मतपेटिका का पेट गांधारी की तरह होगया, गर्भ है बच्चा पैदा नही हो रहा : बिम्मी शर्मा

बिम्मी शर्मा, वीरगंज, २३ मई , (व्यग्ँय) | इस मतपेटिका माता के पेट में पता नहीं मतपत्र नाम के कितने बच्चे हैं जो निर्वाचन आयोग नाम का अस्पताल और इसके नर्स जैसे कर्मचारी इसकी गिनती नहीं कर पा रहे हैं । मतपेटिका माता को प्रसव वेदना हुए तो १० दिन हो गए पर इनके पेट में पल रहे छोटे–छोटे अनगिनत मतपत्र बेबी बाहर निकल ही नहीं रहे है । बडे–बड़े डाक्टर निर्वाचन की डिलीवरी समय में करने और करवाने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं पर मतपत्र नाम का यह भ्रुण बाहर आने का नाम ही नहीं लेता ।

मतपेटिका माता के पेट में जीत और हार नाम के जुंड़वा बच्चे पल रहे हैं । जीत लड़का है तो हार लड़की । जिस तरह हमारे बेटी या लड़की पैदा हो यह कोई नहीं चाहता उसी तरह हार भी पैदा हो यह भी कोई नहीं चाह रहा । सब जीत यानी कि बेटा चाहते हैं । इसी लिए मतपेटिका के पेट से अपने लिए जीत नाम का बेटा मिले । जिसे वो झुनझुना बजा कर सारे शहर में दिखाना चाहते हैं । पर बेचारी मतपेटिका का मतपत्र से भरा हुआ पिचकता ही नही । मतपेटिका के प्रसव वाले दिन अर्थात निर्वाचन के दिन इसी के साथ पैदा हुए बच्चों का छठियार भी हो गया । इसी दिन जिस, जिस की शादी हुई थी वह सब हनीमून मना कर भी आ गए होगें । शायद नौ महीने बाद इनके घर में भी हार या जीत नाम का बच्चा पधारेगा । जो, जो इस दिन मरे होगें उनकी बारहवीं या तेरहवीं भी एक, दो दिन में हो जाएगीं । पर यह मतपेटिका का पेट गांधारी की तरह हो गया । गर्भ तो है, प्रसव का समय भी हो गया है पर बच्चा नहीं पैदा हो रहा । जाने कब मतपेटिका माता के पेट से बच्चा जनम लेगा ?

वीरवल की खिचड़ी भी अबतक बन कर तैयार हो गयी होती । अकबर उस खिचडी को खा कर अब तक युद्ध करने भी चले गए होते ? कछुवा और खरगोश का दौड होता तो अभी तक कछुवा जीत कर राजा बन जाता ? भगवान शिव के दोनो पुत्र गणेश और कुमार भी सुमेरु की परिक्रमा कर के आ चुके होते । भगवान शिव के आशिर्वाद से उन के बच्चे भी बडे हो गए होते । जिन्होने निर्वाचन के दिन अपने बाल कटवाए होगें उनके बाल भी बढ़ कर सिर के खेत में लहलहा रहे होगें ? नाखुन भी बढ कर फिर काटने का समय आ चुका होगा ? पर यह कमबख्त निर्वाचन का मत परिणाम पता नहीं कब आएगा ? सूखे से पीडि़त किसान जिस तरह मानसून के लिए आसमान की तरफ देखता रहता है उसी तरह राजधानी वासी राष्ट्रीय सभा गृह की ओर टकटकी लगा कर देख रहे हैं ? पर यह मुआ स्थानीय तह के चुनाव का नतीजा भतीजा से भी ज्यादा भाव खा रहा है जो आने का नाम ही नहीं लेता ?

