंभव हो जाता। इन रेजिमेंटों के विद्रोह के समय तो कलकत्ता की ओर से अंग्रेज सैनिक बहुत बड़ी संख्या में नदी मार्ग और ग्रैंडट्रंक मार्ग से इलाहाबाद की ओर कुच कर रहे थे।

         एक अंग्रेज अधिकारी हीदर स्ट्रीट, ब्राह्मण योद्धाओं की अंग्रेजो के विरुद्ध वर्ष-1857 की जंग तथा नफरत से चिढ़कर लिखता है कि “ यदि हमने ब्राह्मणों पर भारत मे लगाम नही लगाई और शिकंजा नही कसा, तो इस देश मे हमारे पांव नही जमेंगे। हमने इस नमकहराम जाति का बहुत सह लिया। अब हम आगे किसी सशस्त्र सवर्ण जाति पर कभी विश्वास नही करेंगे। हमने उन्हें सत्ता में भागीदार बनाया, फिर भी उन्होंने कैसी दगाबाजी की ? कानपुर में 100 अंग्रेज बच्चों तथा औरतों की अभागी लाशें, उन बहादुर ब्राह्मण सैनिकों की बहादुरी का बखान कर रही है।”

उपसंहार :—

               वर्णित उद्धरणों से स्वतः स्पष्ट है कि योद्धा ब्राह्मणों विशेषकर भूमिहार ब्राह्मणों एवम चितपावन ब्राह्मणों ने 1857 की स्वतंत्रता संग्राम में जिस तरह अपनी प्राणों की आहुतियां देकर भारत माता को आजाद कराने का अपूर्व एवम अतुलनीय साहस का प्रदर्शन किया, उनकी शौर्य और पुरुषार्थ की गाथा को इतिहास में जो स्थान मिलना चाहिए,वह नही मिल पाया। उल्लिखित उद्धरण समेत अनेक बीरगाथायें कहीं-न-कहीं गुमनाम पन्नों में अंकित रह गया, जिन्हें सहेजने की आवश्यकता है।

              “इतिहास रचना अगर पराक्रम की सीमा है,

              तो इतिहास सहेजना भी जुनून की सरहद है।”

आभार :

         विकिपीडिया फ्री इनसाइक्लोपीडिया मंगल पांडेय, अमरेश पांडेय द्वारा लिखित ट्रू स्टोरी ऑफ ऐन इंडियन रेवोल्यूशनरी, रेट्रीब्यूशन- दी दिल्ली गैजेट-1857 आदि।

प्रेमचन्द्र सिंह

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