मधेशियों को आजाद मधेश के सिवा किसी भी आन्दोलन से फायदा नहीं: कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी, 2 सेप्टेम्बर |
अमर्त्यसेन की मानें तो किसी भी समाज या राष्ट्र का विकास उसके आजादी के बिना संभव नहीं हो सकता । अमर्त्यसेन आज के विश्व के एक महान् अर्थशास्त्री हैं और उनका मानना है कि गुलाम समाज या तो कोई विकास कर ही नहीं सकता या कोई उसके लिए कर भी दे तो उसे वह टिका नहीं सकता ।

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सन् १९३५ में जब अग्रेजों ने इण्डियन एक्ट कानुन बनाया, उसी समय से उन्होंने एक तरकीब निकालना शुरु किया था कि भारतीय लोगों को संघीयता दें ता कि वे आजाद भारत का फरमान को छोड दें । गाँधी से उन्होंने इस प्र्रस्ताव का जिक्र भी किया, लेकिन उन्होंने अगे्रजों के उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और स्वतन्त्रता आन्दोलन को जारी रखा । क्यूँकि वे जानते थे कि संघीयता भारत के लिए एक छल है ।
विचारणीय बात यह है कि जिस संघीयता पर मधेशी मोर्चा और उसके नेतागण जोड दे रहे हैं, वह संघीयता का प्रस्ताव भी नेपाली राज्य का नहीं है । भारत में राज कर रहे अंग्रेजों ने भारत पर अपने को कायम रखने के लिए कम से कम एक प्रस्ताव को तो लाया था । मगर मधेश को गुलाम बनाये बैठे नेपाली तो मधेशी के तरफ से नेपाली बनकर ही नेपाल को मानने बाली संघीयात के प्रस्ताव को भी इजाजत नहीं दे रहे हैं ।
आज पूनः जनकपुर–जलेश्वर–भिट्ठामोड सडक पूनर्निर्माण के लिए उस सडक से प्रत्यक्ष सरोकार रखने बाले लोगों द्वारा फरियाद की जा रही है । आन्दोलन की चेतावनी दी जा रही है और मर जाने की कसमें खायी गयी हैं जो राज्य चाहता ही है कि मधेश को उठाने बाला नेतृत्व किसी न किसी आन्दोल में, या बिगडे हुए सडक दुर्घटना में, या बाढ के बहाव में या फिर अन्न के अभाव में मरता जाये । और हम मधेशी नेता लोग नेपाल सरकार को मरने या आत्महत्या करने की धम्की देकर अपने स्वयं और अपने समाज को हँसी के पात्र बनाते जा रहे हैं ।
संयोग भी अच्छा ही रहा है कि आज के दिन ही मधेशी टाईगर के कुछ नेता लोगों ने भी नेपाल सरकार को चेतावनी दी है कि उनके साथ नेपाल सरकार द्वारा किए गए सम्झौतों को अगर किनारा नहीं दिया गया तो वे अब सि के राउत के साथ मिलकर स्वतन्त्र मधेश के लिए शान्तिपूर्ण आन्दोलन करेंगे ।
देखना यह है कि इन दो आन्दोलनों की चेतावनियों से नेपाल सरकार पर असर कितने पडते हैं । लेकिन एक बात तय है कि इन चेतावनीपूर्ण आन्दोलनों से मधेश को मिलने बाला कुछ भी नहीं है । क्यूँकि आन्दोलन परिवर्तन के लिए होता है न की चेतावनी के लिए । और आजतक हमने चेतावनी की ही आन्दोलन की है जिसमें नुक्सान ज्यादा और उपलब्धि गौण मिली है ।
सडक पूनर्निर्माण के लिए होने बाले आन्दोलन से सडक बन नहीं सकता । बन भी जाये तो उसका भविष्य सुरक्षित हो नहीं सकता ठीक वैसे जैसे उन्माद के सम्बन्ध से बनाये गए शारीरिक सम्बन्ध बाले आन्दोलन से जन्में किसी जानवर के बच्चे का जिम्मेबार कोई पिता नहीं होता । टाईगर के नेतागण की चेतावनी से यह प्रतित होता है कि वे अपने आन्दोलन से संभवतः थक चुके हैं । अब वे आन्दोलन करने से घबरा रहे हैं । वे अपने उद्देश्य को भूल चुके हैं जबकि उन्हें अपने हिंसात्मक मार्ग को भूलना चाहिए, न कि स्वतन्त्रता के उद्देश्यों को । स्वतन्त्र मधेश के लिए वे आज भी स्वतन्त्र हैं और बिना किसी को कोई चेतावनी स्वराज आन्दोलन में लग सकते हैं ।
क्या हमने कभी ध्यान दिया है कि हम और हमारे नेतागण उन्हीं शक्तियों को क्षणिक रुप में अपना मित्र बना लेते हैं जिन्होंने मधेश को धोखा दिया ? जिसने मधेश विरोधी संविधान बनाया और बनबाया, उसी को हम सरकार बनाने तथा उसके सरकार को खडा करने का जिम्मेबारी उठा लेते हैं । हमारे नेतागण उसी तरह के पक्षी इन्जिनियर से अपना मधेश निर्माण करना चाहते हैं जो कभी सम्राट अकबर के निर्देशन पर बीरबल ने आकाश में महल बनाने का जिम्मा लिया था । महाराज अकबर से बीरबल को आकाश में महल बनाने का जब निर्देश हुआ तो बीरबल ने आज्ञा मानकर एक सुगा को महीनों तक सिखाया और आकाश में उडा दिया । सिखाये गये बातों के अनुसार ही सुगा ने आकाश से महल बनाने की सारी सामग्रियाँ माँगने लगा जिसकी जानकारी बीरबल ने अकबर को दी । अकबर ने आकाश में सामग्रियाँ पहुँचाना जब असंभव कहा तो बीरबल ने कहा कि आकाश में महल बनाना भी असंभव है ।
जो हमारे बस में नहीं, वहाँ हम कुछ भी निर्माण नहीं कर सकते । किसी कारणवश अगर हम कर भी लें तो वह हमारे वस में होना निश्चित नहीं है । और वैसे भी प्रचण्ड का यह सरकार मधेशियों को कुछ देने के लिए नहीं, अपितु भारत का विश्वासपात्र बनने को तैयारी कर रही है । क्यूँकि प्रचण्ड को यह विश्वास हो गया है कि भारत के बिना वो नेपाली राजनीति में कुछ नहीं कर सकते । न वो कोई सरकार बना सकते, न टिका सकते । बन भी कोई सरकार जाय तो चला नहीं सकते ।
मधेशियों को अब आजाद मधेश के सिवाय किसी भी चीजों के लिए आन्दोलित करना फायदों से ज्यादा घाटाें ही भुगतना पडेगा ।
नेल्सन मण्डेला कहते हैं, “सफलता से पहले हर चीज असंभव ही होता है ।”

 

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