मंजिल एक है मगर बहुतेरे हैं घाट:

कुमार सच्चिदानन्द

राजनीति की तुलना हम रवीन्द्र-संगीत से तो कर नहीं सकते क्योंकि यह हमारे चिंतन को ऊर्ध्वगामी बनाकर परलोक सुधारने में हमारा सहयोग नहीं करती इसके बावजूद इस धरती को ही र्स्वर्ग बनाने की दिशा तो यह देती ही है विडम्बना यह है कि नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति अब तक इस गम्भीर तथ्य को समझ नहीं पायी है और जो हालात हमारे सामने है वह किसी से छुपी नहीं है मधेश की राजनीति का हाल तो और अधिक बदहाल है विगत चार वर्षों में विखण्डन मधेशवादी राजनीति की मुख्य प्रवृति बनकर सामने आयी है हर दल टूट-फूट का शिकार हो चुका है विभाजन की पीडÞा प्रत्येक मधेशवादी दल की नीयति बन चुकी है और इस सिलसिले के थमने के कोई आसार नजर नहीं आता क्योंकि चिंतन के धरातल पर इनमें परिवर्तन के कोई संकेत नहीं मिलते वही सत्ता, वही महत्वाकांक्षा और वही व्यक्तिगत और दलगत अहंकार के जाल में मधेशवादी राजनीति उलझी हर्ुइ है
विभाजन के लिए पहले सदभावना पार्टर्ीीदनाम थी और कहा तो यह भी जाता था कि जहाँ-जहाँ आपर्ूर्ति मंत्रालय वहाँ-वहाँ सदभावना पार्टर्ीीह महज संयोग रहा कि पिछली बार मंत्रालय मिलने से पर्ूव ही पार्टर्ीीाईकमान ने कुछ कठोर निर्ण्र्ाालिया जिसके कारण पार्टर्ीीवभाजन से तो तत्काल बची, लेकिन बाद में पार्टर्ीीे व्रि्रोही सरगना को पार्टर्ीीी प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त कर इस अध्याय के पटाक्षेप का प्रयास किया गया है इसके बावजूद सदभावना पार्टर्ीीा विभाजन रोका नहीं जा सका और श्री अनिल कुमार झा के नेतृत्व में एक और सदभावना पार्टर्ीीा जन्म हुआ सदभावना पार्टर्ीीी यह बुखार उतर कर फिलहाल मधेशी जनाधिकार फोरम पर आ गई है परत दर परत यह पार्टर्ीीेसे उघडÞती जा रही है जैसे प्याज से छिलके उतरते हैं आज मधेशी जनाधिकार फोरम इतने खण्डों में विभाजित है कि अगर इसके संस्थापन पक्ष से आकस्मिक यह सवाल पूछ दिया जाए कि मजफो के अब तक कितने विभाजन हो चुके हैं तो शायद वे भी अंगुलियों पर गिनने लग जाए या स्कूली बच्चों की तरह सामान्य-ज्ञान की समस्या का हल याद करके बैठे हों तब तो कोई बात ही नहीं
एक राजनैतिक योगी, संन्यासी के नेतृत्व में तर्राई-मधेश लोकतांत्रिक पार्टर्ीीभेद्य समझी जा रही थी लेकिन इसकी भी अभेद्यता सुरक्षित नहीं रही और यह भी विभाजित हर्ुइ इस विभाजन का भी मूल कारण कहीं न कहीं अवसर का ही संधान ही था हलाँकि आज मधेशी जनाधिकार फोरम नेपाल और नव सदभावना के अतिरिक्त अन्य मधेशी दल मोर्चा के रूप में संगठित सी दिखलाई दे रहा है लेकिन यह बंधन एक कमजोर धागे का बंधन सा है क्योंकि विगत कुछ वर्षों में मधेशी राजनीति की जो विशेषता उभर कर सामने आयी है उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि दूसरे की सत्ता स्वीकार न करना, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पर्ूर्ति के लिए मुद्दों को दाँव पर लगा देना, अपने पक्ष को सही साबित करने के लिए कुतर्कों का सहारा लेना मधेशी राजनीति की विशेषता रही है कमोवेश हर दल इस व्याधि से ग्रसित है इसलिए कब तक इनकी एकसूत्रता कायम रहती है, इस प्रश्न का उत्तर तो समय सापेक्ष्य है लेकिन इतना तो कहा सकता है कि राष्ट्र तो कठिन समय से गुजर ही रहा है, मधेश के लिए स्थिति और अधिक गम्भीर है स्वाभिमान की, पहचान की, सम्मान की और सबसे बढÞकर सदियों से उपेक्षित मधेशियों के अधिकारों की ग्यारेण्टी उनकी जिम्मेवारी है
आज मधेशी राजनीति में जो विचलन देखा जा रहा है उसके मूल में एक व्रि्रम है जिसके कारण मधेशी पार्टियाँ भ्रमित नजर आती हैं कहा जाता है कि लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए र्समर्पण, त्याग और धर्ैय की आवश्यकता होती है ऐसा नहीं है कि मधेशवादी दलों के नेतागण इस तथ्य को नहीं जानते लेकिन कार्यकलापों से यह बात साबित होती है कि समष्टिगत हितों पर उनका व्यष्टिहित भारी हो जाता है इसलिए समय-समय पर विभाजन होता है और मधेशवादी शक्तियाँ कमजोर होती है आज जो पक्ष मधेशी राजनीति की एकता के बंधन को त्याग कर अलग राग आलाप रहे हैं, अगर उनहें छोडÞ दिया जाए तो भी जो पक्ष संगठित हैं उन्हें भी एक न्यूतम समझदारी के विन्दु पर आना ही चाहिए कि सरकार या आगामी संभावित संविधान से उनकी अपेक्षाएँ क्या हैं और उसके पूरा न होने पर उनकी संयुक्त रणनीति क्या होगी – इसके प्रति जबतक जनविश्वास को बटोरने में वे सक्षम नहीं होते तब तक निश्चित लक्ष्य की साधना संभव नहीं क्योंकि साम और संगीत से यहाँ की सरकार समझने की मनःस्थिति में नहीं और संविधानसभा का अंकगणित उनके पक्ष में नहीं है
