मतभेद कोई नया नहीं:
प्रचण्ड

तीनों नेताओं के बीच के संबंध में कटुता आ गई है । इसका असर पार्टर्ीीे निचले स्तर तक देखने को मिल रहा है । माओवादी का करीब से जानने वाले विश्लेषकों का मानना है कि मैं परिस्थिति देखकर कभी वैद्य तो कभी भट्टर्राई के करीब चला जाता हूँ । इन दोनों के साथ प्रचण्ड का कभी भी स्थिर संबंध रहा ही नहीं । लेकिन इस समय मैं अपने दोनों उपाध्यक्षों के निशाने पर हूँ ।
पालुंगटार बैठक से पहले हम तीनों नेताओं के बीच जिस तरह की दूरी देखी गयी थी, उसी तरह की दूरी अभी भी है । लोगों को लगता है पार्टर्ीीे भीतर तीन नेता प्रचण्ड, मोहन वैद्य और बाबुराम भट्टर्राई अपने-अपने दाँव में लगे हैं। अपनी-अपनी योजनाएँ बनाने में व्यस्त हैंतथा उनका अधिकांश समय एक-दूसरे की आलोचना में ही जा रही है । इसका एक ताजा उदाहरण था उपाध्यक्ष मोहन वैद्य के द्वारा अध्यक्ष प्रचण्ड के विरुद्ध तैयार की गई १८ विन्दुओं वाला आरोप पत्र ।
नयाँ कुछ करना चाहिए ऐसा विचार प्रकट करने पर मेरे भट्टर्राई के करीब जाने की बात होती है । वहीं कभी यह कह दिया कि क्रान्तिकारी सिद्धान्त की रक्षा करनी चाहिए, आन्दोलन को नहीं छोडना चाहिए तो मुझे किरण के नजदीक मान लिया जाता है । अभी भी अवस्था इससे पृथक नहीं है । अपने भाषणों में प्रचण्ड द्वारा बाबूराम के साथ संर्घष्ा प्रधान व एकता सहायक तथा किरण के साथ एकता प्रधान व संर्घष्ा सहायक होने का अनुभव भी सुनाते रहते है ।
बाबुराम जी के साथ एकता व संर्घष्ा की स्थिति देखी जाए तो उनके साथ संर्घष्ा का पक्ष प्रमुख लगता है और किरण के साथ इसके ठीक विपरीत । लेकिन कभी कभी होने वाला यह संर्घष्ा अत्यन्त ही तीखा व पेंचीदगी से भरा होता है । बाबूराम जी की नए ढंग से आगे बढÞने की बात सकारात्मक होते हुए भी इसके भीतर बर्ुर्जुवा सुधारवाद में ही सीमित रहने का सार दिया है । ऐसा मुझे लगता है ।
बाबुराम जी व किरण जी दोनों ही मुझे अकर्मण्यतावादी व मध्यपंथी कहते हैं जो कि नई बात नहीं है । जनयुद्ध पर्ूव भी वो मुझे ऐसा ही कहते थे वो बहस अब यहाँ तक आ गया है । इसके सकारात्मक रूप में देख जाने पर मैं अपने आपको मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी के रूप में पाता हूँ । लेकिन वो दोनों सिर्फएक-एक पहल को ही पकडÞकर उसे खींच रहे हैं । उनके तुलना में मैं अपने आप को द्वं्रद्ववादी ही समझता हूँ । विवाद का यह विषय अभी नहीं उठा है । ०४७-४८ साल के आसपास भी मुझे सिर्फलीपापोती करने वाले नेता के रूप में ही लोग जानते थे । वास्तविक लीडर तो कोई और ही है । यह चर्चा उस समय काफी जोरों पर थी । जनयुद्ध में कूदने से ठीक पहले तो हम लोगों के बीच में अत्यन्त ही तीखा व तेज संर्घष्ा भी हुआ । चौथे विस्तारित बैठक के आस पास भी कुछ ऐसी ही अवस्था थी ।
मैं हमेशा कहता था कि सभी नेता को अपना पोजीसन स्पष्ट करना चाहिए । सभी के कमजोरी व सबल पक्ष कौन है, यह तो भविष्य में पता लग ही जाता । भारतीय विस्तारवाद विरुद्ध संर्घष्ा के पक्ष को बाबुराम द्वारा सहायक बनाने की सोच में तो गंभीर समस्या थी । नए ढंग से जाने की बात कहने पर हमेशा यह डर बना रहता था कि कहीं किरण को पसन्द आने पर भी जैस ही नए तरीके से चलने की बात मैं करता था वैसे ही उनसे मेरा संबंध बिगडÞ जाता है । अभी जो भी विवाद खडÞा हुआ है, इसके सकारात्मक पक्ष को देखने पर यह एक तरह का खबरदारी माना जा सकता है । लेकिन प्रक्रियागत ढंग से देखने पर इस में व्यवधान जैसा भी दिखता है । किरण, बाबुराम भट्टर्राई और मैं जनयुद्ध की तैयारी से लेकर आज तक साथ ही हैं । हमारे बीच लगातार एकता व संर्घष्ा का संबंध रहा है । हमारे बीच जोडÞ या कोण भी अलग अलग हैं । कभी कभी हम किसी के पास तो किसी से दूर होते जाते हैं और अभी भी अवस्था इससे अलग नहीं है ।
-प्रस्तुत विचार एकीकृत माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड द्वारा अपने प्रतिवेदन में लिखे गए बातों का हिन्दी रुपांतरण है ।)

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