मधेशी अपनी गुलामी मानसिकता को त्याग करें : ई. रामेश्वर प्रसाद सिंह

ई. रामेश्वर प्रसाद सिंह(रमेश), दुर्गापुर, सिरहा, ७ चैत्र  |
कोई भी निश्चित भुभाग या फिर यूँ कहे तो राष्ट्र की अवस्था तब तक सामान्य नहीं मानी जाती जब तक वहाँ की राजनैतिक गतिविधि में स्थिरता न हो। अभी के दरमियान में मधेश की जो राजनैतिक गतिविधियाँ हैं उसे सभी मधेशी वाकिफ ही हैं। मधेश की कुल जनसंख्या लगभग सावा एक करोड़ हैं और उसी सावा एक करोड़ में जनता को इस पार्टी से उस पार्टी में फेर बदल कराया जाता हैं। लोगों को अपने में ही फुट डाला जाता हैं कभी धर्म के नाम पर तो कभी जात के नाम पर।
राजनैतिक स्वार्थ के लिए नेता लोग की यह हर्कत सामान्य हैं किंतु मधेश की हक पर बात बहुत दुर की हैं। यहाँ पर मधेश के नेता लो खुद की दिमाग मस्तिष्क से यह सब नहीं कर रहा बल्कि नेपाली शासक लोg उनसे यह करवा रहें हैं और इसके पिछे एक ही वजह हैं गुलामी से भरे मानसिकता । वे लोग प्रयत्नशील रहते हैं कि उनके इसारा पर चलने से उन्हे भी सच्चा नेपाली कहा जाएगा और इसके लिए वह अपनी वास्तविक्ता को छुपाने में लग जाते हैं।
इसके लिए हम किसीको दोस नहीं दे सकते क्योंकि सन् १८१६ से शुरु हुआ यह गुलामी ने २०० वर्ष की यात्रा में हमे इस तरह जकड़ लिया हैं की हम उसे बाहर निकलना ही नहीं चाहते हैं। अपने मस्तिष्क को गुलामी करने हेतु ही तैयार करते हैं और इस दल–दल में और फसे जा रहे हैं। बच्चा पैदा हाने के बाद जब वह बोलने लग जाते हैं तो हम उन्हें नेपाली बोलना चालु करते हैं, गोर्खाली सेना की झुठी बहादुरी रटाने लगते हैं, नेपाली होने में गर्भ करना सिखाते हैं और अपनी पहचान को लात मारते हैं, हम पर उपनीवेश लादने वालो की जय जय कार करने में तल्लिन हो जाते हैं।
इन सब से मुक्ति पाने हेतु हमें खुद को बदलना होगा, संकुचित सोच से बाहर निकल कर खुल्ला सोच में जीना होगा, गुलामी की जंजीर को तोड़ते हुए आजादी पथ पर चलना होगा, अपने को पहचान कर आगे बढ़ना होगा तभी ही शान्त मधेश का निर्माण होगा, मधेश उथिष्ठ एवं उत्कृष्ट होगा और मधेशीयों का आत्मसम्मान बढ़ेगा।
दुर्गापुर–३, सिरहा(मधेश)

रामेश्वर प्रसाद सिंह(रमेश)

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