मधेशवादी दलों का एकीकरण जरुरी या मजबूरी

लीलानाथ गौतम:राजनीतिक दलांे क े ऊपर आरापे लगता आ रहा है कि वे फूटना जानत े ह,ंै जटू ना नही।ं यह आरापे मधशे वादी दला ंे क े प्रि त कछु ज्यादा ही ह।ै ले िकन इन आरापे ा ंे का े कछु मधशे वादी दल ही गलत साबित कर रह े ह,ंै कछु लागे ा ंे का एसे ा कहना ह।ै यह बात भी सच ह ै कि मधशे वादी दला ंे के प्रति आस्थावान जनता के लिए वर्तमान म ंे मधशे वादी दला ंे का एकीकरण बहतु बडीÞ आवश्यकता है। लेकिन मधेशवाद के प्रति मधशे ी जनता म ंे जा े भावना ह,ै मधशे क े लिए राजनीति करन े वाल े नते ा लागे ा ंे न े कभी भी उसक े प्रि त ध्यान नही ं दिया। बहतु ा ंे का मनना है कि मधेशी जनता की भावना के ऊपर राजनीति करते हुए सत्ता से चिपकना मधेशी नते ाआ ंे की आदत बन चकु ी ह।ै ले िकन पिछली बार तर्राई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर्ीीमधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल और सद्भावना पार्टर्ीीे जो एकीकरण का प्रयास शुरु किया ह,ै जिस न े कछु मधे िशया ंे का े आशावादी बना दिया है। इसके साथ-साथ यह एकता किस लिए – कहते हुए बहस भी शुरु हो गई है। यहां वरिष्ठ विश्लेषक सीके लाल का कथन बहुत ही सटीक, गम्भीर और महत्वपर्ूण्ा है- ‘एकता किस लिए – दस सियार एक जगह मिल जाने से वो शेर नहीं बन जाते।’ Madhesi Ldr

विभिन्न र्सार्वजनिक कार्यक्रमों में सीके लाल द्वारा अभिव्यक्त विचार मधेशवादी दलों के एकीकरण करने के प्रयास के प्रति लक्षित है। एकीकरण प्रयास में रहे मधेशी नेताओं के लिए यह अभिव्यक्ति बहुत ही तीखी लग सकती है। लेकिन यथार्थ बात यही है। मधेश के नाम में राजनीति करने वाले नेता सत्ता के लिए अनेक टुकडÞो में विभाजित हो जाते हैं और मधेश को भूल जाते हैं, जनता में नेताओं का ऐसा ही चरित्र सामने आता रहा हिमालिनी l फरवरी/२०१४ ज्ञज्ञ जो प्रसन्न मुद्रा में है, वह स्वयं भी प्रसन्न रहता है और दूसरों के चेहरे पर भी मुस्कान ले आता है। सभी पथ -पन्थर्)र् इश्वर की ओर ही जाते हैं। -अंग्रेजी कहावत सम्बोधन किया जा सकेगा।’ इधर तर्राई मधेश राष्ट्रीय अभियान के अध्यक्ष तथा वरिष्ठ राजनीतिज्ञ जयप्रकाशप्रसाद गुप्ता का कहना कुछ और ही है। उनका कहना है कि एकीकरण में कुछ आशंका भी है। गुप्ता कहते हैं- ‘मुद्दा और विचार समान हो तो एकीकरण में कोई आपत्ति नहीं, लेकिन एकीकरण के बाद प्राप्त परिणाम आपत्तिजनक हो सकता है। गुप्ता के अनुसार एकीकरण के बाद पहला प्रभाव संविधानसभा में पडÞ सकता है।upendra+sarat संविधान निर्माण का मुख्य कार्यभार बहन कर रही संविधानसभा में यह एकीकृत शक्ति सत्ता निर्माण में प्रमुख भूमिका निर्वाह कर सकती है। अगर ऐसा हुआ तो आपत्तिजनक बात होगी। राजनीतिज्ञ गप्ु ता की इस बात म ंे दम भी ह।ै विगत म ंे सत्ता के िन्दत्र राजनीति करन े वाल े नते ा, अब जनता क े हित म ंे काम करन े क े लिए आग े आ रह े ह,ंै एसे ा विश्वास जनता नही ं कर सकती ह।