भोग-तृष्णा में दुःख
रवीन्द्र झा शंकर’

दुःखो से घबडÞाओ मत। दुःख-कष्टों के आघात से यदि चेतना खो दोगे तो बडÞी हानी होगी। मनुष्य जीवन ही र्व्यर्थ हो जायगा। दुःख दैन्य और आँधि-व्याधी भी तो भगवान की ही सृष्टि है। विश्वास रखो, हमारे मंगल के लिए भगवान ने इन को रचना है। इस की चोट में भगवान के कोमल करर्स्पर्श के सुख का अनुभव करो- चपत करारी है परंतु है तो प्यार के हाथ की। वह स्नेह से ही मारता है। क्योंकि वह कभी स्नेहरहित, निर्दयी हो ही नहीं सकता। हम दिन-रात विषय-चिन्तन करते हैं, विषयों के पीछे पागल बने हुए हैं। विषयों के नाश और विषय चिन्तन विषय भोगों के अभाव को ही दुःख कष्ट समझते है। इसी से सदा दुःखों के ताप से तपते रहते हैं। यदि भगवत् चिन्तन करने में आनन्दमय भगवान का ध्यान करने लगें तो यह विषयों का अभाव ही हमारे लिए सुखकर हो जाएगा। फिर संसार का कोई भी दुःख आनन्दमय के ध्यान में प्रशान्त हुए हमारे चित्त में क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकेगा। भाई ! यह मनुष्य जन्म धन कमाकर भोग भोगने के लिए नहीं है। संसार में तुम इस लिए मनुष्य बन कर नहीं भेजे गए हो कि तुम दिन रात केबल विषय-भोगों के बटोरने की चिन्ता में लगे रहो। क्षण-क्षण में विषय के नाश की भावना से दुःखी और विषयप्राप्ति के संकल्प से सुखी होते रहो और अपने जीवन को इन कल्पित दुःख-सुखों की तरंगों के आघात से चूर-चूर करके अन्त में हाथ मलते, पछताते, रोते मनुष्य जीवन से हाथ धोकर चले जाओ।
यह जीवन तो मिला है, तुम्हे भगवान को पाने के लिए। जगत के सारे दुःख-सुखों में जीवन के इस उद्देश्य को कभी न भूलो। यहाँ के दुःख वस्तुतः है ही क्या, जिनसे तुम इतना घबडÞा रहे हो – जिस को तुम दुःख कहते हो, विषयों का अभाव ही तो है। परमात्मा को चाहने वाले साधक तो हँसते-खेलते जान-बूझकर विषयों का र्सवथा त्याग करके सुखी हुआ करते हैं। मान-सम्मान के मोह में मत फँसो। धनियों के भोगों, महलों और मोटरो की ओर देखकर दिल न ललचाओ, उन के जैसे बनकर उनके बीच बैठने की इच्छा न करो। इस में अपमान, असमानता या लांक्षन की कौन सी बात है। याद रखो संसार के मान-सम्मान से मण्डित पर भगवान को भूले हुए विषयाक्त धनी की अपेक्षा अपमानित और लांक्षित वह दर्रि्र बहुत ही उत्तम है, जो सदा अपने चित्त को भगवान में लगाने की चेष्टा करता है। और भगवान का भजन करता है। याद रखो, वह विषयाक्त धनी नरकों की आग में जलेगा और वह गरीब भगवान रुपी स्नेहमयी जननी की सुख-शान्ति भरी गोद का लाडÞला शिशु होगा। तुम इन दोनों में किस स्थिति को पसन्द करते हो – फिर क्यों दुःखी होते हो – धन के अभाव में क्यों अपने को अपमानित समझते हो, बहुत शान से न रह सकने में – इस मोह को छोड दो भगवान ने तुमपर कृपा की है, जो धन-मद से तुम्हे मुक्त कर दिया है।
अब निर्द्वन्द्व होकर सुख से भगवान का भजन करो, तुम्हारा मंगल होगा विश्वास करो, भगवान का मंगलमय हाथ सदा ही तुम्हारे मस्तक पर है। विश्वास के साथ भजन करते रहोगे तो कुछ दिनों मे इस का स्वयं अनुभव करोगे। धनी बनने, धनियों का सा खचर्ीला जीवन बिताने और धनियों के गिरोह में बैठने-उठने की लालसा ने ही असल में तुम्हे दुःखी बना रखा है। नही तो रोटी मिलती ही है, कपडेÞ तन ढÞकने को मिल ही जाते हैं, सोने-बैठने को जमीन है ही। फिर और  क्या चाहिए – धनी लोग क्या धन होने के कारण आधा पांव अन्न के बदले दो चार सेर खाते हैं – अथवा क्या वे साढेÞ तीन हाथ की जगह दश-बीस हाथ जमीन पर सोते है – फिर तुम्हारी उन की स्थिति में क्या अन्तर है – हाँ इतना अवश्य है, उन में धन का अभिमान है, अपने से बडेÞ धनियों सर्ेर् इष्र्या है और तुम्हें धन के अभाव में विषाद है और तुम अपने को दुःखी मानते हो। दुःखी तो वे भी हैं क्यों कि वे भी अपनी स्थिति में सन्तुष्ट नहीं हैं। भाई, यह मोह छोडÞ दो- भजन कर के जीवन को र्सार्थक करो। भगवान के लिए बडेÞ-बडÞे राजाओं ने संन्यास लिया था, तुम पर तो भगवान की कृपा है। जो तुम्हारे विषय भोग अपने आप ही कम हो गए हैं। जीवन निर्वाह की चिन्ता विश्वम्भर पर छोडÞ दो- जितना बने निर्दोष कर्म करते रहो जीवन निर्वाह हो ही जाएगा। घबराओं नहीं। भगवान पर भरोसा रखने वाले कभी इस की चिन्ता नहीं करते। वे तो भगवात् चिन्तन ही करते हैं। उन के लौकिक-पारलौकिक योगक्षेम को भगवान बहन करते है। ±±±

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