मकर संक्रांति का पर्व अपने रूप और रंग में अनोखा

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विजय पंडित, मेरठ, green care society

मकर संक्रांति का पर्व अपने रूप और रंग में अनोखा है। इसमें उल्लास है तो लोकतत्व भी। सकारात्मकता है तो प्रकृति के प्रति आदरभाव भी। लोकरंजन के तत्वों से भरपूर है यह पर्व। इसमें दान देने की परंपरा है यानी यह मानव को त्याग का संदेश देता है।

यह पर्व तब मनाया जाता है जब खेतों में फसल कट चुकी होती है और किसान अच्छी पैदावार के लिए प्रकृति को धन्यवाद देता है। वह खुद को प्रकृति से अलग नहीं बल्कि उसको अपना सबसे प्रिय और आराध्य मानता है। यही वजह है कि देश के विभिन्न प्रांतों में अद्भुत परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाता है। प्रयाग में माघ मेला लगता है। आसमान में रंग-बिरंगी पतंगें तिरने लगती हैं। चारों ओर वो काटा की आवाज सुनाई पड़ती है।
हालांकि आज के कथित विकास ने प्रकृति और मानव के इस अनूठे व अटूट रिश्ते को नुकसान पहुंचाया है। खेती की जमीनें विकास के नाम पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रही हैं। किसान, मजदूर वर्ग में तब्दील होता जा रहा है। उद्योगों के कचरे ने हमारी जीवनदायी नदियों को नालों में परिवर्तित कर दिया है। ग्लेशियर और वन क्षेत्र कम होते जा रहे हैं। ऐसे में यह पर्व हमें अपनी गलतियों को सुधारने का एक मौका भी देता है।
आइए, लोकपर्व के इस मौके पर प्रकृति के संरक्षण और  संवर्धन का संकल्प लें, उसे सही अर्थों में धन्यवाद दें। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन पड़ता है। इसी दिन से सूर्य की उत्तरायण गति प्रारम्भ होती है। शास्त्रों में दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता  तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है।
 धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं। तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्रप्रदेश में इसे केवल संक्रांति कहते हैं। उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से दान का पर्व है। ऐसा विश्वास है कि मकर संक्रान्ति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरुआत होती है। उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है तथा इस दिन खिचड़ी खाने एवं दान देने का अत्यधिक महत्व है। बिहार में मकर संक्रान्ति को खिचड़ी नाम से जाना जाता हैं।
महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गुड़ नामक हलवे के बांटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और बोलते हैं-तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो। केरल में भगवान अयप्पा की निवास स्थली सबरीमाला की वार्षिक तीर्थयात्रा की अवधि मकर संक्रांति के दिन समाप्त होती है। कर्नाटक में भी फसल का त्योहार शान के साथ मनाया जाता है। बैलों और गायों से सुसज्जित कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है। असम में मकर संंक्रान्ति को माघ-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं।
राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। कुल मिलाकर यह पर्व प्रकृति और मानव के अद्भुत रिश्ते को परिभाषित करता है। लेकिन आज कथित विकास की बयार ने मानव और प्रकृति के इस रिश्ते को तार-तार कर दिया है। कथित विकास के कारण जल-जंगल-जमीन विनष्ट होने की कगार पर पहुंच गए हैं। अंधाधुंध दोहन से पृथ्वी का जल भंडार खाली होने लगा है। यहां तक कहा जाने लगा है कि तीसरा विश्व युद्ध जल को लेकर लड़ा जाएगा। इमारत व अन्य वस्तुओं के निर्माण के लिए जंगल को बेतहाशा काटा जा रहा है। इससे संपूर्ण प्रकृति प्रभावित हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग खतरनाक ढंग से बढ़ रहा है। सूखा, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाएं लगातार मानव जाति को नुकसान पहुंचा रही है। बड़े-बड़े उद्योग धंधे भी प्रकृति को नष्ट करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इन कारखानों से निकलने वाले घातक कचरे का निस्तारण सही ढंग से करने की व्यवस्था नहीं होने के कारण इसे करीब की नदियों में बहाया जा रहा है।