ै एकीकरण प्रि क्रया म ंे हएु विवाद ने भी इस बात की पुष्टि की है। लेकिन मधेशी दला ंे क े बीच एकीकरण की आवश्यकता ह,ै इस विषय म ंे कार्इर्े भी मधशे वादी दा े मत नही ं ह।ै लम्ब े समय स े पत्रकारिता म ंे सक्रिय माआवे ादी नते ा रामरिझन यादव कहत े ह-ंै ‘ मधशे ी दला ंे क े बीच एकता हाने ा आवश्यक है। लेकिन अभी जो एकीकरण हो रहा है, उस म ंे उन लागे ा ंे की बाध्यता भी ह।ै ‘ यादव का मानना ह ै कि चनु ाव म ंे कमजारे साबित हाने े के बाद अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर उन लागे ा ंे म ंे त्रास बढनÞ े लगा ह।ै इसीलिए कछु मधशे वादी नते ाआ ंे न े एकता क े नारा का े बुलन्द किया है पत्रकार तथा विश्लेषक चन्द्रकिशोर झा भी स्वीकार करते हैं कि मधेश में एक मजबूत पार्टर्ीीी आवश्यकता है। झा आगे कहते हैं- ‘मधेशी जनता, मधेश में एक ऐसी मजबूत पार्टर्ीीो ढंूढÞ रही है,

जो मधेश और काठमांडू के बीच सम्बन्ध को जीवन्त और सशक्त बनाए रखे। लेकिन पत्रकार झा यह भी कहते हैं कि एकीकरण होने से ही कोई भी पार्टर्ीीजबूत नहीं हो सकती। उन का मानना है कि जो पार्टर्ीीधेश मुद्दा क्या है और इस में क्या करना चाहिए, इस बात को यदि सही ढंÞग से पहचान करके जनता को विश्वस्त कर सके तो वही पार्टर्ीीक्षम और सबल बन सकती है। मधेश से सरोकार राखने वाले बहुसंख्यक व्यक्तियों ने मधेशवादी दलों के बीच एकीकर ण की आवश्यकता पर जोडÞ दिया है लेकिन फिलहाल सिर्फतीन पार्टर्ीीे बीच एकीकरण हो रहा है। अन्य मधेशवादी दल एकीकरण प्रक्रिया से बाहर ही हैं। क्यों – सद्भावना के सह-अध्यक्ष कर्ण्र्ााहते हैं- ‘अभी प्रमुख पार्टियों के बीच एकीकरण हो रहा है। बाद में हम लोग सभी पार्टियों को समेट कर एक छाते के नीचे लाने की कोशिश करेंगे।’ अन्य दलों को बाहर रख कर सिर्फतीन पार्टर्ीीी एकीकरण होने के पीछे क्या राज हो सकता है – इसमें संघीय सद्भावना के अध्यक्ष झा कहते हैं- ‘यह तो एकीकरण में सामेल प्रमुख तीन नेताओं की कमजोरी है।’ लेकिन वरि ष्ठ राजनीतिज्ञ जयप्रकाशप्रसाद गुप्ता का मानना है कि सम्पर्ूण्ा मधेशवादी पार्टर्ीीक हो और वहां एक ही मधेशवादी पार्टर्ीीो, यह व्यावहारिक सोच नहीं है। गुप्ता कहते हैं कि मुद्दों और विचारों के आधार पर मधेश में कई पार्टर्ीीो सकती है। पार्टर्ीीकीकरण प्रक्रिया में नेतालोग बहुत मेहनत कर रहे हैं, इस बात को कोई भी अस्वीकार नहीं करेगा। तीनों पार्टर्ीीें आवद्ध सभी सदस्य को खुश करके एकीकरण कर ना, बहुत ही चुनौतिपर्ूण्ा कार्य है। एकीकरण में सम्मिलित बहुत से केन्द्रीय पदाधिकार ी एकीकरण प्रक्रिया के प्रति असन्तुष्ट हैं। असन्तुष्टि व्यक्त करने वाले विशेषतः दूसरी पीढÞी के नेता हैं। उनमें से कुछ ने तो यह कहा है कि एकीकरण प्रक्रिया के बारे में उनको कुछ भी पता नहीं है। ऐसी अवस्था में कुछ शर्ीष्ा नेताओं के बीच तो एकीकरण हो सकता है,

