मधेशियों पर इतना बड़ा अविश्वास ! क्या पहाड़ियो पर ही नेपाल की अखंडता टिकी है ? गोपाल ठाकुर

गोपाल ठाकुर, काठमांडू, १० दिसिम्बर |
अध्यात्म से लेकर भौतिकी तक की व्याख्या के तहत दुनिया को गतिशील बताया गया है । यानी परिवर्तन प्रकृति का नियम है । खगोलीय से भूगर्भिक गतिविधियाँ होती ही रहती हैं । किंतु इन गतिविधियों का अंतराल बहुत लंबा होता है । तो क्या ऐसे अंतरालों के बीच परिवर्तन थम गया होता है ? जी नहीं । प्राकृतिक रूप से पर्यावरणीय ह्रास और मानवीय संवेग भी दुनिया को बदलते रहते हैं । ऐसे ही बदलावों के तहत अर्थ राजनीतिक युग का परिवर्तन भी होता रहता है । फिलहाल कुछ सहस्राब्दियों में यह मानव समाज आदिम साम्यवाद, दास-मालिक युग, सामंत युग और पूँजीवाद तक का दौरा कर चुका है । खास कर सामंत और पूँजीवादी युगों में राष्ट्रों के सीमा का विस्तार और संकुचन होते रहते हैं ।
नेपाल और भारत के संदर्भ में कहें तो इनके आधुनिक स्वरूप खस-गोर्खाली सामंती साम्राज्य और बेलायती पूँजीवादी साम्राज्यों के बीच के संघर्ष और समन्वय से तय हुआ है । विश्व के अन्य भाग में भी ऐसी घटनाएँ आम ही रहीं । साम्राज्य तो राज्य प्रायोजित शोषण का चरमोत्कर्ष है । फिर भी पूँजीवादी साम्राज्य जहाँ पूँजी निर्माण को शोषण का आधार मानता है तो सामंती साम्राज्य निर्वाहमुखी अर्थतंत्र को । खस-गोर्खाली राजशाही के तहत नेपाल और बेलायती साम्राज्य के तहत भारत की समकालीन अर्थ राजनीति के तहत भौतिक विकास-निर्माण की प्रक्रिया को देखते ही यह बात समझ में आ जाती है ।
12309227_523296687830120_1812971104_nबेलायती मोडल ही सही, औपनिवेशिक भारत में शिक्षा, यातायात और उद्योग का जिस रफ्तार में विकास हुआ था, निरक्षर नेपाल बैलगाड़ी का प्रयोग कर अपने कृषि और वन पैदावार भारत को दे रहा था । अपने ही नाम पर एक कॉलेज का उद्‌घाटन करते समय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री ३ चंद्र शमशेर का यह कहना कि उसने अपने ही पैरों को काटने के लिए एक कुल्हाड़ी का निर्माण किया है, खस-गोर्खाली सामंती साम्राज्य के चरित्र को भलीभाँति दर्शाता है । यानी शाह हो या राणा, उनके दरबार से बाहर किसी को शिक्षा लेने का अधिकार नहीं था । इतिहासकारों ने नेपाल को गुलामी से परे बताया है । जहाँ शिक्षा का किसी के पास अधिकार नहीं, गुलामी का उससे भी बड़ा कोई प्रमाण होगा ? निश्चित रूप से उस दौरान पूरा नेपाल इस खस-गोर्खाली दरबार का गुलाम था । इस गुलामी से मुक्ति के लिए नेपाल की जनता ने क्रमशः राणाशाही और राजशाही को उखाड़ फेंका । इस बीच संवैधानिक राजशाही के तहत चले प्रजातंत्र में भी खस-गोर्खा के अलावा सभी विजित राष्ट्रों ने राष्ट्रिय उत्पीड़न से मुक्ति का एहसास नहीं किया । इसलिए गणतंत्र की स्थापना के साथ साथ राष्ट्रिय पहचान सहित की संघीयता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य शर्त बन गई थी । इसमें दस वर्षीय माओवादी जनयुद्ध ने अच्छा-खासा योगदान किया था । सभी उत्पीड़ित राष्ट्रों की मुक्ति के लिए राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे बनाए गए थे । मधेश की मुक्ति के लिए मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा काम कर रहा था । किंतु तत्कालीन माओवादी युद्ध-सरदार प्रचंड को युद्धोत्तर काल में ईमानदार नहीं पाया गया । इसलिए संघीयता और समग्र मधेश एक प्रदेश के लिए मधेश को ही आगे आना पड़ा । पहले ‌और दूसरे मधेश आंदोलन ने इन दोनों सरोकारों को संवैधानिक रूप से स्थापित किया ।
पहली संविधान सभा में फिर भी संघीयता का विषय ही इन खस-गोर्खाली साम्राज्यवादियों के शरदर्द बना रहा । नाटकीय ढंग से उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं की बहुमत वाली उस संविधान सभा का गला घोंटकर फर्जी तरीके से दूसरी संविधान सभा का गठन किया गया । फिर संविधान निर्माण की सारी प्रक्रियाओं को रद्दी की टोकरी में फेंककर खस-गोर्खाली साम्राज्यवाद के तीन नेताओं ने १६ सुत्रीय सहमति के तहत इस सातवें संविधान को उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं पर थोप ही डाला । इसलिए संघीयता का जो मोडल नेपाल में थोपने का दुष्प्रयास किया गया है, वह विगत में राजा महेंद्र-वीरेंद्र के पाँच विकास क्षेत्र की प्रशासनिक अवधारणा से कतई भिन्न नहीं है । फलतः सभी उत्पीड़ित राष्ट्रीयताएँ विक्षुब्ध हैं किंतु मधेश संविधान के प्रारंभिक मस्यौदे के सार्वजनिकीकरण के समय से ही आंदोलित है । तीसरा मधेश आंदोलन चार महीने पूरे करने को है तो नेपाल-भारत सीमा नाकाबंदी भी तीसरे महीने में जारी ही है ।
