भारत-नेपाल का सम्बन्ध रोजी–रोटी का हो : विभिन्न वक्ताओं का विचार

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वीरगंज, ब्युरो न्यूज, १६ फरवरी | जागृत नेपाल द्वारा आयोजित नेपाल–भारत के बीच सीमातीत संबंधों पर दिनांक १२ और १३ फरवरी, २०१७ को स्थानीय भिस्वा होटल में पाँच सत्रों की वृहत कार्यशालाएँ आयोजित की गईं जिनमें पहला सत्र इसके आर्थिक पहलुओं पर आधारित था । इस सत्र का सहजीकरण स्थानीय व्यवसायी तथा वीरगंज उपमहानगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष अशोक टेमानी ने किया । इस सत्र में भारत और नेपाल के आर्थिक सम्बन्धों के विभिन्न पहलुओं को खंगाला गया तथा इस क्षेत्र में आनेवाली समस्याओं को सम्बन्धित निकायों द्वारा न्यूनीकरण की आवश्यकता जतलायी गई । इस विषय पर बोलते हुए भारत के अर्थशास्त्री प्रो. डॉ. एन के चौधरी ने कहा कि भारतीय सीमा में निश्चित दूरी तक एक व्यापारिक–व्यावसायिक परिक्षेत्र बनाया जाना चाहिए जिस क्षेत्र में नेपाल को आयात और निर्यात की खुली छूट होनी चाहिए ।
दूसरा सत्र दोनों देशों के राजनैतिक सम्बन्धों पर आधारित था । इस सत्र में सहजीकरण की भूमिका अधिवक्ता दीपेन्द्र झा ने निभायी । इस सत्र में वक्ताओं ने राजनैतिक सम्बन्धों में आने वाले उतार– चढ़ाओं का मुख्य कारण नेताओं में स्पष्ट दृष्टि का अभाव माना । यह भी बात आयी कि सीमांचल आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर समान है लेकिन बिना इस क्षेत्र की आवश्यकताओं को समझते हुए दिल्ली और काठमाण्डू के द्वारा इसे नियंत्रित और निर्देशित करने की कोशिश की जाती है । संघीय समाजवादी फोरम के लालबाबू राउत ने कहा कि १९५० की सन्धि कहती है कि तराई क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों के साथ किसी तरह का विभेद नहीं किया जा सकता मगर राज्य के द्वारा यह जारी है और इसी के विरुद्ध हमारा संघर्ष भी जारी है । इस सत्र में अपना मंतव्य रखते हुए प्रो. लोकराज बराल ने कहा कि संघीयता आज की प्रमुख माँग है और इसे विखण्डन से जोड़कर देखा जा रहा है । लेकिन वास्तव में यह अधिकारों के प्रति जागृति है जो लोकतंत्र के कारण घटित हो रहा है और यही लोकतंत्र की शक्ति है । आज जो अन्तर्विरोध देखा जा रहा है वह शासन की परम्परागत मान्यताओं से मोह नहीं तोड़ पाने के कारण है ।
तीसरा सत्र दोनों देशों के सामाजिक सांसकृतिक सम्बन्धों पर आधारित था । इस सत्र का सहजीकरण कुमार सच्चिदानन्द ने किया । इस सत्र में अपना मंतव्य रखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता श्री महेश अग्रवाल ने कहा कि दोनों देशों का सम्बन्ध उतना सहज नहीं है जितना वह ३०–४० साल पहले था । उन्होंने इस बात के प्रति चिन्ता जतलायी कि कहीं दिल्ली और काठमाण्डू में बैठे लोग इसे बन्द करने का निर्णय न ले ले । इसलिए इसके प्रति सचेत रहना भी इस क्षेत्र के निवासियों की जिम्मेवारी है । अपना विचार प्रकट करते हुए प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन ने कहा कि साहित्यकारों को चाहिए कि सीमांचल की साझी संस्कृति विशेषतः लोकसंस्कृति को जीवित रखने की कोशिश की जानी चाहिए तथा समाज में सकारात्मकता को परोसनी चाहिए । इस सत्र में विचार रखते हुए ख्यात राजनैतिक विश्लेषक श्री सी. के. लाल ने बेबाक शब्दों में कहा कि जिस ‘बेटी–रोटी के सम्बन्ध’ की हम दुहाई