मधेशी नेता फिलहाल दोलायमान हैं कि वो किस दिशा में जाएँ: श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति,काठमांडू, २३ अगस्त | वर्तमान  राजनीति में असमंजस की स्थिति बरकरार है । पूर्व प्रधानमंत्री ओली ने जो सपना दिखाया उसे वो पूरा किए बगैर सत्ताच्यूत हो गए और अब उन्हीं सपनों को पूरी करने की जिम्मेदारी वत्र्तमान प्रधानमंत्री प्रचण्ड के सामने है और जिसे पूरा करना सरकार के लिए आसान नहीं है । क्योंकि संक्रमणकालीन इस अवस्था में कोई भी निर्णय गठबन्धन की सरकार नहीं ले सकती है ।

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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हम देखें तो सरकार से जो होना सम्भव था वो वह कर रही है । मसलन शहीदों को सम्मान देना, राहत देना, आन्दोलन के क्रम में घायल हुए लोगों को उपचार खर्च देना और विभिन्न आरोपों में फँसे आन्दोलन के कार्यकर्ताओं को आरोपमुक्त करना । वत्र्तमान सरकार से यह फायदा तो हुआ है क्योंकि मधेश और मधेशी नेताओं की उपस्थिति को पूर्व प्रधानमंत्री ने तो पूरी तरह से नकार दिया था । इसी असंतुष्टता ने मधेशी दलों की सोच को वत्र्तमान गठबन्धन की ओर मोड़ा और वो इस सरकार को समर्थन देने के लिए तैयार हो गए ।

बावजूद इसके मधेशी नेता भी फिलहाल दोलायमान हैं कि वो किस दिशा की ओर जाएँ । सरकार को बाहर से समर्थन करें या सरकार में सहभागी होकर । ये एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर प्रत्येक मधेशी दलों के सदस्यों का दो खेमों में बँट जाना तय है और वो बँट भी चुके हैं । एक खेमा सरकार में जाने की सोच रहा है तो दूसरा स्थिति को भाँप कर आन्दोलन को जारी रखने के मूड में है । वैसे देखा जाय तो जिनकी दूरगामी सोच होगी वो कदापि सरकार में जाने की नहीं सोचेंगे । ऐसा कर वो अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चलाएँगे । क्योंकि यह तो जाहिर सी बात है कि वत्र्तमान सरकार भी मधेश की माँगों को पूरी करने में असमर्थ है वो चाह कर भी मधेश हित में कोई कदम नहीं उठा सकती । और मधेश इस शंका में भी है कि अगर माओवादी मधेश के हित की बात सोचते तो आज यह स्थिति ही नहीं होती । जो कुछ विगत में हुआ और जो हो रहा है उस सबमें इन दोनों पार्टियों की मुख्य भूमिका रही है । खैर यह राजनीति है जहाँ क्षण में बादे भी बदलते हैं और दावे भी । फिलहाल तो हम यह देखें कि जिन अधिकारों की माँग को लेकर मधेश आन्दोलन हुआ वह पूर्ववत है, उसमें फिलहाल किसी परिणाम की गुंजाइश भी नजर नहीं आ रही है । सीमांकन का मसला ज्यों का त्यों है । मधेशी दलों की पहली माँग थी एक मधेश एक प्रदेश जो समय के साथ परिवर्तित होकर दो प्रदेश में बदला ।

माओवादी और नेपाली काँग्रेस ने मधेशी मोर्चा के साथ तीन बुन्दें सहमति की जिसके आधार पर मोर्चा ने प्रचण्ड का समर्थन किया । किन्तु इस तीन बून्दें सहमति में भी सीमांकन से सम्बन्धित कोई बातें नहीं हैं, संशोधन की बात है और यह भी सर्वविदित है कि संविधान संशोधन में दो तिहाई सदस्यों के मत की आवश्यकता होगी जो बिना एमाले के सहयोग के सम्भव नहीं है । अर्थात् मधेश की समस्या या माँग अपनी पूर्व अवस्था में ही है । इस स्थिति में अगर मधेशी नेता सरकार में जाते हैं तो उन्हें क्या हासिल होगा यह सोचने वाली बात है । क्या वो सरकार में जाकर दवाब बना पाएँगे ? और अगर ऐसा नहीं हुआ तो मधेशी जनता को वो क्या जवाब देंगे ? जो मधेशी नेता सरकार में जाने के लिए आतुर हैं उन्हें इस बात पर विचार करना आवश्यक होगा । क्योंकि मधेशी जनता यह जानती है कि व्यक्तिगत उपभोग के लिए सत्ता में शामिल होने वाले नेता उनके अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा पाएँगे, हाँ नाटक जरुर कर सकते हैं । इस नाटक की पटकथा लिखने की तैयारी भी हो रही है । जिसका सहारा लेकर सरकार में अपनी जगह सुरक्षित करने की कोशिश और जनता को दिग्भ्रमित करने का प्रयास जारी है । संविधान संशोधन का जो दिखावा किया जाएगा वो सिर्फ मधेश की जनता को दिखाने के लिए होगा । या फिर पूर्व सरकार ने जिस तरह भारत भ्रमण से पहले संविधान संशोधन का तोहफा दिया था वैसे ही शायद वत्र्तमान प्रधानमंत्री के भारत भ्रमण से पहले भी कोई ऐसा ही तोहफा जनता के समक्ष पेश किया जाएगा । क्योंकि किसी सकारात्मक संशोधन के लिए वत्र्तमान सरकार सक्षम ही नहीं है । सरकार की ओर से भी सिर्फ बातें ही सामने आ रही हैं कोई पहल नजर नहीं आ रहा । संशोधन के लिए एमाले का साथ आवश्यक है किन्तु अब तक एमाले से कोई वार्ता का माहोल तैयार नहीं किया गया है । ऐसी स्थिति में मधेश की किसी माँग को पूरा किया ही नहीं जा सकता है ।

भारत यात्रा से लौटे उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री निधि ने अपनी यात्रा को सफल बताया है और कहा है कि जल्दी ही राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री की भारत यात्रा होगी । भारत यात्रा के दौरान निधि ने भारतीय गृहमंत्री, विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री से मुलाकात की । भारत अब भी संविधान के संशोधन और कार्यान्वयन की ओर जिज्ञासु है और चाहता है कि जनता की भावनाओं के अनुरूप संशोधन हो और जल्द से जल्द इसका कार्यान्वयन हो । मधेश के साथ हुए तीन बुन्दें समझौते में संविधान संशोधन की बात है और यह आवश्यक भी है यह सन्देश निधि ने भारत भ्रमण के दौरान दिया जिसकी भारतीय अधिकारियों ने प्रशंसा भी की । किन्तु यक्ष प्रश्न यही है कि यह सम्भव कैसे होगा ? क्योंकि संशोधन नाम का नहीं काम का होना चाहिए जिसकी कोई भूमिका फिलहाल नहीं दिख रही है ।

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