मधेशियों से कोई खतरा ही नहीं तो इनका सुने क्यूँ ? गुलामों से डरना कैसा ? ई. श्याम सुन्दर मण्डल

 

ई. श्याम सुन्दर मण्डल, सप्तरी, १ जून|  शासक और गुलाम हम ने और आप ने, हम सभी नें बार-बार यही सुना है : “नेपाली लोग आन्दोलन करते हैं तो उनकी मांग पुरा हो जाती है | हम मधेशियों ने बार-बार आन्दोलन किया, सर और छातियों पर गोली खाया, सैकड़ों प्राण की आहूतियां दी किन्तु ईस मुल्क में हमारा कोई समाधान नहीं मिला | काठमांडू की जनता आन्दोलन करे तो उनपर पानी का फोहरा छोड़ते हैं, मगर जनकपुर और टीकापुर की मधेशियों नें आन्दोलन छेड़ी तो उनपर गोलियों की बौछार बरसे !” आदि, ईत्यादी…| ईसे हम कहते हैं, यह हमपर विभेद नहीं तो और क्या है और आन्दोलन में उतर जाते हैं | निरन्तर आन्दोलन होता है | मधेशियों का जीवन समाप्त होता है | अरबों का क्षति होती है | सरकार वार्ता में बुलाते हैं, हम दौड़े चले जाते हैं | सम्झौते किया जाता है | हम सरकार में जाते हैं | मंत्री, सांसद होते हैं | ईतने प्रक्रिया चलने के बाद ५/१० वर्ष बीत जाती है | सम्झौता भुल जाते हैं और फिर आन्दोलन का वही पुराना चक्र शुरु हो जाता है |
नेपाली राज में मधेशियों के साथ सदियों से होते आरहे और होनेवाला बदसलूकी यही है | क्या यह सारे क्रिया केवल विभेद ही हैं ? हमारी सोच की दायरा क्या यहीं तक सीमीत है ? हमारी मानिए तो यह केवल विभेद नहीं है | यह तो उपनिवेश है, गुलामी है, अन्याय है, अत्याचार और अमानवीयता की पराकाष्ठा है | हमें नेपाली राज में नागरिकता तो मिली है, किन्तु नेपालियों के नजर में वह केवल पास है | नेपाली राज में रहने की पास | खुद को हम नेपाली कहते हैं, किन्तु उनके दृष्टिकोण में तो आगन्तुक बिहारी, धोती और विदेशी हैं | खुद को मालिक मानते हैं, परंतु नेपालियों के लिए तो हम गुलाम हैं | केवल गुलाम ! और, यह बात समझ ही लेना चाहिए कि गुलामों का कोई हक नहीं होता, कोई अधिकार नहीं होता | गुलाम तो सेवा करते हैं और सेवा परिश्रम के बदले उन्हें केवल पारिश्रमिक मिलती है | सच में हम नागरिक होते तो हमारा हिमाल भी होता, पहाड़ भी होता | हमारा सम्मान वहाँ भी होते और यहाँ भी | लेकिन क्या होता है ? यह तो सभी के आँखों के सामने हैं | हर मधेशियों के मानसपटल में है | जहाँ नेपालियों का बसोबास है, वहाँ मधेशियों की उपस्थिति बर्दाश्त नहीं | आखिर, यह सब होता क्यूँ है ? मधेशियों के साथ ऐसी विभेद क्यूँ है ? नेपाली लोग हमें स्वीकार क्यूँ नहीं करते ? हमें बार-बार आन्दोलन क्यूँ करना पड़ता है ? हमें स्थाई रूपसे अधिकार क्यूँ नहीं दिया जाता है ? दी हुई अधिकार भी किस वजह से छीन ली जाती है ? वास्तविक रूप में हम खोज करे तो हम आसानी से सही जबाव तक पहूँच सकते हैं | सवालों पर निःस्वार्थ, गुलाम मानसिकता से उठकर सुक्ष्म अध्य्यन और रिसर्च करें तो सही समाधान को पकड़ सकते हैं |
आईए, इसके पिछे का महत्वपूर्ण कारण पर विमर्श करें | छलफल करें और समाधान के लिए सही योजना पर सोचें | सही मायने में ‘नागरिक’ वही होते हैं, जिनसे राज्य डरती हैं | ‘सार्वभौम’ अधिकार जिनके पास रहती है, राज्य केवल उसी से डरती है | क्यूँकि राज्य का निर्माण, सुरक्षा, परिवर्तन, बदलाव, सञ्चालन आदि सार्वभौम जनता के पास ही होती है | जिनके पास सार्वभौम अधिकार होती राज्य उसी से डरती है | अतः सार्वभौम अधिकार सम्पन्न नागरिक जब आन्दोलन करती है तो राज्यद्वारा उनकी मांगो का संबोधन करना बाध्यात्मक हो जाती है | हम दावे के साथ कह सकते हैं कि नेपाल मुल्क में सार्वभौम अधिकार सम्पन्न नागरिक केवल नेपाली लोग है और नेपाली वही है जो गैर-मधेशी है | अर्थात दहाल, खनाल, थापा, रावल, चन्द, कोईराला, नेपाल, ओली, सिटौला, पौडेल जैसे लोग ही यहाँ सार्वभौम अधिकार प्राप्त नागरिक हैं | ये लोग जबभी आन्दोलन करेंगे तो ईनका मांग संबोधन होगा ही | अगर नहीं हुई तो ये लोग ईस मुल्क में सार्वभौम अधिकार प्रयोग कर हर चीज परिवर्तन करने का साहस रखते हैं, जो मधेशियों के पास नहीं है | नेपाली लोग यहाँ की सरकार बदल सकते हैं |  ब्यवस्था बदल सकते हैं, चाहे तो तख्ता ही पलट सकते हैं जो ताकत्त मधेशियों के पास बिलकुल ही नहीं | यही कारण रहा है, नेपाली नागरिक का हर जायज मांग पुरा होना परंतु ‘नेपाली पासधारी मधेशियों’ का जायज मांगो के लिए दर्जनों मधेशी गुलाम की बलिदानी होने के बाद भी कुछ हासिल नहीं होना | ईतिहास साक्षी है, नेपालियों ने चाहा राणातन्त्र को बदल दिया | उसने चाहा पञ्चायत और राजतन्त्र को बदल डाला | ‘दहाल और भट्टराई’ ने चाहा तो राजशाही लोकतन्त्र को बदल कर राजा बिहीन गणतन्त्र स्थापित कर दिया | क्या यह ताकत्त मधेशियों के पास है ? नेपाली सत्ता को बदलने की ताकत मधेशियों के पास है ? ईस देश का संविधान और कानून बदलने की ताकत मधेशियों के पास है ? नेपाली सांसदों को खरिद कर या उनपर ह्वीप लगाकर या मंत्री पदों का लालच देकर (जैसे नेपाली दल या नेता मधेशियों को खरिदता है या डर धम्की देकर अपने नियन्त्रण में रखता है) अपने पार्टी के पक्ष में या अपने पक्ष में या नियन्त्रण में लाकर ‘बहुमत’ या ‘२/३ मत’ लाने की सामर्थ्य मधेशियों के पास हैं ?  नहीं | मधेशियों के पास सार्वभौम अधिकार नहीं होने का यह महत्वपूर्ण प्रमाण है | मधेशी लोग नेपाली मुल्क में केवल ‘पासधारी नागरिक’ होने का यह स्पष्ट और बहुत बड़ा प्रमाण है |
मधेशी लोग नेपाली सत्ता को छू भी नहीं सकते, परिवर्तन करने की बात क्या करें | कानून और संविधान बदलने की ताकत्त मधेशियों के पास कहाँ, नेपालियों का संविधान में कमा, फुलस्टप और हलन्त बदलवाने के लिए भी कई मधेशियों की कुरबानी देनी पड़ती है | ईतना करने के बाद भी वह बदलाव स्थाई नहीं हो सकती केवल अ-स्थाई ही होगी | शासक जब चाहे, जैसे चाहे अपनी ताकत्त (राज्यशक्ति अर्थात सेना, पुलिस) लगाकर मधेशियों को दी हुई अधिकार को क्षण भर में छीन सकते हैं | मधेशियों के वश में तो राज्य कोष का १० करोड़ खर्च करना भी नहीं है, उसके लिए भी नेपाली मालिक का आदेश चाहिए | जब आप के वश में, आपके नियन्त्रण में या पकड़ में नेपाली सत्ता, सरकार, नियम, कानून, संविधान आदि कुछ बदलने की ताकत्त है ही नहीं तो नेपाली शासकों को आप से(मधेशियों से) ड़र कैसा ? आप की हैसियत हर एक नेपाली शासकों को ज्ञात हैं | आप ईस नेपाली राज में कितना उखाड़ सकते हैं, हर कुछ मालूम हैं तो आप से नेपालियों को खतरा कैसा ? आपके हजारों सहादत भी आपको यहाँ सार्वभौम अधिकार नहीं दिला सकती | हजारों बलिदानी भी आपको पहाड़ और हिमाल में जिता नहीं सकती | आप २५/५० सीटों का धाक नहीं लगा सकते, क्यूँकि नेपाली पार्टियों की सरकार बनाने या परिवर्तन करने के वक्त के अलावा अन्य समय में उसका कोई आवश्यकता नहीं | आपका मोल भी उन्हें मालूम है और खरिदने का ताकत्त भी उन्हीं के पास मौजूद हैं | कितने करोड़ में बिकेंगे या कितने मंत्री लेकर उनको मत देंगे, वे वर्षों से अभ्यस्त हैं | ईतने सारे बात जानने के बाद भी कहेंगे कि मधेशियों को अधिकार क्यूँ नहीं मिलती ? अरे भई, सीधी सी बात हैं : १. मधेशी यहाँ के सार्वभौम अधिकार सम्पन्न नागरिक नहीं बल्कि केवल पासधारी नागरिक हैं, २. मधेशियों के पास नेपाली सत्ता, सरकार, नियम, कानून और संविधान बनाने या बदलने या खारिज करने की कोई ताकत्त नहीं, ३. मधेशियों के पास ईस मुल्क में बहुमत या २/३ मत लाने की कोई सामर्थ्य भी नहीं, ४. जल, जंगल, जमीन, श्रोत, साधन और देश की अर्थतन्त्र या किसी मेकानिज्म पर कोई नियन्त्रण नहीं, ५. आप के पास तराई के अलावा हीमाल, पहाड़, या नेपाली वस्तियों में कोई सम्मान नहीं, पहचान नहीं, मतदान नहीं, स्वाभिमान नहीं, कुछ भी नहीं | यही कारण यहाँ वर्षों आन्दोलन करने पर भी, गुलामों की भाँती सेवा करने पर भी, हजारों लाखों बलिदानी देने पर भी कुछ नहीं मिलने वाला है | सत्य यही है : “उपनिवेश का समाधान केवल आजादी है, स्वतन्त्रता है, आजा़द मधेश है | और कुछ भी नहीं !”

ई. श्याम सुन्दर मण्डल

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