मधेशियों से प्रार्थना है कि अब भारत की बेटियाँ ना लाएँ : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति

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श्वेता दीप्ति ,काठमांडू, १ जुलाई | महिलाओं के प्रति कुण्ठित मानसिकता के साथ आया संविधान मसौदा — सम्भवतः नारी के प्रति हमारी संस्कृति, हमारा इतिहास हमारे संस्कार और यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते…वाली परम्परा अब स्वयं इतिहास बनने वाली है । चिर प्रतिक्षित संविधान का मसौदा आ चुका है और पुरुष प्रधान मानसिकता अपनी चरम सीमा के साथ संविधान मसौदे में उभर कर आई है । समानता और अधिकार, महिलाओं के लिए ये खोखले शब्द आने वाले समय में नेपाल के शब्दकोष में ही सिमट कर रहने वाले हैं । किस अधिकार और समानता की बात करें हम ? हम जन्म दे सकते हैं किन्तु अपनी संतान को अपना नाम नहीं, क्योंकि इसके लिए हमें पुरुषों की आवश्यकता है, अगर वो चाहे तो अपना नाम संतान को दे, ना चाहे तो वह संतान नाजायज । खासकर वो विदेशी महिला जो ब्याह कर आती हैं, उनका अस्तित्व तो कहीं रह ही नहीं गया । उनकी अवस्था तो इतनी बदतर है कि ना तो वह अपनी जन्मभूमि की होती है और ना ही कर्मभूमि की और फिर कौन सी और कैसी कर्मभूमि ? जहाँ आप सक्षम हैं भी तो देश की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी आपको नहीं दी जा सकती है, जहाँ आप देश के प्रति समर्पित हो सकती हैं किन्तु वहाँ की राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे पदों के लायक नहीं हो सकती हैं । क्योंकि आपकी जन्मभूमि यह नहीं है । ये इतने मार्मिक सवाल हैं अंगीकृत नागरिकता प्राप्त महिलाओं के लिए जिनका अस्तित्व कहीं नहीं रह जाता है । अब तक तो घर का सवाल आता था । औरत का घर कौन सा है ? क्योंकि मायका पिता और भाई का होता है और ससुराल पति का । किन्तु अब तो देशविहीन भी बनाया जा रहा है । नागरिकता नहीं देनी है, देश में भागीदारी नहीं देनी है, तो सबसे पहले विवाह सम्बन्धी विधेयक बनाएँ और उसमें सीमापार के वैवाहिक सम्बन्धों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाएँ । सामाजिक तौर पर तो अंगीकृत महिलाओं को खासकर भारतीय अंगीकृत महिलाओं को स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार तो था ही नहीं, एक विशेष समुदाय की ओर से । जबकि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता लोकतंत्र की पहली परिभाषा होती है, जहाँ देश का हर नागरिक अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र होता है । किन्तु गलती से भी अगर किसी अंगीकृत नागरिक भारतीय महिला ने अपने विचारों को रखा और वह तथाकथित राष्ट्रभक्तों को पसन्द नहीं आई तो फिर तो आलम यह है कि सोशल मीडिया उसके लिए गालियों से रंग जाती है । यह है दुर्दशा और अवस्था उन महिलाओं की और अब तो संवैधानिक रूप से अधिकार मिल जाएगा गाली देने का । मधेश और मधेशियों के हक में यह एक गाली ही है क्योंकि मधेश के हर घर का रिश्ता सीमा पार से होता है । इसलिए मधेशियों से प्रार्थना है कि अब या तो आप सीमापार की बेटियाँ ना लाएँ और अगर लाएँ तो उसे, उसकी भाषा को, उसकी सक्षमता को और उसकी शिक्षा को देश में सम्मान और अधिकार दिलाएँ । अगर आप इसमें सक्षम नहीं हैं तो किसी की जिन्दगी को मजाक बनाने का भी आपको अधिकार नहीं है, क्योंकि बेटियाँ भाग कर नहीं आती हैं बकायदा रीति रिवाज और संस्कारों का निर्वाह कर आप उसे घर की इज्जत बना कर लाते हैं, तो उसे देश की इज्जत भी बनाएँ । अगर देश अंगीकृत भारतीय महिलाओं को अधिकार नहीं देता है तो ऐसे देश की नागरिकता का भी कोई औचित्य नहीं रह जाता है । भारत में हमारा स्थान नहीं, नेपाल में हमारा स्थान नहीं तो आखिर हमारी स्थिति क्या है ? इस विषय पर राज्य को संबोधन करना होगा और साथ ही भारत सरकार से भी यह अपील है कि इस मसले को गम्भीरता से लें और सही दिशा और सलाह दें । अस्तित्वविहीन बनकर रहने और जीने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है । कहाँ हैं महिला आयोग और कहाँ हैं मानवअधिकार आयोग ? आखिर मानव हम भी तो हैं तो हमारे अधिकारों के लिए इनकी खामोशी क्यों ?

औरत माँ बने ना बने, उसका स्वास्थ्य माँ बनने के लायक है या नहीं, वह गर्भपतन करा सकती है या नहीं इन सभी अधिकारों से उसे वंचित किया जा रहा है । वैवाहिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है । विदेशी पुरुष के साथ विवाह करना और उस पुरुष को १५ वर्ष नागरिकता के लिए इंतजार करना नारी विभेद का सबसे बड़ा उदाहरण है और सबसे बड़ी बात शादी होगी तो बच्चा होगा और इस बीच अगर किसी वजह से विदेशी पति की मृत्यु हो जाती है तो उनदोनों की संतान का क्या होगा ? इसका जवाब राज्य दे सकता है ?

माँ बनना सम्पूर्ण नारीत्व है, वरदान है नारी के लिए, किन्तु आज जो हालात हैं उससे तो कल यह नारीत्व गाली ही बनने वाली है । आए दिन अपराध हो रहे हैं, बलात्कार की शिकार बहु बेटियाँ हो रही हैं । खुदा ना खास्ते अगर बलात्कृत महिला गर्भवती हो जाती है, तो या तो उसका गर्भपतन कराया जाएगा, या अगर वह बच्चा जन्म लेता है तो जिन्दगी भर नागरिकता विहीन होकर नाजायज कहलाएगा क्योंकि, माँ का होना तो कोई अर्थ ही नहीं रखता है । हमारी संस्कृति वही है जहाँ माँ के नाम से संतान को सम्बोधित किया जाता था, पहचाना जाता था, जहाँ देवकी पुत्र, अंजनीपुत्र, कुंती पुत्र से ईश्वर पहचाने जाते थे, आज उसी संस्कृति में हमें अपनी संतान को पहचान देने के अधिकारों से वंचित किया जा रहा है । नागरिकता एक गम्भीर विषय है इसे देने से पहले सावधानी आवश्यक है किन्तु इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि औरतों के अधिकारों को ही सूलीपर चढ़ाया जाय । इतना ही नहीं अंतरिम संविधान में जो ३३ प्रतिशत प्रतिनिधित्व की गारेन्टी महिलाओं के लिए दी गई थी उक्त गारेन्टी भी इस ऐतिहासिक और बहुप्रतिक्षित संविधान मसौदे में जगह पाने से वंचित रह गई है । लगता है हमारे नेता देश की आधी आबादी को ही विस्मृत कर रह गए हैं ।

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