भाषा वही, जो लोगों को जोडे

कञ्चना झा:बात नेपाल के दक्षिणपर्ूर्वी जिले की है। राजविराज नगरपालिका निवासी सुजित कुमार झा ने करीब पाँच वर्षपहले शादी की। विशुद्ध प्रेम विवाह था और लडÞकी थी मारवाडÞी समुदाय की। शुरु में दोनों के परिवारजनों को अच्छा नहीं लगा लेकिन समय की मांग समझकर उन लोगों ने विवाह को स्वीकार किया। निशा दूल्हन बनकर सुजित के घर आ गयी। सब कुछ ठीक था लेकिन सुजित, निशा और दोनों परिवार वालों के लिए एक बहुत बडÞी समस्या सामने थी और वह थी अपने भावनाओं को व्यक्त करने की; क्योंकि दोनों की भाषा अलग-अलग थी।

मैथिल ब्राहृमण समुदाय के सुजित के घर में मैथिली भाषा और निशा के घर में मार वाडÞी। यहीं दोनांे ने समझौता कर लिया और सुजित, निशा ही नहीं दोनों के परिवारवालों ने भी हिन्दी को बना लिया जोडÞने की भाषा। पेशे से साफ्टवेयर इन्जिनियर सुजित कहते हैं- सफल पारिवारिक जीवन की सबसे अहम बात होती है एक दूसरे को समझना। ऐसी बात नहीं की निशा मैथिली नहीं समझती थी लेकिन मैथिली में वह अपने विचारों को स्पष्ट तरीके से नहीं रख पा रही थी। सुजित का कहना है- भाषा के कारण कभी-कभी दोनों की समझ में विविधता आ जाती थी लेकिन अब हिन्दी ने सारी समस्याओं का समाधान कर दिया। वह आगे कहतें हैं- भाषा वही जो आसानी से समझ में आये, जो एक दूसरे को जोडÞे। सुजित और निशा तो एक प्रतिनिधि मात्र हैं। यह समस्या नेपाल के अधिकाँश परिवार में है। लडÞका मैथिली बोलनेवाला-लडÞकी भोजपुर ी, लडÞका बज्जिका -लडÞकी अवधी।

तर्राई के २२ जिला को ही देख लिया जाय तो उसमें राजवंशी, थारु, मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका, अवधी लगायत दर्जनों भाषाएँ बोली जाती हैं। और इन सभी को जोडÞने का काम कर ती है हिन्दी। वैसे तो नेपाल में हिन्दी बहुत कम लोगों की ही मातृ भाषा है लेकिन आधी जनसंख्या से भी ज्यादा लोग हिन्दी भाषा को जोडÞने की भाषा -लिंक ल्याङगुवेज) के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। यकीन तथ्याँक मिलना कठिन है लेकिन विभिन्न तथ्यांक को देखा जाय तो स्पष्ट होता है करीब ६६ फिसदी नेपाली जनसंख्या हिन्दी को राजनीति, व्यापार, अध्ययन, संस्कृति, मनोरञ्जन या संस्कार की भाषा के रूप में प्रयोग कर रही है। तर्राई के २२ जिला ही नहीं पहाडÞ और हिमाल के लोगों को भी तर्राई के लोगों से जोडÞने की कडÞी के रूप में हिन्दी स्थापित हो चुकी है।

हाल में ही सम्पन्न संविधानसभा निर्वाचन में चाहे एमाले के नेता माधव नेपाल हों या काँग्रेस सभापति सुशील कोइराला या एकीकृत माओवादी के नेतागण ही क्यों न हों उन्होंने तर्राई के जिले में अपना प्रचार का माध्यम हिन्दी को ही बनाया। मधेशवादी दल के नेताओं की तो बात ही छोडÞ दें, वह तो अपने ही कार्यकर्ता के साथ बात करने के लिए हिन्दी का प्रयोग करने को बाध्य हैं। क्योंकि एक कार्यकर्ता पर्ूर्वी नेपाल का है तो दूसरा पश्चिम का और स्वयं हैं मध्य नेपाल के। विद्वानों ने सही कहा है कि मावन एक सामाजिक प्राणी है और वह अपनी भावनाओं को व्यक्त किये बगैर नहीं रह सकता। और भावना व्यक्त करने के लिए आवाज और भाषा दोनों अपरिहार्य हैं। भाषा वह जो दो लोगों को भावात्मक रूप से जोडÞे। लेकिन दर्ुभाग्य नेपाल में भाषा के नाम पर लोगों को अलग किया जा रहा है। जैसा कि एभिन्युज टेलिविजन के वरिष्ठ संवाददाता युविन पुजार ी कहते हैं – यहाँ हिन्दी भाषा के र्समर्थन और विरोध करने वालें दोनों राजनीतिक स्वार्थ सिद्धी में लगे हुए हैं। भाषा तो विचार रखने का माध्यम है और जिसको जिस माध्यम में सरल लगता है वह उस माध्यम का उपयोग करता है।

युविन कहते हैं भाषा पर राजनीति बन्द होनी चाहिए। हिन्दी भाषा का इतिहास को देखा जाय तो बहुत पुराना है। इतिहासकारों ने पुष्य को पहला हिन्दी कवि माना है। इन्हांेने सातवीं शताब्दी में कुछ साहित्य की रचना की थी। १० वीं शताब्दी में हिन्दी ने अपनी पैठ जमा ली थी। कहें तो यह भाषा विचार र खने का माध्यम बन चुकी थी। अगर १० वीं शताब्दी की बात की जाय तो नेपाल, भारत, पाकिस्तान या बंगलादेश का स्वतन्त्र औचित्य नहीं था। छोटो-छोटे राज्य और खास कर वर्तमान का मध्य एवं उत्तरी भारत और नेपाल के दक्षिणी भू भाग में हिन्दी का हीर् वर्चस्व था। आज नेपाल या भारत भौगोलिक एवं राजनीतिक हिसाब से दो अलग राष्ट्र हैं। लेकिन हिन्दी तो सदियों से चलती आ रही है। थापाथली इन्जिनियरिङ काँलेज का प्राध्यापक सुनील कुमार मिश्र कहतें है – मनुष्यों के द्वारा बनाई हर्ुइ सीमा भाषा का कुछ बिगाडÞ नहीं सकती और न इसे रोक सकती है, ना ही भाषा को बाँधा जा सकता है। भाषा विज्ञान के भी छात्र रहे मिश्र आगे कहते हैं- नेपालियोंें को भाषा विवाद से दूर, सारे पर्ूवाग्रहों से दूर होकर प्रकृति के इतने बडÞे पुरस्कार -हिन्दी) भाषा के संरक्षण और पर््रवर्द्धन के लिए सचेत होना चाहिए। अगर वर्तमान भूगोल को देखा जाय तो नेपाल में हिन्दी का प्रयोग ७ सौ वर्षपुराना है। त्रिभुवन विश्व विद्यालय, हिन्दी केन्द्रीय विभाग के प्राध्यापक श्वेता दीप्ति अपने कार्यपत्र में कहती हंै कि गोरखनाथ और उनकी शिष्य

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