भारत को शक है कि वहां तेल की खोज में लगे भारतीय जहाजों पर चीनी जहाज हमले कर सकते हैं। इन जहाजों को भारत ने अलर्ट भेजा है।

नई दिल्‍ली. दक्षिण चीन सागर में हक जताने की लड़ाई में चीन किसी भी हद तक जा सकता है। भारत को शक है कि वहां तेल की खोज में लगे भारतीय जहाजों पर चीनी जहाज हमले कर सकते हैं। इन जहाजों को भारत ने अलर्ट भेजा है। इसमें कहा गया है कि जैसे कुछ दिन पहले चीन के जहाज ने एक जापानी जहाज को टक्‍क्‍र मारी थी , कुछ उसी तरह चीनी जहाज भारतीय जहाजों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। भारत ने दक्षिण चीन सागर में तैनात अपने जहाजों को चीनी जहाजों के संभावित हमले से सतर्क रहने के लिए कहा है।
भारत का मानना है कि चीन के कई जहाज इस इलाके में सक्रिय हैं। ऐसा जताया जाता है कि ये जहाज मछली पकड़ने या हाइड्रोलॉजी में रिसर्च से जुड़े आंकड़े जुटाने में लगे हैं। लेकिन भारत को डर है कि इन्‍हीं जहाजों के जरिए चीन दक्षिण चीन सागर में मौजूद भारतीय नौसेना के और तेल की खोज में लगे जहाजों पर हमले की साजिश रच रहा है। चीन के ये जहाज हमला कर भारतीय जहाजों को तहस-नहस करने के इरादे से इलाके में चक्‍कर लगा रहे हैं।
भारत इस सागर में वियतनाम के साथ तेल की खोज में जुटा है जिसे लेकर चीन सख्‍त ऐतराज जताता रहा है। बीते सितंबर में भारतीय कंपनी को दक्षिण चीन समुद्र से तेल निकालने से रोक दिया था। लेकिन दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान के सम्‍मेलन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से मुलाकात के दौरान साफ कर दिया कि भारत दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज जारी रखेगा। मनमोहन ने जियाबाओ से साफतौर पर कहा है कि दक्षिण चीन सागर में भारत की तेल खोजने की गतिविधि सिर्फ कारोबारी नजरिए से की जा रही है। जियाबाओ से मुलाकात के दौरान मनमोहन सिंह ने कहा कि संप्रभुता के मसले का अंतरराष्‍ट्रीय नियम-कायदों के मुताबिक हल निकाला जाना चाहिए। दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावे पर दोनों देश सीधे-सीधे आमने-सामने आने से बचने की कोशिश करते दिखाई दिए।
दक्षिण चीन सागर में तेल व गैस का अकूत भंडार है और यह मालवाहक जहाजों के लिए अहम रूट भी है। चीन के दक्षिण में स्थित इस पूरे समुद्री क्षेत्र पर चीन अपनी संप्रभुता का दावा करता है और उसने अन्य देशों को चेतावनी भी दी है कि वे इस क्षेत्र में दखल न दें जबकि दक्षिण एशिया के अन्‍य देश भी इसके कुछ हिस्‍सों पर अपना हक जताते रहे हैं। चीन के पड़ोसी वियतनाम, फि‍लिपींस, ताईवान, मलेशिया और ब्रुनेई अपने आसपास के समुद्री क्षेत्र में अपनी संप्रभुता का दावा करते हैं। दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर चीन और अमेरिका के बीच गंभीर मतभेद हैं। ऐसे में चीन इस मामले में अलग-थलग पड़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिका चाहता है ‘दक्षिण चीन सागर’ पर खुलकर सार्वजनिक बात हो जबकि चीन चाहता है कि वह प्रतिदावा करने वालों से अमेरिकी दखल के बिना सीधा बात करे।

इस तनावपूर्ण स्थिति में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीनी प्रधानमंत्री ने वेन जियाबाओ में मुलाकात की है। शनिवार को बाली के एक होटल में हुई इस बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और सुरक्षा सलाहकार टॉम डोनिलोन भी शामिल हुए। ओबामा और जियाबाओ की यह मुलाकात पूर्व निर्धारित नहीं थी और इस बैठक के बाद कोई औपचारिक बयान भी नहीं जारी किया गया। लेकिन जानकारों का मानना है कि दोनों नेताओं के बीच बैठक में दक्षिण चीन सागर की संप्रभुता से जुड़े जटिल मसलों पर बातचीत हुई। इनमें व्‍यापार, मुद्रा और समुद्री सुरक्षा शामिल हैं।
इससे पहले अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि अमेरिका एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत करेगा। ओबामा के इस बयान पर चीन के विदेश मंत्रालय ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा है कि चीन अपने हितों और संप्रभुता पर किसी भी देश का हमला बर्दाश्त नहीं करेगा। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लियू वीमिन ने यह भी कहा कि दक्षिण चीन सागर मामले में दूसरे देशों के दखल से स्थितियां और ज्यादा विषम हो जाएंगी।

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