भारत को“मोस्ट फेवर्ड नेशन” घोषित करें बाहर के नेपालियों की शर्त कितना संभव ! श्वेता दीप्ति

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श्वेता दीप्ति, काठमांडू, १३ दिसिम्बर | कभी संशोधन की तैयारी, कभी निर्वाचन की तैयारी तो कभी संविधान कार्यान्वयन की तैयारी देश का यह एक पक्ष है, तो दूसरा पक्ष है आन्दोलन के आँधी की तैयारी, विरोध की तैयारी, संसद ठप्प करने की तैयारी और इन तैयारियों के बीच हमारा लाचार देश किसी तरह सम्भलने की तैयारी कर रहा है । यानि तैयारियों का दौर चल रहा है ।

हर किसी को अपनी पड़ी है और इन सबके बीच पड़ोसी देश को परम्परागत रूप से गाली देना भी नहीं भूल रहे हैं, जो यहाँ की सबसे अहम नीति है । काफी मशक्कत के बाद सरकार किसी तरह संसद में संशोधन विधेयक लेकर आई किन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात, वैसे यह परिणाम नया नहीं था । यह तो तयशुदा था कि एमाले इसका विरोध जम कर करने वाली है । किन्तु अन्य दल भी इस संशोधन विधेयक को लेकर उत्साहित नहीं हैं । राप्रपा सोच नहीं पा रही कि उसे किस नीति को लेकर आगे बढना है, सरकार में शामिल होना है या हिन्दू राष्ट्र की माँग को हवा देना है क्योंकि चुनाव का शोर भी शुरु हो चुका है । मधेशी मोर्चा कुछ परिमार्जन के साथ इस संशोधन को स्वीकार करने की मनःस्थिति बना चुकी है, वहीं नया शक्ति को भी यह विधेयक रास नहीं आ रहा । एमाले संसद गतिरोध करते हुए आन्दोलन की आँधी चलाने की ओर अग्रसर है । एमाले को संविधान संशोधन नहीं कार्यान्वयन चाहिए और तीनों तह का निर्वाचन भी । पूरे देश की हवा को अगर हम देखें तो जहाँ हर पार्टी की स्थिति देश के हर हिस्से में सामान्यतया एक जैसी है वहीं एमाले देश के हिस्से में विरोधियों के निशाने पर है, बावजूद इसके एमाले पूरी तरह विश्वस्त नजर आ रही है कि उसकी राष्ट्रवादी नीति और नारा उसकी नाव को किनारे लगा देगी । मोर्चा संशोधन विधेयक को सहमति देकर कुछ मुश्किल में नजर आ रही है ।

इन सबके बीच अगर नया शक्ति की ओर दृष्टि डालें, तो एक बात जो जाहिर तौर पर सामने आ रही है कि, वो आने वाले चुनाव को लेकर अपनी जमीन मजबूत करने में लगी हुई है । उपेन्द्र यादव के साथ का समीकरण यही इशारा कर रहा है । इसी बीच नया शक्ति ने एक और नया प्रयास किया है वो है नेपाल से बाहर के नेपालियों को संगठित करने का । इसी नीति को अमल करते हुए नया शक्ति ने भारत में बसे हुए नेपालियों को एकत्रित करने का काम नई दिल्ली में किया है । नया शक्ति से सम्बन्धित नेपाली भारत के १२ राज्यों में अपना संगठन बना चुके हैं । इन बारह राज्यों के प्रतिनिधियों ने अन्तराषर्ट्रीय नेपाली समाज के बैनर तले ११ दिसम्बर को नई दिल्ली में कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें लगभग एक हजार लोगों ने शिरकत की । नेपाल से इस पार्टी के जिम्मेदार सदस्य डा.प्रवीण मिश्रा, देवेन्द्र पौडेल, राजु नेपाली, पद्म राणा आदि कई व्यक्तियों की उक्त कार्यक्रम में सहभागिता हुई है । कार्यक्रम में शामिल भारत में रहने वाले नेपालियों की अगर माने तो उनका स्पष्ट तौर पर यह कहना था कि भारत में ८० लाख से लेकर १ करोड़ तक ऐसे लोग हैं जो नेपाल से यहाँ आकर बसे हुए हैं और रोजी रोटी चला रहे हैं । जिनमें कई ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी जमीन खरीद ली है, घर बना लिया है । बिना किसी भेदभाव के वो अपना जीवन बसर कर रहे हैं । लेकिन वर्तमान में जो नेपाल में भारत विरोधी वातावरण तैयार हुआ है उसका असर यहाँ भी पड़ने लगा है । इतना ही नहीं भारत के हर बडे शहरों में नेपाल के लड़के लड़कियाँ शिक्षारत हैं, उन पर भी इन बातों का बुरा असर पड़ सकता है । गौर करने की बात यह है कि ये माँग करने वाले नेपाली, मधेशी मूल के नेपाली नहीं थे, बल्कि पहाड़ी समुदाय के नेपाली थे । उनकी माँग थी कि नेपाल में इस स्थिति को जल्द से जल्द सुधारा जाय । उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि नेपाल में वर्तमान में जो कटुता की भावना घर कर गई है उसे दूर करना चाहिए । उन्होंने नया शक्ति के सामने शर्त रखी कि वो नया शक्ति को समर्थन देने के लिए तैयार हैं बशर्ते पार्टी जीतने के बाद उनकी माँगों को पूरी करने का वचन दें । उन्होंने स्पष्ट कहा कि वो सभी चुनाव के समय नेपाल जाएँगे और अपने मत का प्रयोग आपके हक के लिये करेंगे इतना ही नहीं आर्थिक सहयोग भी करेंगे किन्तु उन्हें भारत को “मोस्ट फेवर्ड नेशन” घोषित करना होगा, जो आज तक नहीं हुआ है ।

अब सवाल यह उठता है कि इनकी कौन सुनेगा ? क्योंकि इनके हिस्से में भी गाली के अलावा कुछ मिलने के आसार नजर नहीं आ रहे । परिस्थिति गवाह है कि मधेशी अगर अपनी बात कहते हैं या अधिकार की माँग करते हैं, तो उन्हें भारतीय, बिहारी कह कर दुत्कारने वाले कम नहीं है और यहाँ तो सीधी तौर पर भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन घोषित करने की माँग की जा रही है, ऐसे में उनके हिस्से में क्या आएगा ? देश के व्यापक हिस्से में बोली जाने वाली हिन्दी को जब यहाँ की भाषाओं में शामिल करने की उदारता नहीं दिखाई जाती । उसे विदेशी भाषा, भारत की भाषा कह कर अवहेलित किया जाता है, जबकि यही हिन्दी है जिसने यहाँ की शिक्षा के प्रचार प्रसार में अपनी अहम भूमिका निभाई है, जिसे यहाँ भरपूर प्यार भी मिलता है, किन्तु उसे ही जब एक सम्मानित जगह देने की बात आती है तो राष्ट्रवादिता खतरे में पड़ जाती है, अन्य भाषाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ने लगता है और विरोधी लहर फैल जाती है । ऐसे में इतनी बडी माँग मानने की सम्भावना नजर नहीं आती । भारत ने उस पाकिस्तान को लम्बे समय तक मोस्ट फेवर्ड नेशन माना जिसने भारत के लिए सदा बम और आतंक की भाषा का ही प्रयोग किया है परन्तु क्या हमारी राजनीति यह उदारता दिखा सकती है कि, किसी भी हालात में साथ देने वाले मित्र राष्ट्र को “मोस्ट फेवर्ड नेशन” की उपाधि प्रदान कर सके ?

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