मंत्री जी घड़ियाली आँसू बहाकर वाहवाही बटोर रहे हैं

बिम्मीशर्मा,काठमांडू , २८ मार्च |

हमारे देश में लोगों को पीने का पानी नसीब नहीं हो रहा हैं और हमारे कृषिमंत्री घड़ियाली आँसू बहाकर अपनी ईनर्जी नष्ट कर रहे हैं । नेकपा एमाओवादी के नेता तथा कृषिमंत्री हरिबोल गजुरेल एक सिनेमा देख कर उसके एक दृश्य से इतने द्रवित हुए कि उनकी आंखो से आंसू बह निकले । और हमारी अंधी और लाचार मीडिया कृषिमंत्री गजुरेल और उनकी पार्टी एमाओवादी का विगत भूला कर उन के आंसुओं को असली और कीमती मोती समझ बैठी । हमारे कृषि मंत्री जी नकली आंसु बहा कर असली वाहवाही बटोर रहे हैं ।

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यह हम सबका अहो भाग्य है कि ऐसे भावुक व्यक्ति हमारे देश के भाग्यविधाता हैं । जब ऐसे होनहार नौनिहाल देश के कृषिमंत्री बनेगें तो देश में कृषिक्रातिं होना अवश्यं भावी है । मंत्रीजी के इतने अनमोल आंसु जब आंख से गिर कर खेत में चूऐगें तब वहां पर सोना उगलना निश्चितं है । आखिर में १७हजार नेपाली नागरिकों के खून और पसीना कृषिमंत्री जी के आंसुओं मे जो घुला है ।

नेकपा एमाओवादी के सुप्रिमो कमरेड प्रचण्ड भी गाहे बगाहे अपने कीमती आंसुओं को बहा कर देश और जनता के प्रति अपनी भावुकता का प्रदर्शन करते रहते हैं । और बेवकुफ जनता प्रचण्ड के आंसुओं पर आकंठ डूब कर तैरना भूल जाते हैं । जब–जब देश में अपने और अपनी पार्टी के विरुद्ध हवा चलने लगती है तब तब सभी एमाओवादी नेता गण देश और जनता के हित मे विरुदावली गाने लगते हैं । इन्हें मालूम है कि जनता की स्मरण शक्ति बहुत कमजोर होती है ।

इसी का फायदा उठा कर नेता लोग अपने आंसुओं का हथियार जनता पर डाल देते हैं । कुछ महीने पहले तथाकथित नाकाबंदी के खिलाफ भारत के विरुद्ध प्रचण्ड जैसे गर्जे थे और मूर्ख जनता ने जिस तरह से उनका पिछला अपराध भूल कर ताली बजायी थी । तब से कमरेड प्रचण्ड के होशो हवास गुम है । तब से ही उन्हें लग रहा है कि वह हथियार चलाने मे ही माहिर राष्ट्रवाद का आकर्षक नारा लगा कर भावुकता का प्रदर्शन करने मे भी खुद को माहिर खिलाड़ी मानने लगे हंै ।

मगरमच्छ के शरीर मे जब नमक की मात्रा ज्यादा हो जाती है तब उस नमक को मगरमच्छ आंसुओं के द्धारा बाहर निकालता है । जिन्हें मगरमच्छ के शरीर कि कार्य प्रणाली नहीं मालूम है वह इस को मगरमच्छ का दुखी और भावुक होना समझ बैठते हैं । पर कपटी मगरमच्छ के अंतर्घात और आंसुओं को वही समझ सकता हैं जिन्हे उसका विगत मालूम रहता है ।

कमरेड प्रचण्ड हों या पूर्व माओवादी और अभी नयां शक्ति के नेता बाबुराम भट्टराई हों । यह सब वोट बैंक बढ़ाने और जनता को लुभाने के लिए अपनी कोरी भावुकता का जम कर प्रदर्शन करते है । और मूर्ख जनता इनके मगरमच्छी आंसुओं पर ऐसे फिदा होते हैं जैसे किसी सिनेमा का नायक नायिका पर फिदा होता है । अभिनेता से ज्यादा कुशल अभिनय करने में माहिर इन नेताओं के आंशुओं पर फिसलने के बजाय जनता और पत्रकार उन से यह क्यों नहीं पूछते कि उनका यह आंसू तब कहां गया था जब माओवादी जनयुद्ध के नाम पर १७ हजार निर्दोष लोगों कि हत्या कर दी गयी थी ?

