भूकम्प का व्यापारीकरण : देवेश झा

dibesh jhaनेपाल के महाविनाशकारी भूकम्प में जनधन की क्षति का आँकड़ा बढ़ता जा रहा है । अभी भी यकीन करना सम्भव नहीं हो पा रहा है कि वास्तविक स्थिति क्या है । इस भयावह भूकम्प ने जो पीड़ा दिया है वह लम्बे समय तक मानसपटल पर कायम रहेगा । वैसे इस परिस्थिति की कल्पना कुछ समय पहले से हो ही रही थी । अनेकों माध्यम द्वारा नेपाल में वह भी विशेषतः राजधानी काठमाण्डू में निकट भविष्य में ऐसा होने की कल्पना तो की ही गई थी । यदि हम पिछले दिनों की खबरों पर नजर डालें तो हमें निकट भविष्य में भूकम्प से सम्बन्धित चेतावनियों के बहुत से समाचार मिल जाएंगे । तो जो हुआ वह दुखद भले ही हो परन्तु लगभग पूर्व सूचित जैसा ही था । सरकार द्वारा खुले मैदानों को भूकम्प के समय में सुरक्षित माना गया था । कई तरह के पूर्वाभ्यास भी करवाये गये थे । पर दुर्भाग्यवश जब विपत्ति आई तो सारी तैयारियाँ व्यर्थ साबित हुई । सरकारी प्रवक्ता एवं मन्त्री श्री मिनेन्द्र रिजालजी ने तो ऐसी परिस्थिति का पहले से अनुभव न होने की बात कहकर पल्ला भी झाड़ लिया । मन्त्रीगण सड़कों पर सायरन बजाते हुए अपनी शान दिखाने में ही सीमित हो गये । सरकार की लाचारी ने आक्रोश का रूप भी लिया ।
भूकम्प का कम्पन चाहे जितनी देर का रहा हो जिन जोरदार धक्कों ने यह विनाशकारी तांडव दिखाया है वह लगभग ३५ सेकेण्ड से अधिक का नहीं था । भूगर्भविदों के विश्लेषण में जो आया है उस मुताबिक अगर वह क्षण कुछ और अधिक का होता तो नेपाल में प्रलय ही हो जाता । तथ्य और आँकडे अभी आने बाँकी हैं । इसलिये क्षति का आंकलन भी अभी महज पूर्वानुमान ही होगा । भूकम्प के तुरन्त बाद का दृश्य बेहद खौफनाक था । लोग भयभीत होकर सड़कों पर आ तो गये थे पर न तो कोई कुछ कह पा रहा था न समझ ही रहा था । हर आँख किसी सहारे की तलाश में दिख रही थी । चारों ओर भगदड़ सी मची हुई थी । सभी अपने परिजनों को लेकर चिन्तित थे । डर ने ऐसा माहौल बना दिया था कि लोग बीच सड़क को ही सुरक्षित समझ रहे थे । कहीं घर ढह गये थे तो कहीं सड़क फट गई थी । एक अजीब सी बेचैनी और किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति हो गई थी । लोग जानना चाहते थे कि क्या हुआ है और कितना हुआ है । अब क्या होगा ? प्रश्नों का अम्बार लगा हुआ था पर उत्तर देने वाला कोई नहीं । अभिभावकविहीनता की अवस्था में था नेपाल ।
ऐसे में पहली आवाज मित्रराष्ट्र भारत से आई । पता चला कि भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने नेपाल में आए इस आपदा को बेहद गम्भीरता से लेते हुए हर सम्भव सहयोग करने के निर्देश अपने अधिकारियों को दिये हैं । कहते हैं, डूबते को तिनके का सहारा । लोगों को महसूस हुआ कि कोई तो है । यह राहत से अधिक ढाढस बँधाने की बात थी । भारत के द्वारा की गई इस फौरी कार्यवाही का असर यह हुआ कि पूरे विश्व से राहत और सहयोग का ताँता सा बँध गया जो आज भी जारी है । नेपाल की जनता को उस समय सबसे अधिक सूचना की आवश्यकता थी । देश की सूचना प्रणाली और विशेष रूप से नेपाली मीडिया इतनी लाचार दिख रही थी कि लोग भारतीय न्यूज चैनलों से ही आवश्यक जानकारी जुटा रहे थे । सरकार तो कहीं थी ही नहीं । खबर तो यहाँ तक आई की नेपाल के प्रधानमन्त्री को नेपाल में आए भूकम्प की जानकारी भारतीय प्रधानमन्त्री से प्राप्त हुई । इससे अधिक लाचारी और क्या होगी ?
