मत्सरी का दुर्गा मंदिर

नेपाल के रौतहट जिल्ला स्थित ‘मत्सरी’ गाँव साक्षरता के लिए तो प्रसिद्ध है ही, यहाँ दुर्गा पूजा भी काफी धूमधाम से मनाया जाता है । यह एक ऐसा स्थान है, जहाँ एक बार आकर इसके संस्मरण को पूरी जिंदगी नहीं भुलाया जा सकता है । माँ की कृपा पाने के लिए पूरे साल इस मंदिर में श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है, मगर नवरात्रि के दिनों में इस मंदिर की छटा ही निराली होती है । श्रद्धालु यहाँ पर विशेष प्रकार की पूजा का आयोजन करते हैं ।
मंदिर के भवन का इतिहास कोई खास पुराना नहीं है । बागमती किनारे होने के चलते पिछले सौ सालों में दो बार गाँव का स्थान बदलना पड़ा है । कहते हैं जहाँ प्राकृतिक विपदा आती है वहां नया निर्माण भी होता है, विकास भी होता है । आज इस गाँव से भले ही लक्ष्मी कुछ समय के लिए नाराज हो के चली गई किन्तु सरस्वती के आगमन से फिर से इस गाँव को नेपाल के जाने माने गाँव के रूप में पहचान मिली है । मंदिर के प्रांगण में हनुमान मंदिर, देवी मंदिर, बलि प्रदान मंडप, धर्मशाला तथा कीर्तन के लिए स्थान बनाया गया है । मेला के लिए मंदिर के प्रांगण और आस पास के सड़क उपलब्ध कराये जाते हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए मंदिर से सटे हाई स्कूल के प्रांगण को उपलब्ध कराया जाता है ।
पूजा का माहोल यहाँ घटस्थापना के दिन से ही शुरु हो जाता है । गाँव के प्रत्येक घर से बिना मांगे चंदा देने वालों की भीड़ देखने को मिलती है । मंदिर में २४ घंटा लगातार दुर्गा सप्तसती का पाठ किया जाता है । प्रतेक दिन कुंवारी कन्याये अपने फुलडाली में मिट्टी से दीप बनाकर सरसों का तेल लेकर मंदिर की आस पास सटे सभी मंदिरों में दीप जलाती है तो सुबह सुबह किशोर लड़के फूल तोड़ने निकलते हैं । गाँव के प्रत्येक घरों में दुर्गा सप्तसती पाठ किया जाता है । पूजा के छठे और सांतवे दिन गाँव के किशोर लड़को द्वारा सामाजिक नाटक किया जाता है और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया जाता है । पूजा के महाअष्टमी के दिन लगभग ८००० से अधिक बकरों की बलि दी जाती है, उसके बाद महानवमी और महादशमी के रोज यहाँ लोग दिन या रात सोते तक नहीं फिर भी इस पूजा का करीब २ महीनों से बेसब्री से किया गया इंतजार कब झट से निकल जाता है लोग सोच भी नहीं सकते ।
इस मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कथा है कि भारत से सटे मधेश और भारत के गाँवों में आज से करीब सौ साल पहले हैजा बहुत भयानक बीमारी के चलते गाँव के गाँव के मर जाते थे । तब दक्षिण भारत में शिरडी के साईं बाबा ने अपने आध्यात्मिक शक्ति द्वारा चावल को मंत्र से अभिमन्त्रित करके भेजा, जिससे हैजा को आस पास के गाँवों में फैलने से रोक लगी । चुंकि उस समय हॉस्पिटल डॉक्टर की सुविधा नहीं थी तो लोग वैद्य या भगवान से मन्नत मांगते थे । और इसी दौरान मत्सरी में दुर्गा मंदिर की स्थापना की गयी थी, तब से लेकर आज तक दिन–प्रतिदिन श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोतरी होती जा रही है ।
मत्सरी पहुँचने के लिए इन दिनों काफी सुविधायें हैं । नेपाल से बस सेवा और बिहार से सीतामढ़ी, बैरगनिया से सटे रौतहट के सदरमुकाम गौर तक, और गौर से ऑटोरिक्सा, जीप और तांगा उपलब्ध है ।
प्रस्तुतिः सुजित कुमार झा

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