मधेशियों की नागरिकता पर फिर से उठा सवाल, मधेशी खोजो अब क्या है जबाव ? कैलाश महतो

कैलाश महतो, पराशी, दिसम्बर ५ ,२०१५ |

अंग्रेजो को भारत वर्ष के लोग फिरङ्गी नाम से जानते थे । हम मधेशी लोग भी नेपाली शासकों को फिरङ्गी कहने लगे हैं । क्या है ये फिरङ्गी ? इसका शाब्दिक अर्थ क्या है ? क्या होता है इसका पहिचान ?

कुछ शब्दकोष को ही मानें तो घुमफिर कर जीवन यापन करने बाले लोग या जाति को फिरङ्गी कहा जाता है । फिरङ्गी का चरित्र को देखा जाय तो उनका न कोई निश्चित जात, न कोई तोका हुआ धर्म, न अपना कहे जाने बाली भाषा, न अपनी संस्कृति , न अपना परम्परा आदि होते हैं । उसका लगभग हर चीज उधार का होता है । उसका अगर कुछ अपना होता है तो वह सिर्फ और सिर्फ उसकी युक्ति होती है । घुमघुम कर जीवन निर्वाह करने की कौशल होती है । वो अपने को हर रंङ्ग में ढाल लेता है, वे हर समाज को अपना मान लेता है, हर धर्म को अपना लेता है, हर संस्कृति को पचा लेता है और हर परम्परा को स्वीकार लेता है । यूँ कहे तो वह एक बन्जारण समूह के ही उप–शाखा है । बस्, वह घुमघुम कर अपना तथा अपने परिवार का दैनिकी चलाता है ।

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घुमफिर के जीवन वसर करने बाले समुदायों के इतिहासों को देखा जाय तो वे अपने पूर्व समाज से विभिन्न कारणों से विस्थापित या पलायन होने बाले समूह रहै हैं । विस्थापित या पलायन या कहें अवसर के तलाश या रोजीरोटी की प्रबन्ध करने हेतु भी एक से दुसरे जगह की पनाह लेने की मानव इतिहास है । मानव आचरण को अध्ययन करें तो यह पता चलता है कि कोई भी व्यक्ति, परिवार या समुदाय के लोग घर परिवारों के साथ घुमते फिरते कष्टपूर्ण जीवन व्यतित करने को तैयार नहीं होता ठीक वैसे ही जैसे एक ही स्थान पर जेल के तरह या घर समाज से बहिष्कार के जिन्दगी कोई नहीं जीना चाहता है । वह किसी एक निश्चित जगह पर स्थायी रुप से परिवार के साथ बैठते हुए संचालित समाज के साथ जीना चाहता है । यही आदमी का स्वाभाव और आकांक्षा है । लेकिन कुछ लोग या समुह भटकते हुए जीवन गुजारते हैं । ढेर सारे वास्तविकता यह है कि वे किसी न किसी मूक समाज से बहिष्कृत या खदेडा गया या किसी लोभ लालच के शिकार होते हैं । वे चाहे धार्मिक हो, अध्यात्मिक हो, भौतिक हो, सामाजिक हो, या राजनीतिक बहिष्करण हो ।

अवसर के तलाश, भूमिय, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा अन्य कारणों से ब्रिटीस, जर्मन जाति के लोग ७वीं शदी के इर्दगिर्द में रोम से पलायन होकर तथा स्यांक्सन्ज, ज्यूट्स तथा फिसियन्ज एंगलो स्याक्सन्ज तथा आयरिसों के साथ कालान्तर में डेन्ज और नोर्मन्ज लोगोंद्वारा विभिन्न स्थानों से आकर आङ्गलाल्याण्ड निर्माण किया गया, जो बाद में इंग्ल्याण्ड का नाम पाया । विभिन्न राजाओं के राज्यको मिलाकर ही युनाइटेड किंग्डम का नाम पाया । निश्चित ही आज के इंग्ल्याण्ड में जगह जगह से लोग अपने पूराने जगहों से अनेक कारणों से बहिष्कृत या पलायन या अवसर के तलाश में आये होंगे, मगर कालान्तर में सबने एक दुसरे का अस्तित्व को स्वीकारा और सब अंगे्रज हो गये । वहीं के अग्रेज लोग व्यापार के सिलसिले में सन १६०० में भारत आये और वहाँ के शासन सत्ता को कब्जा कर लिए और पूरे भारत में घुमफिर कर लोगों को लुटने, शोषण तथा दोहन करने, अत्याचार तथा व्यभिचार करने का काम शुरु हुआ । लेकिन वे भारत की भाषा, संस्कृति, परम्परा तथा पोशाकों पर कोई आक्रमण नहीं किये और न होने दिए ।