जब कोई ठोस दलील नहीं मिलता, तो साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद का सहारा बनता है खोखला अंधराष्ट्रवाद । इसके तहत वे अखंडता और संप्रभुता पर संकट बताकर आंदोलनकारियों की गैरन्यायिक हत्या की लंबी कतार खड़ी करना चाहते हैं । जारी मधेश आंदोलन के दौरान भी दर्जनों की छाती ‌और ललाट पर गोली मारकर इन दरिन्दों ने हत्या कर दी है । किंतु आंदोलन भी कुछ लक्ष्यविहीन प्रहार सा बन गया है ।
समग्र मधेश एक प्रदेश के अपने एजेंडा से संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा और संघीय समावेशी मधेशी गठबंधन दोनों कब के पीछे हट चुके हैं । सभी को मालूम है राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की संवैधानिक सुनिश्चितता के बिना घरेलु साम्राज्यवाद और आन्तरिक उपनिवेशवाद का खत्मा नहीं किया जा सकता । फिर भी इन दोनों कथित आन्दोलनकारी गँठजोड़ों का इस मुद्दे से अब तक कोई सरोकार नहीं । इसी तरह मधेश की सब से अधिक विकराल समस्या है पहाड़ी जनसंख्या का मधेश में आप्रवासन । किंतु ये भी इनके सरोकार का विषय नहीं है । राज्य के हर निकाय में पूर्ण समानुपातिक प्रतिनिधित्व, समान मताधिकार, समान नागरिक अधिकार जैसे विषय भी उतनी तदारुकता से नहीं उठाए जा रहे हैं । इसके बावजूद ये खस-गोर्खाली उपनिवेशक अपनी पकड़ में रही मधेश की भूमि तक मधेश प्रदेश में देने को तैयार नहीं । इनके अनुसार मधेश एक तो हो ही नहीं सकता, किंतु दो या अधिक प्रदेश भी पहाड़ के साथ बिना मिलाये संभव नहीं । यहाँ तक कि मधेश में रहे पहाड़ियों के कुछ गाँव या बस्तियाँ भी पहाड़ के साथ ही रखने के टिकड़म किए गए हैं ।
मधेश और मधेशियों पर इतना बड़ा अविश्वास ? मानों पहाड़ियो पर ही नेपाल की अखंडता और संप्रभुता टिकी हो । तब तो एक सवाल का हल हमें ढूँढना ही होगा । वह यह कि किसी भी राज्य का कोई भी हिस्सा अगर उसकी अखंडता और संप्रभुता से परे माना जाय तो उस हिस्से को गुलाम नहीं तो और क्या माना जाएगा ? तो इस तरह गुलामी थोपनेवाला राज्य साम्राज्य नहीं तो और क्या कहलाएगा ? अगर ऐसा हो तो इस एक्कीसवीं शदी में इस तरह का परतंत्र राष्ट्र स्वाधीनता के लिए भला क्यों नहीं लड़ेगा ? किंतु अभी चल रहा मधेश आंदोलन बिलकुल संघीयता के लिए है और वह भी अधूरी प्रशासनिक संघीयता के लिए, राष्ट्रीयता पर आधारित संघीयता के लिए नहीं । फिर भी इस आंदोलन से नेपाल की अखंडता और संप्रभुता कमजोर होने की बात बताई जा रही है । यह बात वे बता रहे हैं जो मार्क्स, लेनिन और माओ के शिष्य होने का दावा करते हैं यानी साम्यवादी दल के सरदार के रूप में परिचित हैं । तो उन्हें कहना होगा कि साम्यवाद राज्य के अस्तित्व को मिटाना चाहता है या नहीं । निश्चित रूप से राज्य को हर साम्यवादी शोषण और उत्पीड़न का व्यवस्थित औंजार मानता है । इसलिए पहले राष्ट्रीय उत्पीड़नकारी राज्य से मुक्ति और बाद में वर्गीय उत्पीड़नकारी राज्य से मुक्ति साम्यवाद का मूल मंत्र है । खस-गोर्खालियों का साम्राज्य नेपाल तो अब तक दोनों उत्पीड़नों को कायम रखा हुआ है । तो मधेश सहित के राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों को अगर समय से ही राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार सहित राष्ट्र-परिवेष्ठित प्रांतीय इकाई बनाकर संबोधित नहीं किया गया तो ऐसा उत्पीड़क साम्राज्य तो बिखरेगा ही । हो सकता है किसी के लिए अफशोस का विषय हो, किंतु अफशोस के साथ अस्तित्व का शौदा भला करेगा कौन ?
कचोर्वा-१, बारा
दिसंबर १०, २०१५

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