मधेशी दलों में एकता का औचित्य

dipendra jhaदिपेन्द्र झा:मधेशी दलों की एकता के बिषय में अब जनता ज्यादा उत्साहित नहीं है ।
संविधान सभा निर्वाचन के परिणाम के तत्काल बाद, मधेसी दलों ने एकता किया होता, तो शायद जनता की  भावनाओं को जीत सकते थे, लेकिन अब होने वाली एकता में मधेशी जनता को कोई आकर्षा नजर नही आ रहा है । मधेसी दलों की एकता बीरबल की खिचडÞी जैसी होने के कारण जनता की जुवान पर से एकता का स्वाद, दिल से चाह और पेट की भूख तकरीवन मर चुकी है ।
उपेन्द्र यादव जी ने तो एकता से अपना पल्ला झाडÞ ही लिया  है । उन्हें अव फोरम नेपाल, सदभावना अैार तमलोपा की एकता नई बोतल में पुरानी शराव की तरह नजर आ रही है । इसलिए वो बोतल अैार शराव दोनों नई बनाना चाहते हैं ।  उन्होंने  तमलोपा और सदभावना, इन दो दलों के बीच केवल एकता होगी, जैसी बात कह कर अपनी सोच  जाहिर कर दी है ।  madheshi leaders
अब सवाल यह उठता है कि क्या केवल दो दल तमलोपा और सदभावना की एकता,  मधेसी जनता को सकारात्मक सन्देश दे सकती है – इन दोनों दलों की  एकता मधेसी जनता की भावनाओं को नही छू सकती । क्योंकि  मधेश में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाली जाति यादव, थारु और मुस्लिम, इस एकता के नेतृत्वकर्ता नहीं होंगे ।  मधेश मे बिना यादव औैर थारु के नेतृत्व में होने वाली एकता का, संख्यात्मक अैर सांकेतिक हिसाव से कोई औचित्य नहीं है । मधेश के ब्राहृमण क्लव के नाम से जानी जानेवाली तमलोपा और पंचकुनिया का गठजोडÞ चमत्कारी नहीं हो सकती । इसमें भी अभी मधेश में सी के राउत और जेपी गुप्ता की तमरा अभियान काफी लोकप्रिय हो रही है ।
जव तक मधेशवादी दलों के नेता बीते हुए दिनों में हर्ुइ गलती के लिए  जनता से क्षमायाचना नहीं करेंगे तव तक एकता का कोई औचित्य नहीं है । खासकर सदा सत्ता में चिपकने की आदत, सता और शक्ति के लिए दलों को फोडÞना और संविधान सभा के दूसरे निर्वाचन में हर्ुइ हार के बावजूद भी अपनी बीवी, गर्ल फे्रन्ड अैर सम्बन्धियों को सभासद वनाना इन बातों से जनता के बीच इनकी पदलोलुपता का संदेश ही जाता है । कुछ समानुपातिक सभासद की सीटों को उन्होंने पैसा लेकर कुछ ऐसे पहाडÞी को बेच दिया जिनको मधेश के सवाल से कुछ लेना देना ही नहीं है । इसलिए मधेसी दलों को आत्मसमीक्षा  और गलती सुधारते हुए मधेशी जनता से क्षमा याचना करना जरूरी है ।
मधेसी दलों मे एकता न होने का प्रमुख कारण उपेन्द्र यादव और लैनचौर का हिसाब किताब नहीं मिलना है । लैनचौर के लिए उपेन्द्र यादव को पचा पाना जरा मुश्किल है  और उपेन्द्रजी को किसी और को नेतृत्व देने पर  लैनचौर हावी होने का खतरा महसूस होता है और यही वजह है कि वो  मानसिक रूप से एकता के लिए तैयार नहीं  हैं ।
विजय कुमार गच्छेदार जी अभी भी एकता या मोर्चा का निर्माण करके कैसे सरकार में मन्त्री के लिए बार्गिन्ङ्ग कर सकते हैं, उसके हिसाब किताब करने में व्यस्त हैं । मधेसी दल की एकता सरकार में जाने के लिए नही बल्कि संविधान निर्माण के लिए  होना चाहिए । क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता है तो पर्ूव की ही भाँति अगर ये सरकार में जाते हैं तो सरकार बनाने और गिराने के खेल में ही यह एकता सिमट कर रह जाएगी । मधेसी दलों की नीति, स्वार्थ और परिवारवाद की प्रवृत्ति से एकता का औचित्य ही समाप्त हो जाता है । जनता में ये विश्वास पैदा कर पाने में ही अर्समर्थ नजर आ रहे हैं ।
