मधेशियों का स्वाभिमान को किसने चुराया ? – कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी,११ नवम्बर
कुछ दिनों से लगातार कुछ पहाडी जिलों में काम कर रहे शिक्षक तथा कर्मचारियों के कष्ट सुनने को मिल रहे हैं कि वहाँ के नेपाली समाज मधेशियों को प्रताडित करने लगे हैं । वे मधेशियों को परेशान कर रहे हैं । उन्हें भैया, धोती, इण्डियन आदि शब्दों से सम्बोधन किया जा रहा है । वे अपने समाज के लोगों से खुलकर चर्चा करने लगे हैं, “अब यी धोतीहरुको के काम ? यिनीहरुलाई धपाउनु पर्छ ।” और कुछ मधेशी लोग नौकरी छोडकर मधेश में ही जीवन यापन के साथ स्वतन्त्र मधेश अभियान को साथ देने की तैयारी भी कर रहे हैं ।

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तो दुसरे तरफ
हम मधेशी अपने को विभेदरहित और मानवता प्रेमी दिखाने की कोशिश इस तरह कर रहे हैं जैसे हम राजा हश्चिन्द्र के अवतार हैं । हम जितने मानवतावाद के ठेकेदार और विभेद विरोधी हैं, वास्तव में उससे कई गुणा ज्यादा हम दिखावा कर रहे हैं कि पहाडी मधेशी कुछ नहीं, हम सब भाई–भाई हैं । हम सब नेपाली हैं । हम उन बहकी बहकी बातें करने बाले सज्जनों से आग्रह करना चाहते हैं कि वे अपने छातीयों पर हाथ रखकर इमानदारी से बोलें कि जो वह “हम सब नेपाली हैं, पहाडी मधेशी कुछ नहीं” कहते हैं, क्या वह उनकी अन्दर की आवाज है ? उनके आत्मा की स्वीकृति है या फिर वे चम्चागिरी दिखाते हैं ?– कि वे नेपालियों के विरोधी नहीं हंै ता कि उनके कामों को नेपाली लोग सहज बना दें ? और वही दलाल प्रवृति के लोग फिर यह भी चाहते हैं कि मधेश आन्दोलन होता रहे, मधेशी शहादत देते रहें और वह नेपालियों के सामने आन्दोलन का विरोध करते रहें और वे अपने चम्चागिरी, मधेश आन्दोलन और नेपालियों के क्षणिक बाध्यताओं के फायदे उठाते रहें । वे अन्दर से चाहते हैं कि मधेश आन्दोलन मधेशी, दलित, आदिवासी, जनजाति, महिला तथा अल्पसंख्यकों के आरक्षण एवं समानुपातिक समावेशी मुद्दों को उठाते रहें और राज्य के करीब रह कर मधेशी लगायत के आरक्षण कोटों का वे लाभ उठाते रहें । आजतक जितने भी आरक्षण या समावेशी प्रकिया का लाभ लिया गया है, वे सब मधेश आन्दोलनों को विरोधियोेंं ने उठाया है । वे नेपाली बनकर राज्य से हिस्सा नहीं ले पाते मगर मधेशियों के आन्दोलन, त्याग और शहादत पर वे उनके कोटे में अवसरों के लाभ उठाते रहे हैं ।
पहाडियों की चम्चागिरी करने बाले मधेशी चिन्तन पर डा.सि.के राउत का वैज्ञानिक विश्लेषण पर जरा गौर करें ः–

Dr. CK Raut

जो अधिकारकर्मी  नेता ये कहते आए हैं कि सभी नेपाली (पहाडी) खराब तो नहीं है ? सभी नेपाली मधेशियों का शोषण तो नहीं करते, गुलामी तो नहीं लादते ? बहुत नेपाली भी तो पीडित हैं ? इसलिए हमें नेपालियों के साथ सहकार्य करके मधेश में रहना है १?
मान लें कि आपके घर में १०,००० सर्प घुसने के लिए दौडे आ रहे हैं, उसमें से मान लें १०० सर्प विषाक्त नहीं है बल्कि प्यारे हैं, तो क्या आप अपना दरवाजा खुला रखेंगे या अपनी और अपने बालबच्चों की सुरक्षा के लिए बंद करेंगे र?
फिरंगियों से मधेश को बचाओ, अपना अस्तित्व बचाओ । नेपाली उपनिवेश अंत हो, मधेश देश स्वतंत्र हो।


Watch Muhammad Ali’s Perfect Response To ‘Not All White People Are Racist’ — In 1971

“There are many white people who mean right and in their hearts wanna do right. If 10,000 snakes were coming down that aisle now, and I had a door that I could shut, and in that 10,000, 1,000 meant right, 1,000 rattlesnakes didn’t want to bite me, I knew they were good… Should I let all these rattlesnakes come down, hoping that that thousand get together and form a shield? Or should I just close the door and stay safe?”

