मधेशियों की मांगें पूरी करने के बाद ही चुनाव करवाया जाए : सुभेन्द्रकुमार कनौजिया

सुभेन्द्रकुमार कनौजिया अप्सन नेपाल सिरहा शाखा के जिला अध्यक्ष हैं

(मुफस्सल की आवाज)
साल २०७२ में मधेश केन्द्रित पार्टियों की सहमति के बगैर संविधान जारी किया गया । जबकि यह संविधान मधेशी, थारु, जनजाति, दलित, मुसलिम, पिछड़ावर्ग आदि समुदायों की भावना के विपरीत है । इसलिए संविधान जारी होने के दूसरे दिन से ही आंदोलन की तैयारियां शुरु कर दी गयीं । यहां तक कि संविधान को काठमांडू से लेकर मुफस्सल तक जलाया भी गया । कई बार आंदोलन हुए । आंदोलन के दौरान करीब छह दर्जन मधेशी सपूप शहीद हुए, हजारों मधेशी घायल हुए, जेल भी गए । इतना होने पर भी प्रधानमंत्री ओली मधेशियों की मांगे पूरी करने के बजाय दमन ही किये । यहां तक की अश्रु गैस छोडेÞ जा रहे थे, लाठी चार्ज हो रहा था और गोलियां चल रही थीं । फिर भी मधेशियों का अधिकार सुनिश्चित नहीं हो सका । इसलिए मधेशी व जनजाति पार्टियां आज तक आंदोलनरत हैं ।
जहां तक सवाल है चुनाव का, तो मेरे ख्याल से मधेश में चुनाव होना असंभव दिखाई दे रहा है । इसलिए कि जब तक संविधान संशोधन विधेयक परिमार्जन सहित पारित नहीं हो जाता है, तब तक चुनाव करवाना मधेशी, थारु, दलित, पिछड़ावर्ग आदि समुदायों के साथ बेईमानी होगी । चुनाव होना अति आवश्यक है, क्योंकि पिछले १९ वर्षों से स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं हो सका है । लेकिन सवाल यह है कि चुनाव किसके लिए और कैसा हो ? चुनाव राजा ज्ञानेन्द्र के समय में मधेश में भी हुआ था । मधेशी जनता ने वोट भी डाली थी । लेकिन प्रतिफल हुआ शून्य । इसी प्रकार वैशाख ३१ में होने वाला चुनाव कैसा होगा ? चुनाव में पुलिस वोट डालेगी या मधेशी जनता । देश की आधी आवादी की भागीदारी बगैर चुनाव की बैधता क्या होगी ? इसीलिए बहरहाल यह जरुरी है कि पहले मधेशी व जनजाति पार्टियों की मांगें पूरी करे और उसके बाद ही चुनाव करवाया जाए, तो देश के लिए बेहत्तर होगा अन्यथा देश में द्वन्द्व की स्थिति पैदा हो सकती है, ऐसा मुझे लगता है ।
(सुभेन्द्रकुमार कनौजिया अप्सन नेपाल सिरहा शाखा के जिला अध्यक्ष हैं ।)

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