जब अपने मां बाप की १३ दिन की काज क्रिया में बैठे शिक्षक को अशोच से ही उठा कर बार ले आए थे और मार कर पेड़ में टांग दिया था । उस समय क्या इन माओवादी नेताओं की आंख से आंसू उत्पादन नहीं होता था । या तब आंखें ही नहीं थी जो जनता की तकलिफों को जान पाते ? उस समय बंदुक, बम्ब या अन्य हथियारों से देश के निहत्थे नागरिको को मारते समय हाथ नहीं कांपा तो आज आंसू के हथियार से फिर से उन्ही जनता की भावनाओं को लुटने आए हो ?

पर विवेक हो तब न कोई प्रश्न पुछेगा । नेपाल के पत्रकार और मीडिया के पास जिस चीज का सर्वथा अभाव हैं वह विवेक और नैतिकता तो है । जनता तो बार बार के व्यवस्था से पहले ही से अधमरी हो चुकी है । जनता टैक्स पे करें या अपने आंशुओं की निलामी करे ? कोई नेता या पार्टीं अपनी रक्तरंजित इतिहास को भूला कर या अनदेखा कर जनता को कितना छल सकती है । यह जानने के लिए इन नेताओं के सार्वजनिक समारोह में बहन ेवाले घड़ियाली आंसू ही काफी हैं ।

पत्रिका, अनलाईन और सोशल मीडिया मे कृषिमंत्री गजुरेल के आँसू इस तरह वायरल बन गया कि लगता था उनके आंसु के सैलाब मे पूरा देश ही डूब जाएगा । कृषिमंत्री के चाटुकार, उनकी अपनी पार्टी के कार्यकर्ता और पत्रकार उनके इन आंसू को गंगाजी मान कर उसी में गोते लगा कर भजन, कीर्तन गाने लगे । जब शर्म, हया और नैतिकता ही बांकी न रहे तो भजन, कीर्तन गाना भी कोई बड़ी बात नहीं हैं ।

माओवादी द्धन्द्ध के समय चितवन जिला के बांदरमुढे में बिछाए गए एम्बुस में पड़ कर बच्चे सहित ३८ लोग मारे गए थे । ११ साल पहले हुई इस घटना के काफी समय बाद सब एमाआवादी नेतागण सार्वजनिक हुए । तब कमरेड प्रचण्ड इस घटना की वार्षिकी पर वहां जा कर पीड़ितों के आगे घड़ियाली आंसू बहा कर आ गए । क्या आंसू बहाने से और सहानुभूति प्रकट करने से जो निर्दोष मारे गए थे वह वापस आ जाएगें ? तब यह पीड़ितों की भावना से खेलने का नाटक क्यों ? आंसू क्या इतना सस्ता और गया गुजरा हो चुका है कि हर जगह टपक पडे ?

जनता की आधारभूत आवश्यक्ता की भर्पाई नहीं हो पा रही है । देश में महँगाई आसमान छू रही है । तेल और ग्यास की किल्लत ज्यों की त्यों है । कृषि मे आधुनिकी करण न होने से खेत में उत्पादन चाहे जितना नहीं हो पा रहा है । कृषि में कोई अनुदान नहीं हैं । पर कृषिमंत्री को यह सब समस्या देखने, सुनने और हल करने की ओर ध्यान नहीं जाता । न तो किसानो की पीड़ा से उन्हे कोई तकलीफ होती है । पर एक सिनेमा देख कर हमारे कृषिमंत्री जी के आंख से आंसू निकल आते हैं । वाह भई वाह । धन्य हो गए हमलोग । मंत्रीजी जरा बताइए तो वह आपकी आंख से जो टपका था वह आंसू ही था या ग्लिसरिन ? (व्यग्ंय)

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