आज मधेशी राजनीति की सबसे बडÞी विडम्बना है कि सभी राजनैतिक दल विभाजन की पीडÞा से ग्रस्त तो हैं ही, प्रत्येक विभाजन के बाद रक्तबीज की तरह एक नया दल बन जाता है संख्यात्मक दृष्टि से भले ही ये भारी भरकम लगते हों लेकिन जाने अनजाने शक्तियों के विभाजन का उद्घोष तो करते ही हैं कोई भी दल किसी अन्य समान विचारधारा के दलों में मर्ज नहीं करता यह मनोवृति किसी न किसी रूप में मधेशी राजनीति में व्यक्तित्व की स्वीकार्यता का अभाव और उनके बीच टकराव की प्रवृति को उजागर करती है यह सच है कि आज एकाध को छोडÞकर अधिकांश मधेशी दल एकजूट नजर आते हैं लेकिन इस एकजुटता में कब विचलन की स्थिति उत्पन्न होगी, कहना मुश्किल है क्योंकि किसी भी क्षण समीकरण बिगडÞ सकता है और और मोर्चा में शामिल नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ हावी हो सकती है एक बात तो निश्चित है कि चाहरदीवारी जितनी ऊँची होगी, उसे फँदना उतना ही मुश्किल होगा लेकिन मधेशी दलों के टूटने बिखरने के क्रम में यह चाहरदीवारी इतनी छोटी हो गई है कि इसे लाँघना आसान सा सबक बन गया है इसलिए कोई भी दल इस हालत में भी सुरक्षित नहीं सारे दल दो-चार सांसदों-सभासदों की सहमति और विमति के आधार पर टूटने और बिखरने के कगार पर खडÞे हैं इसलिए मधेशी दलों की एकता और एकसूत्रता का नया आधार तलाशना होगा बहुरंगी छतरी में लम्बे समय तक सबका समावेश संभव नहीं दिखलाई देता रंग जब तक एक नहीं होगा बंधन तबतक मजबूत नहीं होगा
मधेश में सक्रिय सशस्त्र संगठनों का हाल भी लगभग ऐसा ही है आज मधेश में शताधिक सशस्त्र संगठन क्रियाशील हैं हालात यह है कि इनमें से राजनैतिक मुद्दों को लेकर संर्घष्ा करने वाले सही दल की पहचान मुश्किल है सबकी अपनी डफली अपना राग की अवस्था है परिणाम यह है कि किसी भी सशस्त्र संगठन को आमलोगों ने गम्भीरता से लेना छोडÞ दिया है सशस्त्र संगठनों की जिस तरह की बाढÞ तर्राई में देखी जा रही थी और जिस तरह से इन्होंने आम लोगों को निशाना बनाया उससे किसी न किसी रूप में इनकी आपराधिक पृष्ठभूमि का एहसास लोगों को होने लगा इसलिए आज ये दल भी हाशिए पर हैं और इनके प्रति सरकार का शिकंजा दिनानुदिन कसता जा रहा है स्थिति यह है कि आम लोगों की नजर में ऐसे समूह अपनी राजनैतिक छवि गुमा चुके हैं और इनका दमन समय-क्रम में आसान सा लक्ष्य बनता जा रहा है एक तरह से यहाँ भी वही मनोविज्ञान हावी है जो आम मधेशी दलों का है यहाँ भी व्यक्तित्व की स्वीकार्यता का अभाव है और इसके टकराव के कारण यहाँ भी एक-अनेक का खेल जारी है
एक बात तो निश्चित है कि आज मधेश की राजनीति कर रहे दलों में जो विचलन का भाव देखा जा रहा है उसके मूल में किसी न किसी रूप वह अनिश्चय है जिससे मधेशी दल आज भी जूझ रहे हैं प्र।थमिकता और प्रतिबद्धता के अभाव में आज भी ये दल बिखरे हुए हैं और बिखरने का यह सिलसिला आज भी जारी है अन्यान्य अधिकारों की बात छोडÞ भी दें तो समस्त मधेश-प्रदेश के मुद्दे से लेकर भाषा के सवाल पर सभी मधेशी दलों में आम सहमति का अभाव देखा जा रहा है इन मुद्दों पर स्पष्ट दृष्टिकोण और जन-जागरण के अभाव के कारण आज मधेश की जनता भी दिग्भ्रमित है अलग-अलग क्षेत्रों और अलग-अलग दृष्टिकोण हैं लेकिन एक बात निश्चित है कि ये ऐसे मुद्दे हैं कि इनसे अगर ये राजनैतिक दल विमुख होते हैं तो इनकी पहचान भी गुम हो सकती है बहुतेरे हैं घाट की भावना से ऊपर उठकर मधेशवादी दल साथी मंजिल एक है कह कर एक दूसरे का हाथ नहीं जोडÞते तबतक बिखराव का आसान सा मार्ग हमारे सामने रहेगा िि
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