घरों से निकलने वाला कचरा भी इन नदियों में बहाया जा रहा है। लिहाजा वे प्रदूषित हो चुकी हैं।  कई नदियां नालों में बदल गई है तो कई नदियों का अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म हो चुका है। विकास के नाम पर किसानों की जमीनें छीनी जा रही है। इससे न केवल अन्न की उत्पादकता पर असर पड़ा है बल्कि किसान, मजदूर बनता जा रहा है। उसकी रोजी-रोटी छीन गई है। इसने पर्व के पीछे के हमारे असली मनोभाव और उद्देश्य तक लगभग खत्म कर दिया है।
इसी दिन पृथ्वी पर  उतरी थीं गंगाबंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है। यहां गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। मकर संक्रान्ति के दिन गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिये व्रत किया था।
पोंगल :  स्वच्छता का पर्व तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अन्तिम दिन कन्या-पोंगल। इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है।
नेपाल में मकर-संक्रान्तिनेपाल के सभी प्रान्तों में अलग-अलग नाम व रीति-रिवाजों से यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन किसान अपनी अच्छी फसल के लिये भगवान को धन्यवाद देकर अपनी अनुकम्पा को सदैव लोगों पर बनाये रखने का आशीर्वाद मांगते हैं। यही वजह है कि इस त्योहार को फसलों एवं किसानों के त्योहार के नाम से भी जाना जाता है। नेपाल में मकर संक्रान्ति को माघे-संक्रान्ति, सूर्योत्तरायण और थारू समुदाय में माघी कहा जाता है। थारू समुदाय का यह सबसे प्रमुख त्योहार है।
अमृत कलश की कथा    समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ के लिए देवताओं और असुरों में महासंग्राम हुआ था। देवताओं ने अमृत कलश को दैत्यों से छिपाने के लिए देवराज इंद्र को उसकी रक्षा का भार सौंप दिया। इतना ही नहीं इस दायित्व को पूरा करने के लिए सूर्य, चंद्र, बृहस्पति और शनि भी शामिल थे। दैत्यों ने इसका विरोध करते हुए उसे प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की। तब उन्होंने तीनों लोकों में इन्द्र के पुत्र जयंत का पीछा किया। उधर कलश की रक्षा के प्रयास में जयंत ने पृथ्वी पर विश्राम के क्रम में अमृत कलश को मायापुरी (हरिद्वार), प्रयाग (इलाहाबाद), गोदावरी के तट पर नासिक और क्षिप्रा नदी के तट पर अवंतिका (उज्जैन) में रखा था। परिक्रमा के क्रम में इन चारों ही स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें छलक गई थीं, जिसके कारण इन तीर्थों का विशेष महत्व है।
उत्तरकाशी का मेलामाघ मेला उत्तरकाशी इस जनपद का काफी पुराना धार्मिक-सांस्कृति तथा व्यावसायिक मेले के रूप में प्रसिद्ध है। इस मेले का प्रतिवर्ष मकर संक्राति के दिन पाटा-संग्राली गांवों से कंडार देवता के साथ -साथ अन्य देवी देवताओं की डोलियों का उत्तरकाशी पहुंचने पर शुभारम्भ होता है। यह मेला 14 जनवरी मकर संक्राति से प्रारम्भ हो 21 जनवरी तक चलता है। इस मेले में जनपद के दूर दराज से धार्मिक प्रवृत्ति के लोग जहां गंगा स्नान के लिये आते है। मेला अवधि में उत्तरकाशी जिले के सभी भाग से लोग अपने-अपने देवी-देवताओं की डोली के साथ उत्तरकाशी आते हैं। मकर संक्रांति के दिन प्रात: सभी डोलियों को मणिकर्णिका घाट लाकर विसर्जित कर दिया जाता है। उसके बाद उन डोलियों को जुलूस में गायकों एवं नर्तकों के साथ चमला की चौड़ी, भैरों मंदिर तथा विश्वनाथ मंदिर ले जाया जाता है और फिर रामलीला मैदान में यह जुलूस समाप्त हो जाता है।
 सप्ताह भर का उत्सव अपने सर्वोत्तम परिधानों सहित यहां के लोगों द्वारा मनाया जाता है तथा परंपरागत नृत्यों तथा गानों का सिलसिला लोगों के मनोरंजन के लिये प्रत्येक रात जारी रहता है। वहीं सुदूर गांव के ग्रामवासी अपने-अपने क्षेत्र के ऊन एवं अन्य हस्तनिर्मित उत्पादों को बेचने के लिये भी इस मेले में आते हंै।
प्रयाग का माघ मेलाप्रयाग का माघ मेला विश्व का सबसे बड़ा मेला है। प्रत्येक वर्ष माघ माह में जब सूर्य मकर राशि में होता है, तब सभी विचारों, मत-मतांतरों के साधु-संतों सहित सभी आमजन आदि लोग त्रिवेणी में स्नान करके पुण्य के भागीदार बनते हैं। इस दौरान छह प्रमुख स्नान पर्व होते हैं। इसके तहत पौष पूर्णिमा, मकर संक्रान्ति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, माघ पूर्णिमा और महाशिवरात्रि के स्नान पर्व प्रमुख हैं। पौराणिक मान्यता के मुताबिक इलाहाबाद के माघ मेले में आने वालों का स्वागत स्वयं भगवान करते हैं।