लेकिन असन्तुष्ट नेता लोगों के द्वार ा भविष्य में नयी पार्टर्ीीनाने की सम्भावना भी अधिक है। एकीकरण में सम्मिलित पुरानी पार्टियां जीवित ही रहने का दावा करने वाले भी हो सकते हैं। इसका संकेत तमलोपा के उपाध्यक्ष हृदयेश त्रिपाठी ने सरकार में पार्टर्ीीो सामिल नहीं होने की सल्लाह देकर अपना विरोध दर्ज करा दिया है। वैसे तो त्रिपाठी ने एकीकरण का प्रत्यक्ष विरोध नहीं किया है। लेकिन उन्होंने उक्त विरोध करके अघोषित चुनाव हारने के कारण एकीकरण नहीं हो रहा है। मधेश के मुद्दों को और भी सशक्त बनाने के लिए ही हम लोग इकठ्ठे हो रहे हैं। मधेशी जनता, मधेश में एक ऐसी मजबूत पार्टर्ीीो ढंूढÞ रही है, जो मधेश और काठमांडू के बीच सम्बन्ध को जीवन्त और सशक्त बनाए रखे। लेकिन एकीकरण होने से ही कोई भी पार्टर्ीीजबूत नहीं हो सकती। ज्ञद्द हिमालिनी l फरवरी/२०१४ स्वयं को बदलने का अवसर सदा मिलता है, कहीं ऐसा तो नहीं कि समय आपको बदल रहा हो – रुप से अपनी असन्तुष्टि जाहिर कर दिया है। जोडÞ-तोड की राजनीति में त्रिपाठी को महारथ हासिल है। ऐसे विरोध की आग अन्य पार्टियों के अन्दर भी सुलग रही है। इस तरह की सम्भावना को स्वीकारते हुए राजनीतिज्ञ जयप्रकाशप्रसाद गप्ु ता कहत े ह-ंै ‘ यदि एकीकरण की मोडालिटी सही ढंग से नहीं आई तो एकीकृत पार्टर्ीीी कुछ समय के बाद पुनः बिखर सकती है, इस बात से अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।’

लेकिन सद्भावना पार्टर्ीीे सह-अध्यक्ष लक्ष्मणलाल कर्ण्र्ााताते ह-ंै ‘हम लागे ा ंे की एकीकरण माडे ालिटी की प्रक्रिया इतनी कमजोर नहीं है, जो पार्टर्ीीो एकीकतृ रखन े म ंे असफल हा।े उनका मानना ह ै कि पार्टर्ी म ंे असन्तष्ु ट सभी का े इकठ्ठा करक े ही एकीकरण प्रक्रिया पूरी की जाएगी। एकीकरण प्रि क्रया जारी रहत े समय तीना ंे पार्टर्ीीे नेता बीच पार्टर्ीीकीकरण के बाद के िन्दय्र कायर् समिति म ंे रहन े वाला ंे की सख्ं या को लेकर भी विवाद हुआ था। विवाद समाधान क े लिए तीना ंे पार्टर्ी म ंे स े पाचँ -पाचँ सदस्य का े लेकर १५ सदस्यीय एक कार्य समिति बनाई गर्इ। शरुु म ंे फारे म नपे ाल न े ७५, तमलापे ा ने १५० और सद्भावना ने २८२ सदस्यीय केन्द्रीय कार्य समिति बनाने का प्रस्ताव किया था। उपेन्द्र यादव और महन्थ ठाकुर कम से कम संख्या की कार्य समिति बनाना चाहते थे। लेकिन सद्भावना अध्यक्ष राजेन्द्र महतो अपनी पार्टर्ीीे सभी सदस्य समेट कर कार्य समिति बनान े क े पक्ष म ंे अड Þे रह।े जिसक े चलत े ३५१ सदस्यीय जम्बो कार्य समिति बनाने का प्रार म्भिक निर्ण्र्ााहुआ। इतनी बडÞी कार्य समिति किस लिए – फोरम नेपाल के सभासद डा. शिवजी यादव कहत े ह-ंै ‘बाहर मीडियÞ ा म ंे जिस तरह का विवाद आया है, अन्दर उस तरह के विवाद और सहमति कुछ भी नहीं हुआ है।’ यादव का कहना है कि एकीकरण प्रक्रिया को सहज बनाने हेतु विविध दृष्टिकोण से बहस चल रही है। संविधानसभा निर्वाचन के द्वारा तमलोपा ने ११, फोरम नेपाल ने १० और सद्भावना ने ६ सिट प्राप्त किया है। जिससे तीनों पार्टर्ीीकीकरण होने के बाद २७ सिटों के साथ संविधानसभा में चौथी शक्ति कें रूप में आगे आ सकती है। और मधेश राजनीति में पहली शक्ति के रूप में स्थापित होने की अपेक्षा इन पार्टियों की है। इस तहर पहली और चौथी शक्ति