मधेशी जनता की एक ही आवाज, अधिकार सुनिश्चित बेगैर चुनाव बहिष्कार : मुकेश झा

मुकेश झा, जनकपुर, ६ जून | मधेशियों के संघर्ष और शहादत का मजाक बनाकर उसका बारम्बार उपहास उड़ाना नेपाली सत्ता ने नही छोडी। चाहे राणा, राजतन्त्र या वर्तमान का “काला लोकतंत्र” सब के सब एक ही मानसिकता से ग्रसित हैं कि मधेशियों को कैसे ज्यादा से ज्यादा अधिकार बिहीन बना कर , दवा कर रखा जाए। इसीलिये तो वर्तमान में भी आधा शतक से ज्यादा के बलिदानी के बाद आए अंतरिम सम्विधान को फाड़ कर कूड़ेदान में डालते हुए मनमाना ढंग से सीमांकन, पुनर्संरचना, निर्वाचन क्षेत्र इत्यादि बना दिया और दुनिया को बहुमत का दम्भ दिखाने लगा। पर काँग्रेस एमाले माओवादी को अब यह बात समझ लेना चाहिये कि मधेश और मधेशी इनका असली चेहरा पहचान चुका है।
सत्ता साझेदार की काठमांडु के वातानुकूलित कमरे में बैठकर मधेश देखने की जो राणाकालीन आदत है अगर वह अब भी नही गई तो इस से बड़ी मूर्खता कुछ नही होगी। आये दिन नेपाली मीडिया बार बार यह भ्रम फैलाने में लगी हुई है कि मधेश में चुनाव का माहौल जोड़ पर, राजपा नेपाल भी निर्वाचन में जाने को तैयार, उसे भी चुनाव में जाना चाहिये, वह भी जाएगी इत्यदि। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। मधेश में नेपाली कांग्रेस एमाले माओवादी का सदस्यता लिए कुछ व्यक्ति के अलावा हरेक मधेशी की यही आवाज है कि जब तक सम्विधान संसोधन के मार्फ़त मधेशियों का सम्पूर्ण अधिकार सुनिश्चित नही हो जाती तबतक मधेश में कोई भी चुनाव नही होगी। राजपा संयोजक महन्थ ठाकुर ने भी कई बार कई जगह यह संकल्प दोहराया है, फिर यह नश्लिय मीडिया अपने झूठ से बाज क्यों नही आ रहा ? कल्ह ही राजपा अध्यक्ष मंडल के एक अध्यक्ष राजेन्द्र महतो ने स्पष्ट कह दिया है कि जबतक हमारी मांगे पूरी नही होगी हम न तो चुनाव में जायेंगे और ना ही कोई चुनाव होने देंगे |
मधेश विद्रोह के कगार पर है इसलिए तो धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, पर्सा के कई गांव में मतदाता शिक्षा मधेशी जनता द्वारा बाधित हो गई, धनुषा में कांग्रेस कंम्यूनिष्ट की झंडा जला दी गई, पर्सा में कांग्रेस की मोटरसाइकल रैली में हस्तक्षेप हुई और वह कार्यक्रम रोक दिया गया, झापा में एमाले कार्यकर्ताओं को पिटाई भी हो गई, पर नेपाली नश्लिय मीडिया इन बातों को छुपाकर जनता एवम अन्तराष्ट्रीय जगत में भ्रम परोस रही है कि मधेश चुनाव के लिए तैयार है।
मधेशी जनता की एक ही आवाज है, अधिकार सुनिश्चित किये बिना अगर कोई भी पार्टी चुनाव में जाती है तो उनका प्रतिकार होगा। जब इतना कीमत चुकाया तो अब पीछे क्यों हटें ? नेपाली सत्ता यह भलीभांति समझ ले कि यह स्थानीय चुनाव है जिसमे स्थानीय के साथ मिलकर, स्थानीय के सहयोग से ही स्थानीय सरकार चलानी है। अगर निर्वाचन के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधि काठमांडु जा कर बैठ जाएं तब तो कोई बात नही, जैसे सेना उतारकर सम्विधान लादा था वैसे ही सत्ता अपना सैन्य बल दिखा कर चुनाव कराए, नही तो स्थानीय के सहयोग औऱ समर्थन के बिना स्थानीय सरकार कैसे चलेगी ? इसलिए सत्ता से आग्रह है कि भ्रामक समाचार सम्प्रेषण के बल पर चुनावी माहौल बन जायेगा ऐसा नही सोचें और न ही एकाध लोग जो काठमांडु में बैठकर मधेश के जानकार बन रहे हैं उनके कहे पर जाए और न ही मधेशवादी पार्टी पर “बाहिरी” दवाब डाल कर चुनाव कराने की भूल करे। क्योकि इससे मधेश में बहुत बड़ी विद्रोह की संभावना साफ है ।उम्मीद है सत्ता ऐसी गलती नही करेगी, मधेश के साथ ईमानदारी बरतते हुए अंतरिम सम्विधान के मर्म अनुसार सम्विधान संसोधन कर के संभावित विद्रोह को रोकेगी, अन्यथा विद्रोह अवश्यम्भावी है।

 

 

 

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