इसलिए एकता आदर्श  मंे आधारित, राजनीतिक संस्कार का अवलम्बन करने के लिए और मधेस आन्दोलन के म्यान्डेट के बिषयों को संविधान निर्माण में शामिल करने के लिए होनी चाहिए । खास करके इस संविधान सभा से मधेश के हित में संविधान बनने की कम सम्भावना होने की अवस्था में सडÞक मंे अपनी मजबूती बढाने के लिए एकता जरूरी है । लेकिन वह एकता सत्ता और स्वार्थ केी परिधि से उपर होनी चाहिए ।
संघीयता, शासकीय स्वरूप, नागरिकता और समावेशी के बिषय मंे समान धारणा तय करके  सैद्धान्तिक सहमति करने के बाद ही एकता मजबूत हो सकती है ।
लैनचौर के आर्शीवाद, सत्ता का स्वाद और कार्यकर्ता आदान प्रदान करने के हिसाब से हर्ुइ एकता लम्बे समय तक नहीं चल सकती । अच्छा हुआ इनको मोदीजी ने सपने से जगा दिया अैर वास्तविक धरातल में आने के लिए आईने में स्वयं को देखने को कहा । सन्देश दिया कि अपनी हैसियत बढÞाओ यही अन्तिम मौका है । वरना हाथ में कुछ नहीं रह जाएगा । दिल्ली को काठमाडौं से डील करना है मधेश से नहीं । दिल्ली से अपनी हैसियत बनाए रखना चाहते हो तो काठमाडांै की सत्ता के लायक अपनी हैसियत बनाओ  । दिल्ली के आशर्ीवाद से नही अपना आन्दोलन खुद करो । अपनी लडर्Þाई खुद लडÞो । यही सन्देश था मोदीजी का ।  इसलिए छोटे छोटे कमरे के अध्यक्ष होने से बृहत मधेसी दल का निर्माण करके कार्यकर्ता बनने के लिए तैयार होना पडÞा । मधेसी दलों मे कार्यकर्ता और नेता के बीच में कोई अन्तर  नहीं है । कार्यकर्ता एकबार नेता, सभासद और मन्त्री होने की अपेक्षा के साथ दल में प्रवेश करते हैं और वह अपेक्षा पूरा नहीं होने पर दूसरे दल -पार्टर्ीीका निर्माण करते हैैं ।  मंे जाकर गाँव घर की राजनीति करना छोडÞ देते हैं । राजनीति में धर्ैय और लम्बे संर्घष्ा की चाहत रखनी  जरूरी होती है । जिनमें ये दो चीजें नहीं वो मधेश की राजनीति ना करें पैसे कमाने की  चाह है तो कोई पेशा अपनाएँ, व्यापार करें या फिर लाखों नेपाली नागरिकों की तरह विदेश पलायन कर जाएँ ।
लग रहा मधेश में कोई नयी राजनीतिक शक्ति उभर कर आएगी । अभी की राजनीतिक दलोें के पहले वर्ग के नेतृत्व और उनके शिक्षालय मे पढेÞ दूसरे तबके के नेता भी अव मधेश के विभेद विरुद्ध के आन्दोलन को आगे ले जाने मे नाकाम रहें इसलिए अव मधेश के तीसरी पीढÞी जो बिलकुल शिक्षित और फेशवुक जेनरेशन के हैं वो आगे आने के लिए तैयार हैं । मधेश की राजनीतिक रिक्तता में नयी शक्ति की आवश्यकता है जो कभी भी किसी भी रूप में आ सकती है । इसलिए अव एकता की रट बबूल के पेडÞ से आम फलने की चाह की तरह है । जिससे अव कुछ मिलने वाला नहीं है । आम खाना है तो नए पेडÞ ही लगाने होंगे । पुराने पेडÞ, पुरानी खाल और सिंचाई से फिलहाल कुछ मिलने की सम्भावना दिखाई नहीं दे रही ।

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