होने से क्या संविधानसभा में चमत्कारिक भूमिका का निर्वाह हो सकता है – संघीय सद्भावना के अध्यक्ष झा का मानना है कि चमत्कारिक कार्य तो नहीं होगा, लेकिन राष्ट्रिय राजनीति को सही दिशा देने के लिए एकीकृत पार्टर्ीीहल कर सकती है। इधर र ाजनीतिज्ञ जयप्रकाशप्रसाद गुप्ता एकीकृत पार्टर्ीीे द्वारा महत्वपर्ूण्ा काम होने में आशंका व्यक्त करते हैं। एकीकरण में सरिक पार्टर्ीीे नेताओं का मनना है कि संविधानसभा में तर्राई-मधेश का जो मुख्य-मुख्य एजेण्डा है, उस को सशक्त रूप में उठाने के लिए ही पार्टियों का एकीकरण किया जा रहा है। सद्भावना के सह-अध्यक्ष कर्ण्र्ााी यही बताते हैं। लेकिन पत्रकार के दृष्टिकोण से रामरिझन यादव इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं।

यादव कहते हैं- ‘मधेश के मुद्दों को लेकर जीवित पार्टर्ीीक्षेत्रीयतावादी मुद्दा कमजोर होने के बाद अस् ितत्व रक्षा के लिए एकीकरण कर रहे है।’ यादव के दृष्टिकोण में यह एकीकरण दर्ीघकालीन नहीं हो सकता। वे कहते हैं- ‘तीनों नेताओं के इतिहास का अध्ययन करें तो उन लोगों की एकता दर्ीघकालीन होने का आधार नहीं दिखाई देता।’ सभी को पता है कि एकीकरण में सरिक तीनों नेता पृथक-पृथक पृष्ठभूमि से आए हंै। राजेन्द्र महतो नेतृत्व की सद्भावना वर्षों से तर्राई केन्द्रित दल के रूप में स्थापित है तो महन्थ ठाकुर की पृष्ठभूमि नेपाली कांग्रेस से जुडÞी हर्ुइ है, इसी तरह उपेन्द्र यादव की भी पृष्ठभूमि माओवादी से जुडÞी हर्ुइ। ऐसी अलग- अलग पृष्ठभूमि के तीन नेताओं के बीच हो रहे मेलमिलाप रोमाञ्चक और विचित्र मानते हुए गुप्ता कहते हैं- ‘अलग पृष्ठभूमि और विचार से चलने वाले नेता लोग एक जगह आने से लोगों को अनूठा और अस्वाभाविक लगता है।’ गुप्ता कहते है कि अगर मुद्दों और विचारों से ये लोग समान होते तो एकीकरण होने मंे आपत्ति नहीं थी। कम्युनिष्ट पृष्ठभूमि होते हुए भी यादव ०६३-०६४ के मधेश आन्दोलन से स्थापित मधशे वादी नते ा ह।ंै वह इसस े पहल े सत्ता क े नजदीक नहीं थे। लेकिन ठाकुर और महतो वषार् ंे स े सत्ता क े करीब थ।े सत्ता क े करीब रहन े वाल े दाने ा ंे नते ाआ ंे की पष्ृ ठभू िम भी अलग ह।ै तीन पार्टर्ीीी जो एकीकरण- प्रक्रिया चल रही है, उस में कोई आर्श्चर्य नहीं है। इस एकीकरण द्वारा मधेशी जनता की भावना को सम्बोधन किया जा सकेगा। अलग-अलग पृष्ठभूमि और विचार के तीन नेताओं के बीच हो रहे मेलमिलाप रोमाञ्चक और विचित्र है। लोगों को अनूठा और अस्वाभाविक लगता है।

यदि आपके मार्ग में कोई विघ्न आये तो घबराना छोडÞ इसे दूर करने का प्रयास करते रहिए। महतो सद्भावना पार्टर्ीीे मधेशवादी नेता के रूप म ंे जान े जात े ह ंै ता े ठाकरु नपे ाली कागं से्र क े पज्र ातान्त्रिक धार क े रूप म।