स्थानीय तह का निर्वाचन का नतीजा तो छोटा सा भतीजा की तरह है फिर भी आने में आनाकानी और देरी कर रहा है । जब प्रदेश या संसद का चुनाव जो चाचा या ताउ की तरह है वह होगा तो उसका परिणाम न जाने कितने महीनों के बाद आएगा ? एसएलसी की परीक्षा का परिणाम इन निर्वाचन के परिणाम से जल्दी होगा शायद । जनकपुर और जयनगर के बीच चलने वाला सुपर स्लो ट्रेन भी निर्वाचन के मत गणना से अगर प्रतिष्पर्धा की जाती तो अवश्य यह रेल सेवा ही बाजी मार जाएगी । जितने भी रेगंने वाले जीव या सवारी है उस सबका यदि इस स्थानीय निकाय के मत गणना से अगर कम्पिटिशन होगी तो सब बैठे ठाले जीत जाएगें और मत गणक मूँह देखते रह जाएगें ।

सभी निक्कमे सरकारी कर्मचारियों को मत गणना के काम मे लगाया गया है । जो और समय अपने आफिस में या तो उपरी आम्दानी को बटोरने में लगे रहते होगें नहीं तो फुर्सत का समय कुर्सी पर उंघते और खैनी माडने में बिताते होगें । अब मतगणना के समय तो उपरी आम्दानी होगी नहीं ईसी लिए धीरे धीरे अपने मत गणना कार्य को आगे बढा कर अपना भत्ता पका रहे हैं । उपरी आम्दानी न सही जितने दिन तक खींचे भत्ता ही सही । इसी लिए खींच, खींच कर च्यूंगम की तरह मत गणना को खींच रहे है । च्यूंगम का स्वाद शुरु में तो मीठा होता है बाद में यह स्वाद हीन हो जाता है । उसी तरह से स्थानीय तह का यह निर्वाचन, मत गणना और मत परिणाम भी बेस्वाद का हो गया है ।

जितना यह मतगणना लंबा खिंचता जाएगा विभिन्न मीडिया और पत्रकारों को उतना ही फायदा होगा । इन्हे दूसरे खोज मूलक समाचार के लिए दौड़भाग नहीं करनी पडेगी । अपने हर समाचार बुलेटिन में कौन से जिला का कौन सा नगर, वडा और गाँव में कौन कितने वोटों से जीता या आगे या पीछे है । बस ईसी समाचार को बार, बार उलट, पलट कर दिखा कर दर्शकों का दिमाग खाएगें और अपना मेहनत बचाएगें । कुंभ के मेले की तरह २० साल बाद देश में स्थानीय तह का निर्वाचन हो रहा है फिर अगले २० साल तक होगा कि नहीं क्या पता ? इसीलिए चारों तरफ उत्सव का महौल है । इसी लिए किसी भोलेभाले ग्रामीण ने मतपेटिका को फूल चढा कर और हाथ जोड कर प्रणाम किया था ।

बेचारे उस अभागे ने कई सालों बाद मतपेटिका का दर्शन किया तो उसे वह साक्षत देवी नजर आईं । हमारे राजनीतिक दल और उसके रहनुमाओं नें देश की हालत ऐसी बदतर कर दी कि बेचारी जनता खुशी के पल का इंतजार भी निर्वाचन के दिन के रुप में करने लगी । हिंदू धर्म शास्त्र के अनुुसार श्रीमद भागवत ७ दिन तक, रामायण और देवी पुराण नवाहा नौ दिन तक वाचन होता है । इसमें बहुत ज्यादा पैसा और समय खर्च होता है । उसी तरह निर्वाचन भी एक महायज्ञ है जिसमें विभिन्न दलों के घोषणापत्र का वाचन उसके नेतागण और हनुमान करते हैं । जनता देख और सुन कर कृतार्थ हो जाती है । फिर ऐसा सूयोग मिले न मिले ?

इसी लिए इस महायज्ञ में मतपेटिका को हवन कुंड या देवी मान कर उसकी पूजा की जाती है । जब देवी मानी है तो वह वास्तव में मां ही तो हुई । जिसके अंदर हार या जीत नाम के बच्चे जल्द से जल्द पैदा होने के लिए कसमसा रहे हैं । पर पंडित या नर्स न ठीक मंत्र पढ रहे न इलाज कर रहे हैं । इसीलिए इस मतपेटिका माता के लिए आइए हम सब मिल कर प्रार्थना करें ।

जय मतपेटिका माता ।

आप ही हो नेताओं की भाग्य विधाता ।

आप को निश दिन सेवत यह

भ्रष्टाचार और देश विनाश के ज्ञाता

 

 

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