भारत की भूमिका पर प्रश्न चिह्न क्यों ? श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति

काठमांडू,२५ जून २०१५ | हमने देखा कि विपत्ति की घड़ी में दो विपरीत दिशा में चलने वाले देश भारत और चीन ने मिलकर उद्धार कार्य में हाथ बँटाया । किन्तु भारत की भूमिका पर जो प्रश्न चिह्न लगाए गए, उसकी वजह से यह कहने की आवश्यकता पड़ी कि आखिर हम क्यों उस सहयोग को अनदेखा कर गए जिसने हर तरह से हमारी सहायता की । सहयोग को अनदेखा कर हमने कई विवादों को जन्म दिया । कभी विमानस्थल की व्यवस्था बिगड़ने की बात सामने आई, तो कभी सिर्फ अपनों की सहायता करने का आरोप लगाया गया । किन्तु सोचने वाली बात यह है कि, क्या बेवजह हेलीकॉप्टर या हवाई जहाज आए थे ? जो भी आए वो राहत सामग्री लेकर आए और यहाँ से भारतीय पर्यटक और अन्य लोगों को लेकर गए । अगर ऐसा नहीं करते तो क्या उन्हें यहाँ फँसा रहने दिया जाता ? पूर्व काठमान्डू और पूर्व पोखरा से लगभग हजारों पर्यटकों और नेपालियों का उद्धार किया गया । जिसमें नेपाली सेना का पूरा सहयोग इन्हें मिला । बारपाक और अन्य दुर्गम स्थानों पर जहाँ उस वक्त जाना सहज नहीं था वहाँ जाकर भारतीय सेना ने सहायता सामग्री पहुँचाई, मलबों में दबे लोगों को निकाला, लाशों को निकाला । किन्तु यह सब एक क्षण में भुला दिया गया । भारतीय मीडिया की भूकम्प सम्बन्धी प्रस्तुति और चंद ऐसे भारतीय पत्रकार जो विवादित बयान देकर ही सुर्खियों में रहना चाहते हैं, उनके बयानों का आसरा लेकर जमकर भारत विरोधी नारे लगाए गए, भारतीय प्रधानमंत्री के पुतले जलाए गए । क्या ये शोभनीय था ? यह आक्रोश उस वक्त सामने क्यों नहीं आया जब राहत सामग्री के साथ बाइबल बाँटा गया, जब खाद्य पदार्थों में गोचर्बी और गोमाँस शामिल होने की बात सामने आई । क्या ये हमारे धर्म, हमारी संस्कृति के खिलाफ नहीं था ? उस वक्त कोई प्रदर्शन, कोई पुतला क्यों नहीं जला ? विध्वंश की जो कहानी भारतीय मीडिया ने दिखाई, यह उसी का प्रभाव था कि हर ओर से सहायता के हाथ तत्काल बढ़े । विश्व के हर कोने में हमारी स्थिति तुरन्त पहुँची । नेपाली मीडिया जिन खबरों तक पहुँच नहीं पा रही थी, उन खबरों को जन–जन तक भारतीय मीडिया ने पहुँचाया । भारत की अरबों जनसंख्या हमसे और हमारी तकलीफ से परिचित हुई और हर प्रांत हमारी सहायता के लिए आगे आया । काठमान्डू में लंगर डाले गए हजारों की संख्या में पीडि़तों को भोजन उपलब्ध कराया गया । भारतीय दूतावास की ओर से जगह–जगह पर खाने की व्यवस्था की गई स्वयं भारतीय राजदूत महोदय ने शिविरों में जाकर व्यवस्था का जायजा लिया और हम ये सब भूल गए । किसी एक की गलती की सजा सबको तो नहीं दी जा सकती है । वर्षों से जो भारत के प्रति एक विरोधी भावना यहाँ के चंद जनमानस में पनपती रही है, उन्हें यह सहन नहीं हुआ कि, अचानक भारत विरोधी उस भावना का अंत हो जाय जिसे वर्षों से वक्त–वे–वक्त जिन्दा किया जाता रहा है, और विरोध की अग्नि को भड़काने के लिए उसे हवा दी जाती रही है । यही वजह थी कि एक कमजोर से मुद्दे को हवा देकर सहयोग की धार को मोड़ दिया, उन्होंने विरोध की ओर । यह राष्ट्रीयता की भावना सिर्फ भारत के सम्बन्ध में ही उभर कर क्यों आती है ? उस वक्त क्यों नहीं उभरती जब अन्य पड़ोसी मित्र हमारी भावनाओं से खेलते हैं और हमारी परम्परा तथा संस्कृति का मखौल उड़ाते हैं ? जनता उद्धार की प्रतीक्षा में मर रही थी और ऐसे में देश की सुरक्षा और राष्ट्रीयता का हवाला देकर विदेशी सहयोग को ठुकराया जा रहा था । नेपाल और नेपाली शान से कहते हैं कि यही एक देश है जिसका कोई दुश्मन नहीं है तो फिर आने वाले हर सहयोग को शंकित निगाहों से क्यों देखा जा रहा है ? माने या ना माने किन्तु विपत्ति में ही मित्र और विरोधियों की पहचान होती है । पड़ोसी बदले नहीं जा सकते और हमारे सुख दुख में वही हमारे साथ होते हैं ।

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