सातवीं शदी के दौरान अरब राष्ट्रों में धार्मिक एकिकरण का अभियान शुरु होते ही इरान और इराक में मष्टो धर्म मानने बाले बेबिलोन, मेसोपोटामिया तथा कश्पियन सागर के इर्दगिर्द रहने बाले खस समुह के लोग अपने मष्टो देवता के मूर्ति के साथ बहिष्कृत तथा पलायन होकर भारत वर्ष के भूमि में प्रवेश किये । बुद्ध धर्म को अंगीकार करते हुए ये लोग कालान्तर में हिन्दु धर्म को स्वीकार किये । वैसे ये खस लोगों का आगमन भारत वर्ष के आसाम, देहरादुन, कश्मिर, मेघालय, मेजोरम आदि जैसे स्थानों में हुई । यद्यपि सन् १३०३ में ही इनकी प्रवेश भारत वर्ष के भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग, जिसे आज नेपाल कहा जाता है, में भी हुई थी । लेकिन वही मुस्लिम, जिनके डर से ये इरान और इराक छोड भागे थे, की सन् १५२६ में भारत प्रवेश तथा शासनारम्भ से त्रसित होकर फिर से ये लोग भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग तथा वर्तमान नेपाल के ओर पहाडियों में शरण लेने पहुँच गये अपने कुल देवता मष्टो भगवान् के मूर्ति के साथ । उन मष्टो देवता की पूजा आज भी कर्णाली के सिंजा में बडे धुमधाम से मनाया जाता है ।

इन खस लोगों का कोई अपना ठोस न धर्म है, न भगवान् है, न देश है, न संस्कृति है, न भाषा है । ये जहाँ गये, वहीं के हो गये । जिस धर्म से इन्हें फायदे हुए, उसी को अपना लिए । जैसा पहिरण मिल गये, उसी को अपना पोशाक मान लिए । ये गोरखा पाए, गोरखाली हो गए । लम्जुङ्ग गए, लमजुङ्गे बन गए, नेपाल चले गए, नेपाली हो गये । आज मधेश आन्दोलन के भय से मधेश में सारा कर्म धर्म लेकर आए खस लोग मधेशी होने के लिए तैयार हैं, भले ही वे अन्दर से तेयार नहीं हैं ।

आज अपने ही भूमि के इतिहास पसिद्ध राजायें जनक, सहलेश, विराट, हरिसिंह देव, पृथ्वीपाल सिंह देव, सिमौनगढ राज्य, शुद्दोधन के राज्य, दंगीशरण के राज्य के वंश तथा प्रजाओं के सन्तानों के बास पर इन फिरङ्गियो की उंगली उठ रही है । मधेश के धरती पुत्र के पहिचान पर शंका की जा रही है । हमारे नागरिकताओं का छानविन करने की बात ये घुमक्कड, फिरङ्गी और अधर्मी तथा बेशर्मी के.पी तथा के.पी खेत के मूले लोग करने की बात कर रहे हैं ।

मधेशी के नागरिकता पर फिर से उठा सबाल, मधेशी खोजो अब क्या है जबाव ?

आजादी लाओ, स्वशासन पाओ । उठो स्वराज कायम करो, अपने आप को सम्मान करो ।“

 

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