 

Dr. CK Raut
चोरी करना महापाप कहके १०,००० वर्ष से पढाते(पढाते जब चोरी बंद नहीं हुई, तो ये क्यों सोचते हो कि नेपालियों में चेतना और सद्भाव फैला देने से, शिक्षा दे देने से, मधेशियों के विरुद्ध विभेद रुक जाएगा और मधेश को अधिकार मिल जाएगा रु उसके लिए व्यवहारिक इन्जिनियरिंग समाधान ही चाहिए (( और वह है स्वतंत्र मधेश, अलग देश। ९सैद्धान्तिक आदर्शवादी खक।व्यवहारिक इन्जिनियरिंग समाधान ( १०
पिछले कम(से(कम १०,००० वर्षों से घर(घर में यह पढाया गया, ईश्वर की दुहाई दी गई, स्वर्ग का लोभ दिखाया गया, नर्क का डर दिखाया गया, एक(से(एक धर्म बनाया गया, सैकडौं(हजारों धर्मगुरुओं ने शिक्षा, उपदेश और आदेश दिया कि चोरी करना महापाप है, ये।।वो।।, फिर भी क्या आज चोरी बंद हो गई रु यह हुआ सैद्धान्तिक आदर्शवादी राह (( कि चेतना फैलाने से विभेद मिट जाएगा, लोग चोरी नहीं करेंगे १ पर यह कभी सफल हुआ रु क्या आज चोरी नहीं होती है रु ९शहरों में कितने नीजि घर बिना ताले के हैं रु ताला खोलकर रखके तो देखो १ ०
तो यह हालत है सैद्धान्तिक आदर्शवादी मार्ग का। वह वास्तविक जीवन में काम नहीं करता है, चोरी को रोक नहीं पाता है। तो चोरी से बचने के लिए हम क्या करते हैं रु ताला लगाते है १ हाँ, जो १०,००० वर्ष का बडा(बडा प्रवचन, धर्मशास्त्र, नैतिक शास्त्र रोक नहीं सका, वह १०० रुपये का ताला रोककर दिखाता है १ इसीको कहते हैं व्यवहारिक इन्जिनियरिंग समाधान, और यही समाधान हरेक जगह सफल भी रहा है, लागू भी हो रहा है।
ठीक वही बात हैं (( चाहे जितना भी धर्मशास्त्र पढा दो, मधेशियों के साथ विभेद और भेदभाव नहीं करना चाहिए, मधेशियों को भी समान अधिकार देना चाहिए, नेपाली(मधेशी भाई(भाई कहके सद्भाव और भाइचारा रखना चाहिए, मधेशियों पर शोषण और दमन नहीं करना चाहिए, पहाड और मधेश मिलकर देश बनाना चाहिए, मधेशियों को भैया, धोती, भेले नहीं कहना चाहिए, ूके मधेशी, के नेपाली, मानवता ठूलो होू ((( कहके चाहे जितने सय वर्ष लेक्चर दे दो, पाठ पढा दो, दर्शन छाँट लो, पत्रपत्रिका में हजारों लेख छपालो, आप खुद को एकता और सद्भाव के मसीहा बनकर ही जितना ही अवार्ड ले लो, पर वास्तविक जीवन में वह कोई समाधान नहीं दे सकता है, कभी नहीं दिया है। वह सैद्धान्तिक आदर्शवादी बातें भूलभूलैया है। सही ूव्यवहारिक इन्जिनियरिंगू समाधान है((अपना अपना अलग देश बनाकर रहो। बिल्कुल सम्भव। बिल्कुल प्रभावकारी। तुरन्त परिणाम देनेवाला। जीओ और जीने दो ।
हमारे पूर्खों द्वारा प्रदत्त हमारी शान, मान और स्वाभिमान को हमने क्यूँ नहीं बचा पाया ? गिने चुने साहसी मधेशियों के अतिरित बहुसंख्यक हम मधेशियों ने हमारे उन ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने में असफल क्यूँ रहें ? हमने दुसरों पर आरोप लगाने के जितने तरीके खोजे हैं, क्या उससे भी कम उन कारणों को हमने खोजा है कि हमारा भाषा, कला, संस्कृति, रहनसहन, रीतिरिवाज, शिक्षा, रोजगार, व्यापार एवं सामाजिक, धार्मिक और अध्यात्मिक आधार स्तम्भें क्यूँ और कैसे धरमराया ? क्या हमने यह जान पाया कि हमारी जमीनों को किसने कैसे चुराया ?, हमारे प्राकृतिक साधन और श्रोतों का दोहन किसने और कैसे की ?, हमारे बुजुर्गों को किसने सताया ?, हमारे यूवाओं को किसने बहकाया ?, हमारे अवसरों को किसने पचाया ? और हमारे स्वाभिमानों को किसने ललकारा ?
यूँ कहें तो हमारा रेडिमेड जबाव यही होगा कि नेपालियों ने, पहाडियों ने और गोर्खालियों ने । इन जबावों को अगर शत् प्रतिशत सही मान लिया जाय तो हमें ई.पू.३२६ के यूनानी योद्धा सम्राट सिकन्दर और तक्षशिला के पास रहे झेलम के राजा पोरस (पुरु) के बीच हुए घमासान युद्ध में झेलम को हुए क्षति और पराजय के बाद अपने कब्जे में आए राजा पोरस से सिकन्दर द्वारा यह पूछे जाने पर “तुम अपने साथ कैसा व्यवहार चाहते हो ?,” के जबाव मेें उसी राजसी शान और स्वाभिमान के साथ आँखों में आखें डालकर पोरस ने कहा, “एक राजा के समान ।” पोरस के साहस को सम्मान करते हुए सिकन्दर ने उनके झेलम के साथ साथ रावी, आभार और चनाब सहित कई अन्य जिती हुई राज्य भी पोरस को लौटा दिया ।