माघ मेले का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से भी पुराना माना जाता है। राजा हर्षवर्धन के शासनकाल से माघ मेले का वर्णन किसी न किसी रूप में मिलता है। राजा हर्षवर्धन के समय भारत आए चीनी यात्री ह्वेन सांग ने लिखा है कि प्रयाग में हिन्दुओं का एक बड़ा मेला लगता है, उस मेले में सैकड़ों ब्राह्मण संगम तट पर एकत्र होकर ईश्वर की आराधना में स्वयं को संलग्न किया करते हैं। ह्वेनसांग ने लिखा है कि कुछ ऐसे भी लोग हैं जो एक सप्ताह तक व्रत रखते हैं और सातवें दिन शरीर त्यागने के लिए संगम की बीच धारा में कूदकर जल समाधि ले लेते हैं। चीनी यात्री ने कुछ ऐसे श्रद्धालुओं का जिक्र भी किया है जो संगम में सूर्योदय से सूर्यास्त तक एक पैर पर खड़े रहकर आराधना किया करते थे और सूर्यास्त के बाद जल से बाहर आते थे, क्योंकि उनका मानना था कि इस प्रकार की आराधना से उन्हें बार-बार मृत्यु लोक में आने से मुक्ति मिल जाएगी।
धार्मिक ग्रंथों में माघ मेले का वर्णन तो नहीं मिलता, लेकिन प्रयाग, गंगा, संगम, माघ मास में गंगा स्नान का महात्म्य आदि रामायण, महाभारत, पुराण तथा उपनिषद् आदि में किसी न किसी रूप में अवश्य मिलता है। तुलसीदास ने भी रामचरित मानस में माघ और मकर राशि का महत्व वर्णित किया है।पतंग उत्सवमकर संक्रांति को बच्चे, बूढ़े और जवान सभी पतंगबाजी का लुत्फ लेते हैं। अब तो पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई राज्य इस मौके पर पतंग उत्सव का भी आयोजन करने लगे हैं। बनारस हो या पटना हर जगह वो काटा आसमान में गूंजता रहता है।
नदियों के किनारे, मैदान और छतों पर लोग अल सुबह से ही पतंगबाजी करने उतर आते हैं। यह पतंगबाजी कलात्मकता और रचनात्मकता के साथ इससे जुड़े लोगों को आर्थिक संबल भी प्रदान करती है। राजस्थान में पर्यटन विभाग की ओर से प्रतिवर्ष तीन दिवसीय पतंगबाजी प्रतियोगिता आयोजित की जाती है, जिसमें राज्य के पूर्व दरबारी पतंगबाजों के परिवार के लोगों के साथ-साथ विदेशी पतंगबाज भी भाग लेते हैं। इसके अतिरिक्त दिल्ली और लखनऊ में भी पतंगबाजी के प्रति आकर्षण है। दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भी पतंग उडाऩे का चलन है। हालांकि आज के भागमभाग पूर्ण जीवन में खाली समय की कमी के कारण यह शौक कम होता जा रहा है, लेकिन यदि अतीत पर दृष्टि डालें तो हम पाएंगे कि इस साधारण सी पतंग का भी मानव सभ्यता के विकास में कितना महत्वपूर्ण योगदान है।2,300 वर्ष पुराना है पतंगबाजी का इतिहासमाना जाता है कि पतंग का आविष्कार ईसा पूर्व तीसरी सदी में चीन में हुआ था। दुनिया की पहली पतंग एक चीनी दार्शनिक मो दी ने बनाई थी। इस प्रकार पतंग का इतिहास लगभग 2,300 वर्ष पुराना है। पतंग बनाने का उपयुक्त सामान चीन में उप्लब्ध था जैसे:- रेशम का कपडा़, पतंग उड़ाने के लिये मज़बूत रेशम का धागा और पतंग के आकार को सहारा देने वाला हल्का और मज़बूत बांस।
मान्यताएं और अंधविश्वास आसमान में उडऩे की मनुष्य की आकांक्षा को तुष्ट करने और डोर थामने वाले की उमंगों को उड़ान देने वाली पतंग दुनिया के विभिन्न भागों में अलग अलग मान्यताओं परम्पराओं तथा अंधविश्वास की वाहक भी रही है। मानव की महत्वाकांक्षा को आसमान की ऊंचाईयों तक ले जाने वाली पतंग कहीं शगुन और अपशकुन से जुड़ी है तो कहीं ईश्वर तक अपना संदेश पहुंचाने के माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित है। प्राचीन दंतकथाओं पर विश्वास करें तो चीन और जापान में पतंगों का उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिये भी किया जाता था। चीन में किंग राजवंश के शासन के दौरान उड़ती पतंग को यूं ही छोड़ देना दुर्भाग्य और बीमारी को न्यौता देने के समान माना जाता था। कोरिया में पतंग पर बच्चे का नाम और उसके जन्म की तिथि लिखकर उड़ाया जाता था ताकि उस वर्ष उस बच्चे से जुड़ा दुर्भाग्य पतंग के साथ ही उड़ जाए। मान्यताओं के अनुसार थाईलैंड में बारिश के मौसम में लोग भगवान तक अपनी प्रार्थना पहुंचाने के लिये पतंग उड़ाते थे जबकि कटी पतंग को उठाना अपशकुन माना जाता था।
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