मची है हाहाकार गैस की

ramesh jhaरमेश झा:नव गणतन्त्र नेपाल की अधिकांश जनता अभावपर्ूण्ा जीवन जीने को बाध्य है । विगत सात वर्षों से संविधान के अभाव में जीवन जीने की आदत बना चुकी नेपाली जनता सरकार की अदूरदर्शी शासन व्यवस्था के परिणामस्वरूप कभी पेट्रोल, कभी डीजल, कभी मिट्टीतेल पाने के लिए घण्टों कतार में लगने को बाध्य होती है, तो कभी नमक अभाव की पीडÞा झेलती है । विगत कुछ महीनों से एलपीजी गैस के डीलरों अथवा सम्बन्धित निकायों द्वारा होने वाले कृत्रिम अभाव या किए गए काला बाजारी से र्सवसाधारण छटपटा रहे हंै । नेपाली जनता को अभावजन्य पीडÞा की टेढÞी लकीर पर चलते-चलते टेढÞी लकीर भी सीधी लगने लगी है ।
गैस डीलरों के द्वारा मनमाना मूल्य लेकर देर रात में बोरों में बन्द करके कालाबजारी करते यत्र-तत्र र्सवत्र देखा जा रहा है । आजकल गैस दैनिक वस्तु की आवश्यकता -नमक, तेल, लकडÞी) के रूप में स्थापित हो चुकी है । ऐसी दैनिक उपभोग्य वस्तु गैस के कृत्रिम अभाव कीे हाहाकार क्यों नहीं सुनाई दे रही है – lpg-gas-cylinder-300x225उत्तरदायित्वबोध क्यों नहीं हो रहा है – राजनीतिज्ञों की सफलता का ढिंढोरा तो पीटते हैं, सम्बन्धित विभाग प्रमुख लोग अपने-अपने गिरेवानों में क्यों नहीं झाँकने की कोशिश करते हैं – बहुत दुःख से कहना पडÞता है कि हम जनता, कर्मचारी सब के सब बराबर के दोषी हैं । जनता कर्मचारी जागरुक होती तो कोई भी सरकार प्रमुख लोग कृत्रिम अभाव या गलत कार्य करने-कराने से पहले दस बार सोचने को विवश होते, पर उच्च पदों पर चाकरी करके आसीन होने वाले प्रमुख लोेग जानते हैं कि हमारे देश की बहुसंख्यक जनता गौतमबुद्ध जैसे बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए समाधिस्थ हो चुकी है । फलस्वरुप एक महीना पहले डीडीसी कम्पनी ने प्रतिलिटर दूध में १२, १४ रुपये की मूल्यवृद्धि की, फिर भी जनता की ओर से चूँ की आवाज भी नहीं निकली । इसी तरह गैस का अभाव महीनों से है पर जनता ने ठान रखी है कि हम अपनी मौनता नहीं तोडेÞंगे ।
गैस अभाव के कारण जनता त्राहि माम कर रही है, अधिक मूल्य देकर घुसपैठिये तरीके से गैस खरीदती है पर मुँह में दही जमाकर बैठी है । र्सवसाधरण उपभोक्ता घंटों तक कतार में लगने के बाद जिनको एक सिलिण्डर गैस मिल जाता है, वे अपने को तीसमार खाँ समझते हैं । उनको लगता है कि मैंने बहुत बडÞा जंग जीत लिया । उपभोक्ता वर्ग एक-दो महीने पर्ूव ही गैस बेचने वाले दुकानों पर, डीलरों के पास अपना-अपना नाम लिखवाते है और प्रतिदिन उनके पास उसी प्रकार जाते है मानों ‘कृपानिधान’ के पास मन्दिर में जाया जाता है । कृत्रिम अभाव करने वाले कृपानिधानों -डिलरों) की एक ही आवाज सुनने के लिए गैस भक्तगण, आदत बना चुके हैं कि आते-जाते रहिए । किसी न किसी दिन गैस भगवान की कृपा हो जाएगी ।
निगम का कहना है- गैस आयात सहज है, हरेक दिन मांग से अधिक १४ हजार सिलिण्डर आता है पर उपभोक्ता को सहज रूप में गैस नहीं मिलती है । क्यों – क्योंकि मन्त्रियों, आयल निगम और गैस व्यवसायियों की मिलीभगत के कारण जानबूझकर कृत्रिम अभाव की स्थिति पैदा की गई है । ऐसा आरोप र्सवत्र सुनने में आ रहा है । अतः यह आरोप अस्वाभाविक नहीं लगता ।