पोरस के अपने राज्य और सेना को हार जाने के बाद भी अपने स्वाभिमान और सम्मान को जीवित रखने के साहस के कारण ही सिकन्दर जैसे महान् योद्धा को भी उनके साहस और स्वाभिमान के सामने नतमष्तक होना पडा । और दुनियाँ के लिए सारे वेद, पुराण, उपनिषद्, गीता, रामायण, महभारत जैसे सामाजिक, राजनीतिक, अध्यात्मिक, शैक्षिक एवं वैज्ञानिक ग्रन्थों को तैयार करने बाले मधेशी पूर्खों के सन्तान हम आज भगौडे, लुटेरे तथा निकृष्ट लोगों के भिखों पर आश्रित होने को ही अपना शतिm और सौभाग्य मानने लगे हैं ।
किसी समाज का दुदर्शा तब निश्चित हो जाती है जब उस समाज की भाषा, कला, संस्कृति, साहित्य और दर्शन का तिरष्कार होता है । उसके इतिहासों को मिटा दिया जाता है । उसके भूमियों को अपहरण कर ली जाती है । उसके अस्तित्व के साथ उसके आत्म–सम्मान और स्वाभिमानों को चुरा ली जाती है । और उस समाज का सबसे बडा दुर्भागय तब और बढ जाता है जब उस समाज के यूवा वर्ग अत्याचारों को सहते हुए अत्याचारियों को अपने उपर हावी होने का दरबाजा खुला छोड समाज के बूढे स्तरहीन गिदरों से अपने यौवनापन का सौदाबाजी करने लगते हैं । हम कह सकते हैं कि हमने हमारे स्वाभिमान को खुद ने चुराकर शासन के दुकानों पर इस कदर बेच डाली है जैसे किसी घर के बिगडे हुए शराबी और शबाबी अपने परिवार बालों से कभी चुरा कर तो कभी हल्ला बबाल करके घरके चल अचल सम्पतियों को शराब की भट्ठी और वेश्यालयों में बेच डालते हैं ।
स्वाभाविक रुप से उस समाज का हरेक चीज नष्ट हो जाता है जो शासन से बाहर होता है । कुछ दशक पहलेतक मधेश के पास रहे अपार खेतबारी, अनाज, कला और संस्कृतियों को बेच÷दिखाकर जीवन यापन करने बाले हम आज अपनी नीति, राजनीति, इमान और धर्म बेचने को विवश हो गए हैं । कुछ दशक पहलेतक श्रम को खरीदने बाले हम आज अपना श्रम बेचने के लिए भी पहँुच की तलाश करने लगे हैं ।
दुर्भाग्य है कि बारम्बार और कई बार सत्ता में जाकर भी शासन को न तो हम समझ पायें, न उसे प्राप्त कर पायें । हम सत्ता और उसके इर्दगिर्द के पैखाने को ही अपनी मंजिल मानते रहें । शासन जिस समाज के हाथों में होता है, वह सत्ता निर्माण करता है और बर्बाद भी । बाँकी के समाज उसके कठपुतली या फिर चम्चे और सिपाही होते हैं ।
यही कारण है कि राम कार्की एक भारतीय नागरिक होकर भी सार्वभौम नेपाल के मन्त्री बन जाते हैं । भारतीय सैनिक जवान प्रशान्त तामाङ्ग हिन्दी गीत परीक्षा में भाग लेकर भी नेपाल का राष्ट्रिय सम्मान पाता है, जर्मन नागरिक होकर बाल बच्चा समेत को आकार देने बाली सुजाता कोईराला नेपाल के राजनीति और मन्त्रिमण्डल समेत में हावी हो जाती है और ब्र्रिटेन के नागरिक बन बैठे रामचन्द पौडेल सूपुत्र चिन्तन पौडेल नेपाल में राजनीतिक÷संवैधानिक नियुतिm पा जाता हैं । मगर मनु, जनक, विराट, सहलेश, बुद्ध, दङ्गी शरण थारु तथा शहादत अलि खान के सन्तानों को विदेशी कहकर नागरिकता तक के अधिकारों से वञ्चित कर दी जाती है ।
और, मधेशियों को अगर सर्वकालिन अस्तित्व, सार्वभौम राष्ट्र, सम्मानित जीवन, सुरक्षित भविष्य, सम्पूर्ण अवसर तथा निष्कलंकित स्वाभिमान चाहिए तो अविभाज्य दृष्टिकोण के साथ स्वतन्त्र मधेश देश की पूनस्र्थापना सहित का शासन निर्माण ही अन्तिम और एक मात्र मार्ग है, बाँकी सारा व्यर्थ है ।

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