मधेशविहीन संविधानसभा नई सत्ता के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति , काठमांडू,२० नोभेम्बर |

यह राजनीति है, जहाँ सिर्फ कुर्सी, पद और शक्ति पर नजरें होती हैं और सारा खेल इसी से जुड़ा होता है । एक पल में लोग गाली देते हैं और दूसरे ही पल गले मिल जाते हैं और देखते ही देखते समीकरण बदल जाता है ।

masal rally

सात आठ सालों के बाद नेपाल की राजनीति ने एक बार फिर नई करवट ली है, जिसमें देश के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र की कोई उपस्थिति नहीं है । नेपाल के परिदृश्य को बदलने में मधेश और मधेश की जनता का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है । किन्तु विडम्बना यह है कि जिस उम्मीद और विश्वास को लेकर मधेश की जनता ने विगत के आन्दोलनों में अपना साथ दिया, जान गँवाई, आज वही उम्मीद और विश्वास को देश की सक्रिय राजनीति ने अनदेखा किया हुआ है । मधेशविहीन संविधानसभा ही इस नई सत्ता के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है । वैसे यह दीगर बात है कि आज तक इस अग्निपरीक्षा से मधेश और वहाँ की जनता गुजर रही थी किन्तु, अब यह परीक्षा एमाले की सरकार को देनी होगी । ओली सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर एक भी ऐसा चेहरा नहीं दिख रहा जिसकी दूरदर्शिता या नीति पर नेपाल के उज्ज्वल भविष्य को देखा जा सके या एक नए नेपाल की अवधारणा की कल्पना की जा सके । कम से कम सरकार गठन होने के बाद जो परिस्थितियाँ देश के सामने हैं और देश जिस दशा से गुजर रहा है, उसमें सत्तापक्ष का एक भी कदम ऐसा नहीं दिख रहा जिसे कूटनीतिक दृष्टिकोण से, वैदेशिक नीति की दृष्टिकोण से या राजनीति की दृष्टिकोण से उचित ठहराया जा सके । भाषा और व्यवहार आज भी अमर्यादित और अदूरदर्शी ही है । न तो संयम है और न ही शालीनता । सत्तारुढ़ नेता और देश की आधी जनता देश के एक भूभाग के लिए सिर्फ और सिर्फ अपने असंयम को ही प्रदर्शित कर रही है ।
तकरीबन १०० दिनों से जारी आन्दोलन के सन्दर्भ में १ नवम्बर को मोर्चा और सरकार के बीच हुई वार्ता कुछ गम्भीर दिखी थी । लगा कि कुछ निष्कर्ष सामने आनेवाला है । आन्दोलनरत मधेशी मोर्चा ने भी सकारात्मकता दिखाई थी । किन्तु कुछ ही घन्टों में सरकार के द्वारा उठाए गए कदम ने सभी आशाओं पर पानी फेर दिया । रात के सन्नाटे में पुलिस बल का प्रयोग कर के जिस तरह आन्दोलनकारी और उनके टेन्टों पर कार्यवाही की गई, उसने एक बार फिर स्थिति को नियंत्रण से बाहर कर दिया है । जनता आक्रोशित है और शांतिपूर्ण आन्दोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया है । मधेश की लाखों की संख्या में उतरी जनता को बार–बार भारतीय कहकर उनकी भावनाओं को बार–बार भड़काया जा रहा है । मधेश आन्दोलन का असर सिर्फ मधेश में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश में नजर आने लगा है । देश की राजधानी बदहाल है । दुकानों में राशन की कमी, दवाओं की कमी, इन्धन की कमी अब स्पष्ट तौर पर दिखाई देने लगी है किन्तु बधाई के पात्र हैं यहाँ की जनता और सत्ता दोनों ही । सत्ता को जनता की परवाह नहीं है और जनता में धैर्य की कमी नहीं है । इसलिए मंथर ही सही किन्तु देश अपनी गति में साँसे ले रहा है |

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