दे रहे हैं वह टूट रहा है । दोनों देशों के नागरिकों में शादी–ब्याह भी घट रहे हैं । उन्होंने कहा कि भारत नेपाल के बीच जो अन्तर्राष्ट्रीय सीमा है वह दोनों देशों के बीच ‘बाउण्ड्री’ है ‘बोर्डर’ नहीं और यह बाउण्ड्री टूट रही है । अगर इन सम्बन्धों को हमें आगे ले जाना है तो आर्थिक पहलुओं को प्रश्रय देना चाहिए और परम्परागत बेटी–रोटी के सम्बन्धों को ‘रोजी–रोटी के सम्बन्धों’ में बदलना चाहिए । इस अवसर पर भारत सरकार के पूर्वमंत्री एवं राजद के वरिष्ठ नेता डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने सीमांचल की सामाजिक–सांस्कृतिक अविभाज्यता पर प्रकाश डालते हुए इस क्षेत्र के पारम्परिक निवासियों के प्रति विभेद की बात स्वीकार की और यहाँ के लोगों के संघर्ष में अपनी सहानुभूति की बात भी दुहरायी
चौथा सत्र संचार माध्यमों पर आधारित था । इस सत्र का सहजीकरण प्रसिद्ध पत्रकार चन्द्रकिशोर ने किया । इस अवसर पर प्रतीक दैनिक के संपादक जगदीश शर्मा ने सीमा क्षेत्र के ऐसे विषय जिससे दोनों देशों के नागरिकों के पीड़ित और प्रभावित होने की संभावना है, उन्हें प्रकाश में लाने पर जोड़ दिया । इस सत्र में अपना विचार रखते हुए प्रसिद्ध पत्रकार एवं स्तम्भकार युग पाठक ने स्वीकार किया कि नेपाल की मीडिया जो राष्ट्रीयता के पारम्परिक मनोविज्ञान से उबर नहीं पायी है । इसके कारण वह तथ्यों को सही ढंग से सामने नहीं रख पाती । यह एक सीमा तक लोगों को एक विशेष मनोवैज्ञानिक ढाँचे में ढ़ालने की कोशिश कर रही है जो न्यायसंगत नहीं है । इस सत्र में अपना विचार रखते हुए पूर्व राजदूत एवं प्राध्यापक विजयकान्त कर्ण ने समाचारों के चयन में निडरता और निष्पक्षता की चर्चा की ।
इस द्विदिवसीय सेमिनार का अन्तिम सत्र महिलाओं के मुद्दे से जुड़ा था जिसका सहजीकरण पल्लवी पायल ने किया और प्रमुख वक्ता के रूप में प्राध्यापिका द्वय डॉ. किरणबाला, डॉ. सुषमा तिवारी और महिला अधिकारकर्मी तथा पत्रकार रीता साह की उपस्थिति थी । इस सत्र में रीता साह ने इस तथ्य को प्रस्तुत किया कि नए संविधान में नागरिकता के प्रावधानों के मद्देनजर वैवाहिक सम्बन्ध हतोत्साहित हुए हैं जबकि सुषमा तिवारी ने यह कहा कि भारत में दहेज का प्रचलन अपेक्षाकृत अधिक होने के कारण नेपाल की ओर से इन सम्बन्धों में कमी आयी है । डॉ. किरण बाला ने स्त्री शिक्षा की आवश्यकता पर जोड़ दिया और कहा कि इसके द्वारा बाल–विवाह, कन्याओं का विक्रय आदि को रोका जा सकता है ।
कुल मिलाकर यह एक सकारात्मक कार्यक्रम था और दोनों देशों के सम्बन्धों के अनेक सूक्ष्म पहलुओं पर इनमें व्यापक विचार–मंथन हुआ । इसलिए इसकी सान्दर्भिकता पर कोई सवाल नहीं । लेकिन इससे जुड़े मुद्दों को कार्यान्वयन के स्तर तक ले जाने और कम से कम सम्बद्ध निकायों पर दबाब बनाने की एक निश्चित योजना भी होनी ही चाहिए । यह सच है कि भारत और नेपाल के सीमांचल का संबन्ध सहज और प्राकृतिक हैं लेकिन इसमें जटिलता तब उत्पन्न होती है जब बीच में राज्य की एजेंसियों की उपस्थिति होती है और वे अवैज्ञानिक तरीके से मुद्दों को निबटाने की कोशिश करते हैं । लेकिन यह भी सच है कि इसी खुली सीमा का लाभ अपराधी और असामाजिक तत्व भी समय–समय पर उठा लेते है । इसलिए दोनों ही क्षेत्रों के नागरिकों की संवेदनशीलता आवश्यक और परिहार्य है ।

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