भ्रमर की मैथिली कृति सीमा के आर–पार का लोकार्पण तथा विमर्श

bhramar
विजेता चौधरी, दरभंगा २९ नवम्बर ।
मैथिली साहित्य के सिद्धहस्त हस्ताक्षर डा. रामभरोस कापडि भ्रमर के मैथिली यात्रा साहित्य सीमा के आर–पार कृति का लोकार्पण किया गया ।
अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद दरभंगा के तत्वधान में आयोजित एक कार्यक्रम में कृति का विमोचन तथा विमर्श का आयोजन किया गया । डा.फूलचन्द्र मिश्र रमण के अध्यक्षता में आयोजित उक्त कार्यक्रम में पुस्तक विमोचित करते हुए भीमनाथ झा ने कहा कि भ्रमर की यह यात्रा प्रसंग पुस्तक प्रशंसनीय है । लेखक ने विभिन्न यात्रा क्रम को उधृत कर साहसिक कदम उठाया है । इस कृति में इतिहास, भूगोल तथा ज्ञान विज्ञानादि विषयों को उठाया गया है । उन्होंने कृति को अमूल्य धरोहर बताते हुए मैथिली साहित्य का गौरबबोध है कहा ।
लेखकीय विचार प्रस्तुत करते हुए डा. भ्रमर ने अनुभूतिप्रवणता की बात उठाते हुए कौशल पर जोड दिया । वे सीमा के आर पार यात्रा प्रसंग को अपने अनुभव के आधार पर अनुभूतिपरकता की बात उठायी ।
समारोह में बोलते हुए साहित्यकार समालोचक चन्द्रेश ने कहा कि यह कृति अपनेआप में महत्ता रखती है क्यों के इस में जीवनानुभूति तथा स्थान विशेष की बात बताया गया है । उन्होंने कहा कि कृति में एक परिवेश को उठाकर एक जगह से दुसरे जगह की सांस्कृतिक मिलन की बात की गई है ।
साहित्यकार डा. योगानन्द झा ने कृति को उत्कृष्ट यात्रा वृतान्त बताते हुए मैथिली साहित्य का जीवन्त दस्तावेज कहा ।
अध्यक्षीय मन्तव्य व्यक्त करते हुए डा. रमण ने कहा कि भ्रमर के साहित्य में नेपालीपन में मैथिली शब्द का प्रयोग किया गया है जिस से भाषा सौन्दर्य अप्रतिभ प्रतित होता है । उन्होंने भ्रमर भारत तथा नेपाल के मैथिली साहित्य के सेतु हैं बताते हुए यह कृति लेखक को सदैव स्मरणीय रखेगा बताया ।
कार्यक्रम में अयुब राइन, प्रो. चन्द्रशेखर झ, डा. श्रीशंकर झा, प्रो. चन्द्रकान्त मिश्र, विनय कुमार मिक्ष, विनोद कुमार झा लगात के वक्ताओं के कृति के उपर अपना विचार व्यक्त किया ।

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