ंे उस समय ठाकरु , कागं से्र क े तत्कालीन सभापति काइे र ाला परिवार के विश्वासपात्र भी माने जाते थे। एसे ी पष्ृ ठभू िम आरै विचार क े नते ाआ ंे क े बीच एकता होने के सर्न्दर्भ को आर्श्चर्य ही मानते ह-ंै रामरिझन यादव। देश के संघीय स्वरूप के सवाल में यह तीनों नेता कुछ निकट माने जाते हैं। लेकिन शासकीय स्वरूप के विषय में उन लोगों के बीच विचारों की एकता नहीं दिखाई देती। इस तरह के विचार की भिन्नता और एकीकृत पार्टर्ीीे नेतृत्व को लेकर विवाद होने के कारण निर्वाचन से पर्ूव प्रचारित एकीकरण प्रयास असफल हुआ था। एक समय तो ऐसा भी था कि ये तीनों नेता एक-दूसरे का नाम भी नहीं सुनना चाहते थे। महन्थ ठाकुर अपने आप को मधेश का र्सवमान्य मसीहा मानते थे। राजेन्द्र महतो ने महन्थ ठाकुर को ‘मधेश का गद्दार’ तक कह कर र्सार्वजनिक भाषण किया था। उधर उपेन्द्र यादव, राजेन्द्र महतो को ‘लोकसेवा उत्तर्ीण्ा सदाबहार मन्त्री’ मानते थे। उनकी सोच यह भी थी कि महतो और ठाकुर भारत से निर्देशित व्यक्ति हैं, नेपाल के असली मधेशवादी नेता नहीं हैं। खैर, र ाजनीति में इस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं। भारत के साथ उपेन्द्र यादव के सम्बन्ध में उतार-चढÞाव आता रहा है। लेकिन यादव भारत के साथ सम्बन्ध मजबूत बनाना चाहते हैं, ऐसी बात भी सुनने में आई। और इस में यादव कुछ हद तक सफल भी हो चुके हैं। यादव की पार्टर्ीीmोरम नेपाल, मधेश आन्दोलन से स्थापित और तर्राई-मधेश में अच्छी खासी जनाधार वाली पार्टर्ीीानी जाती है। कहा जाता है कि ऐसी अवस्था में भारत भी यादव सहित मधेश में एक मजबूत पार्टर्ीीो आगे लाना चाहता है। एकीकरण प्रक्रिया में अभी भी कुछ विवाद बांकी है। मुख्यतः एकीकृत पार्टर्ीीे नेतृत्व किसको दिया जाए, इस में तीनों पार्टर्ीीे नेताओं के बीच मतैक्य नहीं है। जिस के कारण पार्टर्ीीकीकरण के लिए बनाए गए १५ सदस्यीय कार्य दल ने नेतृत्व के लिए विभिन्न प्रस्ताव पेश किया है। उस में एक है- चक्रीय प्रणाली। जहाँ तीन पार्टर्ीीे अध्यक्ष द्वारा क्रमशः ६-६ अथवा ४-४ महीने का नेतृत्व होगा। दूसरा प्रस्ताव है- एक सभापति तथा र्सवमान्य अध्यक्ष और दो कार्यकारी अध्यक्ष। इस में र्सवमान्य अध्यक्ष पार्टर्ीीे हर बैठक की अध्यक्षता करेंगे और दोनों अध्यक्ष की सहमति में निर्ण्र्ााकरेंगे। उसी प्रस्ताव में कहा गया है कि एक अध्यक्ष पार्टर्ीींगठन का नेतृत्व करेंगे और दूसरा संसद् -संसदीय दल) का। इस तरह की चक्रीय व्यवस्था तथा शक्ति विभाजन के कारण पार्टर्ीीे भीतर थप विवाद भी सृजित हो सकता है। लेकिन फोरम नेपाल के सभासद् डा. शिवजी यादव इस बात को अस्वीकार करते हुए कहते हैं- ‘एकीकरण मोडालिटी के बारे में हर दृष्टिकोण से बहस हो रही है। मैं कार्य दल में नहीं होने के कारण वहां पिछली बार क्या हुआ, मुझे पता नहीं है। लेकिन मैं इतना कह सकता हूं कि सभी कोर् र्सवस्वीकार्य होने से ही एकीकरण की प्रक्रिया को असली जामा पहनाया जाएगा।’ पहल े स े ही पार्टर्ी नते त्ृ व म ंे महन्थ ठाकरु की चचार् करन े वाल े कछु ज्यादा ही ह।ंै ले िकन उन को ही सभी अधिकार देकर नेतृत्व स्वीकार न े क े लिए अन्य दा े नते ा राजी नही ं ह।ंै स्मरणीय बात ह-ै तीना ंे पार्टर्ी क े शीषर् नते ा महन्थ ठाकरु ,

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