मधेशवादी दलों को खुशफहमी से निकलना होगा : श्वेतादीप्ति

घायल मधेश ने एमाले अध्यक्ष ओली को आइना तो दिखा ही दिया

मधेशवादी दलों को भी आत्ममंथन की आवश्यकता है

श्वेता दीप्ति, काठमांडू | चुनावी बयार थम चुकी है और कश्ती भी किनारे लगने की तैयारी में है । फिलहाल हर पार्टी के लिए वक्त आत्मविश्लेषण का है यह सोचने का है कि कहाँ चूक हुई और कहाँ सुधार की आवश्यकता है । सबसे अहम बात तो यह कि दो नम्बर प्रदेश ने यह जता दिया कि जो उनके अस्तित्व पर सवाल करेगा वो उसका नहीं है । हाँ कहीं कहीं जो जगह मिली उसके पीछे कई कारण हो सकते हैं । वैसे अपनी स्थिति पर एमाले अध्यक्ष यह कह कर संतुष्ट हैं कि स्थिति बदतर नहीं है उनकी और आगे की लड़ाई में वो बहुमत के साथ सत्ता सम्भालने वाले हैं । यानि अब भी सुर नहीं बदले हैं उनके और अगर यही सुर रहे तो तानपुरा के तार टूटने में ज्यादा वक्त लगने वाला नहीं है क्योंकि या तो पार्टी के भीतर ही उनके खिलाफ मोर्चाबन्दी शुरु हो जाएगी या फिर मुँह की खाने के लिए भी उन्हें तैयार रहना होगा । राष्ट्रवाद के जहर बुझे तीर से घायल मधेश ने कमोवेश आइना तो दिखा ही दिया है । पूरा परिणाम भले ही ना आया हो परन्तु तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है ।

काँग्रेस और माओवादी केन्द्र की स्थिति को देखते हुए फिलहाल मधेशवादी दलों को भी आत्ममंथन की आवश्यकता है । जो परिणाम सामने है उसे देखते हुए मधेशवादी दलों को भी खुशफहमी से निकलना होगा क्योंकि पूरी तरह खुश होने की स्थिति अब भी नहीं है । कई मोर्चे पर गलती उनसे हुई है । ससफो और राजपा के विभाजन ने कमजोर किया और यही वजह है कि तीसरे पक्ष को आगे निकलने का अवसर मिल गया । अन्तर्घात ने भी मधेशवादी दलों को कमजोर किया वहीं टिकट के बँटवारे में लिए गए गलत निर्णय ने उनसे कई स्थानों को छीन लिया । पैसों के खेल ने जहाँ एक ओर किसी को मजबूत किया तो वहीं दूसरी ओर किसी के हाथ से कमान फिसल गई । आगे आने वाले समय के लिए उन्हें मिलकर तैयारी करनी होगी और क्षेत्र पकड़ना होगा नहीं तो मोहरे भी बदल जाते है. और चाल भी नाकाम हो जाती है । मधेश की सबसे बड़ी कमजोरी अशिक्षा, चेतना की कमी और गरीबी है जहाँ लोग यह नहीं समझ पाते कि उनके एक वोट का महत्तव क्या है ? और यही दुखद स्थिति उनके बिकने का कारण बन जाती है । जिसका गलत फायदा सभी लेते हैं और कभी यह सही के हक में जाता है तो कभी गलत के हक में । मधेशवादी दलों को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी और सभी को एक साथ मिलकर चलना होगा उन्हें दरकिनार करते हुए जो अवसरवादी सिद्ध हुए हैं । अपने उन युवा कार्यकर्ताओं को साथ लेना होगा जिनके साथ मास है वरना अगली बाजी हाथ से निकलने में वक्त नहीं लगेगा ।

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