मधेशी दल गलतफहमी में है कि मधेश में उनका कोई विकल्प नहीँ हो सकता ?

gantantra

मुरलीमनोहर तिबारी (सिपु), बीरगंज, १४ अगस्त | मधेश की नियति क्या है ? जब-जब सरकार मधेश के ख़िलाफ़ साजिश करती है, मधेशी विरोध में उतरते है, मधेशी दल उनके नेतृत्व का दावा करती है, गोलियां चलती है, लाशें गिरती है, फिर वार्ता- सहमति, शहीद घोषणा, दस लाख का अनुदान, नई सरकार, मंत्री और टॉय-टॉय फिस्स। यही होता आ रहा है, आगे भी होगा।

मधेश को बाहरी शक्तियों ने तो छलनी किया ही है, मोर्चा ने उसे और ज्यादा तार-तार किया है। इन्ही ढुलमुल क्रियाकलापों के कारणों से आंदोलन सफल नही हुआ। लाशो की चादर बिछ गई, धरती लहूलुहान हो गई, पर इनके मन की हरियाली कभी गई नहीं, आखिर क्या अंतर है, बिजय गच्छेदार और मोर्चा में, दोनों सत्ता लोभी है।

ये आंदोलन नही, आंदोलन का छलावा कर रहे थे, आंदोलन का नाटक कर रहे थे। आंदोलन और राजनीती में अंतर होता है, ये सिर्फ सत्ता की राजनीती कर रहे है। आंदोलन तो वो था, जो महात्मा गांधी ने किया था, नेल्सन मंडेला ने किया था। जिसमे खुद को सज़ा दी जाती है, खुद को गलाया-तपाया जाता है। आंदोलन तो १९०४ में हुआ था, जब भारत के मणिपुर में महिलाओं ने नूपी लाल का वह आंदोलन किया, जिसके कारण ब्रिटिश, बंधुआ मजदूरी बंद करने पर मजबूर हुए थे। आंदोलन तो जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की थी, जिसमे सभी युवाओं ने खुद को झोक दिया था।

आंदोलन तो वह है जो मणिपुर की आयरन लेडी कही जाने वाली ‘इरोम चानू शर्मीला’ कर रही है। वे इस बात की जीती जागती मिशाल हैं, की नागरिकों की पीड़ा को समाज के सामने लाने में किस हद तक संघर्ष किया जा सकता है। सैन्य बल विशेषाधिकार कानून के विरोध में करीब १६ साल से जिस दृढ़ता से वह अनशन कर रही है, वैसा मोर्चा क्यों नही करता, क्योकि मोर्चा के नियत में खोट है।

आंदोलन के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और कठिन परिश्रम होना चाहिए। अन्ना आंदोलन से कैसे मात्र १२ दिन में ही भारत भर में एक लहर पैदा हो गयी थी। देश का हर व्यक्ति अपने आपको उस आंदोलन से जुड़ा महसूस कर रहा था। सवाल उठता है, मोर्चा गाँधी की तरह लाठिया क्यों नही खा सकता ? ये मंडेला की तरह जेल क्यों नही जा सकते ? ये शर्मिला या अन्ना की तरह भूखहड़ताल क्यों नहीँ कर सकते ?

कही  ऐसा भी होता है, की अहिंसक आंदोलन में सैकड़ो शहीद होते है, फिर भी मांग पूरा नहीँ हो ?  ये सब इनकी नालायकी का नतीजा है। इनसे उम्मीद करना बालू में पानी पटाने जैसा है, जिसमे कोई फ़सल नही लगेगी। अगर चाकू तरबूज़ को काटे, तो दोष तरबूज़ का भी है, की वो इतना कमज़ोर क्यों है, जो कट जाता है, यही बात मधेशी आवाम पर लागू होती है, आख़िर कब तक मशीहा,संत और रहनुमा तलाशते रहेंगे ?

ऐसा क्यों होता है, अपने ही नेता, दगा क्यों दे देते है ? जबकि वे ख़ुद भी जानते है, की जनता सब जानती है, फिर भी उन्हें अपनी राजनितिक ज़मीन  खिसकने का भय क्यों नहीँ होता ? क्या कारण है की उन्हें लगता है, उनके जनता और कार्यकर्त्ता किसी भी हाल में उनका ही साथ देंगे। क्या मधेश के सवाल पर मधेशी दल अपना एकाधिकार नही थोप रहा है ? या उन्हें ये गलतफहमी हो गई है, की मधेश में उनका कोई विकल्प हो ही नहीँ सकता ?

इन सारे सवालों का एक ही जबाब है, की मधेश में मधेशी पार्टी नही है। सुनने में अज़ीब लगेगा, की मधेश में इतने दल है, और बहुतायत के अध्यक्ष मधेशी ही है, फिर कैसे कहा जा सकता है, की मधेश में मधेशी दल नही है ? जरा ग़ौर करके देखा जाएं, तो मधेश में यादव की पार्टी है,  ब्राह्मण और बैश्य की पार्टी तो है, पर संपूर्ण मधेशी को जोड़ने और उनका समुचित प्रतिनिधत्व करने वाली पार्टी नहीँ है।

यही मूल कारण है, जिसके कारण नेता को न ही कोई जबाबदेही है, न ही कोई भय। क्योकि मधेश के नेता जानते है, उनके कार्यकर्त्ता उनके जात-बिरादरी के है, उनसे प्रभवित है, उनके अहसानों के तले दबे हुए है, किसी भी बिपरीत परिस्थिति में वे साथ नहीँ छोड़ेंगे, ना ही किसी और का नेतृत्व स्वीकार करेंगें। इसलिए अपने सुबिधा अनुसार जो भी कर सकते हो करो, कही कोई फर्क नही पड़ेगा, कोई कार्यकर्त्ता उंगली नही उठाएगा। अजीब बिडंबना है, मधेश का नेतृत्व करने की योग्यता बहुसंख्यक जाती का होना मात्र है। जब तक मधेश इस चक्रव्यूह से बाहर नहीँ निकलेगा, कोई आंदोलन सफ़ल नहीँ होगा।

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