आनन फानन में भूकम्प प्रभावित क्षेत्र को संकटग्रस्त घोषित कर दिया गया । साथ ही अनूठे विषयचर्चा में आने शुरु हो गए । जैसे महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा संकटग्रस्त घोषित किये जाने की जानकारी सरकार द्वारा उन्हें प्राप्त न होने की बात कही गई । नेपाली सेना के बारे में कहा गया कि उसे इस आपदा में राहतकार्य का नेतृत्व चाहिये । मन्त्रियों के बीच बैठक में ही तू–तू मैं–मैं होने की बात भी बाहर आई । इन सब बातों का नतीजा यह हुआ कि आम जनता में निराशा और बढ़ गई । गृहमन्त्री के अन्तर्वाता ने तो आग में घी का काम कर दिया । जब उन्होंने इस महाविपत्ति को एकदम साधारण बता दिया । और जो रही सही कसर थी वह प्रधानमन्त्री ने राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए पूरी कर दी । राहत के किसी बड़ी घोषणा की आस में बैठे हुओं को सम्वेदना से अधिक कुछ नहीं दिया प्रधानमन्त्री जी ने । बड़ी–बड़ी बातें करने वाले राजनीतिक दल के कद्दावर नेता नदारद ही रहे । एकाध ने विज्ञप्ति निकालकर अपना धर्म निर्वाह कर दिया ।
अगर कोई दिख रहा था तो वो था सुरक्षानिकाय । भूकम्प के कुछ ही मिनटों बाद ट्राफिक पुलिस वाले सड़क पर गाडि़यों को व्यवस्थित कर रहे थे । मलवे को हटाने और उनमें दबे हुओं को निकालने में सुरक्षानिकायवालों के अलावा कोई नहीं आया । सरकारी कर्मचारी तो अपनी रामकहानी सुनाने में ही व्यस्त रहे । राजनीतिक दल और उनके कार्यकत्र्ताओं की अनुपस्थिति ने भी लोगों को निराश ही किया । सड़कों की अस्त व्यस्तहालत में सिर्फ वायुमार्ग से ही राहत आ सकती थी परन्तु विमानस्थल में कार्यरत कर्मचारी भी अनुपलब्ध ही रह ेऔर जो थे वे भूकम्प के भय से टावर पर बैठकर विमानों को निर्देश देने हेतु तैयार नहीं थे ।
इस बीच एकछत्र राज जमाए हुए नेपाली संचार जगत की भी पोलपट्टी इस बार खुलगई । न तो वे भूकम्प के बाद ही कुछ जानकारी दे पा रहे थे, न ही सम्भावित परिस्थिति का आंकलन कर पा रहे थे । तो फिर स्वाभाविक था कि लोग सूचनाप्राप्त करने के लिये भारतीयन्यूज चैनल की ओर मुड़ गये । इससे भारतीय चैनलों की लोकप्रियता बढ़ी तो उन्होंने भी इस व्यापार में लाभ ही देखा । नेपाली संचार जगत के लिये यह एक चुनौती की बात हो गई । एक ओर जहाँ उनकी टी आर पी कम हो रही थी तो वहीं दूसरी ओर उनके मनमानीपन पर गम्भीर प्रतिद्वन्द्विता का प्रश्न आ गया । बस फिर क्या था, नेपाली मीडिया ने देश को ही संकट में देखा । होना भी तो चाहिये । बड़े बड़े व्यापारियों के द्वारा संचालित मीडिया अपने बूते तो चल नहीं रही है । जिस फण्ड से वह संचालित है अगर वही असुरक्षित हो गया तो मीडिया का क्या होगा ? साथ साथ आम जनता की सरकार के नालायकीपन के कारण हुई नाराजगी को भी रोकना था । तो फिर वही पुराना अचूक अस्त्र चलाया गया, राष्ट्रीयता का । देश को भारत से गम्भीर खतरा बताया गया । सामाजिक संजाल सहित सभी सम्भावित संचार माध्यमों का उपयोग करते हुए आम जनता को भ्रमित करने की भरपूर कोशिश अभी भी चल ही रही है । बहरहाल भविष्य जो भी हो, इतना जरुर है कि व्यापारीकरण के इस दौर में भूकम्प का भी व्यापारीकरण हो गया है । विज्ञापन के राज में सबसे अधिक क्षति अगर किसी की हुई तो वह शायद नेपाल की भोलीभाली जनता की ही होगी ।

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