पशुपतिनाथ का यह देश बडÞा विचित्र है । एक तरफ संविधान सभा संविधान निर्माण को लेकर कुरुक्षेत्र बना हुआ है, जहाँ सभी पार्टियों के निर्वाचित-मनोनित ६०१ सदस्य धृतराष्ट्र बन आरोप-प्रत्यारोप और मल्लयुद्ध में मस्त हैं, तो दूसरी ओर पदासीन सरकार ही रक्षक ही भक्षक बनने के कारण परमुखापेक्षी जनता -बालक, वृद्ध, बीमार, प्रसूती महिलाएं) इस कंपकंपाती ठण्ड के मौसम में गैस अभाव के कारण कैसी और कौन-कौन सी मुसीबत को झेलती है, कल्पना की जा सकती है ।
बाजार में गैस के कृत्रिम अभाव के कारण साधारण जनता महीनों से त्राहि त्राहि करती देख सरकार का त्रिनेत्र खुला तो उपभोक्ताओं को राहत पहुँचाने के लिए सुलभ गैस दुकान खोलने का निर्ण्र्ाालिया है । २२ जनवरी आयल निगम, नेशनल टे्रेडिंग टेकु के सहकार्य में टेकुस्थित सुलभ दुकान में गैस लेने वालों की लम्बी कतार लगी । कुछ को मिला, कुछ को नहीं । जिनको नहीं मिला, वे नारेबाजी के साथ पर््रदर्शन करते रहे । कोई तो कतार में ही बेहोश हो गये । निगम के दावे के अनुसार यदि मांग से अधिक गैस आयात होता है तो बाजार में गैस अभाव क्यों – वस्तुतः अभाव की स्थिति सृजित नहीं की गई है तो अधिक पैसे देने पर गैस कैसे मिल जाता है – यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है । कृत्रिम अभाव करने वालों, काला बाजारी को रोकने का उत्तरदायित्व किसका है – क्या संविधान निर्माण के अभाव में पदासीन सरकार एवं आयल निगम को कालाबजारी को रोकने का उत्तरदायित्व बहन करने का भी अधिकार नहीं है – निरीह र्सवसाधारण जनता कुशासन के चक्रव्यूह में घुन की तरह कब तक पीसती रहेगी –
क्यों इस देश की शासन प्रशासन की व्यवस्था पञ्चायती भ्रष्टाचारी व्यवस्था से बदतर होती जा रही है – क्या नेपाल में नवगणतन्त्र कर्मचारीतन्त्र को ब्रहृमलूट करने के लिए ही लाया गया – वाह री लोकतान्त्रिक सरकार ! पैसा देकर दैनिक उपभोग्य वस्तु की मांग को भी पूरा नहीं कर सकती है, यह कैसी लोकतान्त्रिक सरकार –
सहमति अनुसार एलपीजी गैस उद्योग संघ को उत्पादित गैस का ५ प्रतिशत गैस नेशनल ट्रेडिंग के टेकु एवं रामशाह पथ स्थित प्रांगण में अस्थायी रूप में बिक्री-वितरण करने के लिए देना होगा । नेशनल टे्रडिङ गैस बिक्री वितरण करने के लिए स्थान, सुरक्षा तथा बिक्री प्रबन्धन की व्यवस्था मुहैया करेगा । इस अस्थायी व्यवस्था से उपभोक्ता को राहत मिलेगी तथा काला बाजारी करने वाले निरुत्साहित होंगे, ऐसा कहना निगम के कार्यकारी निर्देशक चण्डिका भट्ट का है । अब प्रश्न उठता है कि क्या दो-चार सुलभ गैस दुकान के माध्यम से सम्पर्ूण्ा राजधानीवासी समस्या से निजात पा जाएगी – उपभोक्ताओं को कोसों दूर से गैस ले जाने में कैसी दिक्कतें उठानी पडेÞगी – कितने रुपये व्यय करने पडेंÞगे इस ओर सरकार-निगम ने कभी सोचा – दो चार अस्थायी सुलभ गैस दुकान खोलने के बजाय सरकार और निगम द्वारा कालाबाजारी करने वालों, कृत्रिम अभाव पैदा करने वाले निकायों पर दण्डात्मक नकेल कसने का साहस क्यों नहीं दिखाया जा रहा है – ऐसा न करने से यही लगता है कि कालाबाजारी कराने में सरकार-निगम दोनों की मिलीभगत है । निगम भी मानती है कि कालाबाजारी एवं होर्डिंग करने से बाजार में गैस अभाव की समस्या विद्यमान है । कालाबाजारी को सरकार-निगम मिलकर अंकुश लगाने का प्रयास करें और त्राहिमाम करती जनता की पीडÞा का अनुभव करें और उस पीडÞा से मुक्ति दिलाएँ, इसी आशा के साथ … ।

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