भारत ने संयुक्त वक्तव्य निकालने से किया इंकार,मधेश मुद्दे पर मतभेद बरकरार

काठमांडू, २४ फरवरी |

भारत और नेपाल के बीच राजनीतिक रिश्तों में आई तल्खी अभी भी बरकरार है। यही कारण है कि नेपाल के पीएम केपी ओली के भ्रमण के आखिरी दिन तक भी मधेश मुद्दे को लेकर मतभेद कायम रहने की वजह से भारत ने संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने से ही इंकार कर दिया है। भारत जहां संयुक्त वक्तव्य में सहमति और संवाद के माध्यम से संविधान संशोधन के जरिए मधेश के मुद्दे को हल करने की बात वक्तव्य में उल्लेख करना चाहता था वहीं नेपाल इसे आन्तरिक मामला कह कर वक्तव्य में इसे कोई स्थान नहीं देने की बात पर अडा पहा।

Bharat naman

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भारतीय सीमा से जुडे नेपाल के तराई क्षेत्र में रहने वाले मधेशी नागरिक जो देश की आधी आबादी हैं, उन्हें कई प्रकार के संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। यही वजह है कि संविधान जारी होने के बावजूद अभी तक भारत सरकार की ओर से स्वागत नहीं किया गया है। हालांकि मधेशी मुद्दा पर नेपाल सरकार ने तीन महीने में ही दो संशोधन कर दिया है लेकिन आन्दोलन कर रहे मधेशी मोर्चा के विरोध के कारण भारत ने इन संशोधन प्रस्ताव को सिर्फ सकारात्मक कदम बताया था।

नेपाल के पीएम ओली की भारतीय पीएम मोदी से हैदराबाद में हुई द्विपक्षीय वार्ता के दौरान भी यही मुद्दा हावी रहा। दोनों के बीच करीब ४० मिनट तक चले वन टू वन मुलाकात के बाद संयुक्त रूप से प्रेस को संबोधित करते हुए मोदी ने एक बार फिर संविधान के विवादित मुद्दों को आपसी सहमति और अधिकतम संतुष्टि के साथ सुलझाने का सुझाव दिया था। हैदराबाद हाउस में ही दोनों देशों के बीच भ्रमण के आखिरी दिन संयुक्त वक्तव्य निकाले जाने पर सहमति हुई थी। लेकिन नेपाल मधेश के मुद्दे को संयुक्त वक्तव्य में कोई स्थान नहीं देना चाहता था जबकि भारत मधेश मुद्दे को शामिल किए बगैर वक्तव्य निकालने के पक्ष में नहीं था।

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