मधेशी नेता, समझो ! तुमसे अन्तिम मिलन है,प्रसङ्ग, एक प्रस्तावित उम्मेदवार : कैलाश महतो


कैलाश महतो, पराशी, २8मई | उपर का शीर्षक एक राजपा यूवा नेता का है जिन्हें भैरहवा के किसी पद के लिए चुनाव लडने का प्रस्ताव किया जा रहा है, मगर वे कहते हैं कि नेपाली राजनीतिज्ञ मधेशी नेताओं से अन्तिम भेंटघाट कर रहे हैं जो उन्हें मन्जुर नहीं है । वे चुनाव लडने से इंकार कर चुके हैं ।

उनका कहना है कि मधेश से मधेशियों का पत्ता साफ करने का नेपाली राज अपने तैयारी में रफ्तार बढाने के सिलसिले में ही यह स्थानीय चुनाव भी है । मधेश से मधेशियों को दूर करने के लिए उसे चुनाव के सुनहरे गिलास में मन्द विष का रसपान कराया जा रहा है । मधेशियों से उनकी यह अन्तिम धोखापूर्ण प्रेम मिलन हो रही है ।

समान्य सी बात है–एक खँुखार शासक भी जब किसी को फाँसी पर लटकाता है, उससे उसकी अन्तिम इच्छा पूछा जाता है । वही मधेशियों के साथ हो रहा है । संघीयता को अपना प्राण प्रतिष्ठा मानने बाले मधेशी नेताओं के उस अन्तिम ईच्छा को पूरा करने के नाम पर संघीयता सहित उनकी अन्त्यहीन मृत्यु के लिए बनाए गए स्थानीय तह का नयाँ संरचना और उसके चुनावों को रंङ्गीन बनाने हेतु चेहरे पर खुश्नुमा मुस्कान बिखेरे गले मिल रहे नेपाली यमराज खडा है ।

एक श्रोत के अनुसार माघ के अन्तिम सप्ताह में लुम्बिनी में नेपाली पार्टीयों के दूसरे तीसरे दर्जे के हस्ती बाले नेताओं की एक गोप्य बैठक हुई थी । उस बैठक में हर मोड पर नेपाल के राजनीति में व्यवधान डालने बाले मधेशी नेताओं से कैसे निपटा जाय–शीर्षक पर दो दिनोंतक बैठक चली । श्रोत का दावा है कि बैठक ने यह निर्णय लिया कि मधेश को चिढाने से काम बिगर सकता है । मधेश को विश्वास में लेकर अपने कुछ अडान के साथ मधेशी नेताओं के कुछ बातों को मानने की सलाह अपने अपने पार्टी के शीर्ष नेताओं को दें । किसी तरह उनके द्वारा प्रस्तावित निर्वाचनों में मधेशी दलों को भाग लेवाने की रणनीति की भी बात हुई । धिरे धिरे किसी भी तरह मधेशियों को उनके जमीनों से दूर कर उसे कब्जा करने की भी योजना बनी ।

एक उदाहरण ः एक लुम्बिनी निबासी अपना नाम न बताने के शर्त पर एक मधेशी मुसलमान का कहना है कि कुछ महीने पूर्व पूर्खौली रुप में दोनों भाइयों का साझा रहे दो कट्ठे जमीन को उनके जानकारी के बिना उनके बडे भाइ ने एक नेपाली के हाथों बेच दिया । पता चलने के बाद छोटे भाइ ने ऐतराज जताते हुए उस जमीन पर मुद्दा करने की बात की । यह बात जमीन खरीदने बाले नेपाली को पता चला । उसने उन्हें पहले उन्हें धमकी दी और बाद में उन्हें चूप रहने के लिए उनके रोजी रोटी के नाम पर कागज कराकर एक ट्र्याक्टर दे दी । आज वे न चाहते हुए भी चूप हैं ।

मधेशी के पास अब मधेश में बाँकी यदि कुछ है तो वो अभी भी थोडा बहुत भूमि ही है । उसके पास न तो उसका राजनीति है, न व्यापार । न तो रोजगार है, न अवसर, और नेपाली राज उसे जड से ही सर्वनाश करने के लिए सारी योजनायें बना चुकी है । २३,०६८वर्ग कि.मी की मधेश भूमियों से १६,००० वर्ग कि.मी भूमि नेपालियों ने अपने नाम कर ली है । मधेश यूँही और इसी हालात पर रहा तो चन्द वर्षों में ही मधेश में मधेशियों की जातीय सफाया निश्चित है ।

नेपाली राज ने मधेश को जब जब आरक्षण के नाम पर, कोटे के नाम पर, दया के नाम पर, भिख के नाम पर, आन्दोलन के नाम पर, सम्झौते के नाम पर, सहमति के नाम पर, परिवर्तन के नाम पर, सहभागिता, समावेशी व समानुपातिकता के नाम पर, अल्प संख्यक, पिछडा वर्ग, मुस्लिम, महिला, दलित, जनजाति, आदिवासी आदि के नाम पर कुछ देने की बात की, मधेश के साथ उतने ही बडे पैमाने पर धोखा हुआ, और मधेशी कुछ अर्धपागल नेतृत्व, बुद्धिहीन पेटजिवी बुद्धिजिवी और कायर राजनीति उन्हीं साजिसों को प्रगति समझ बैठें । आयें, हम कुछ नतीजों पर नजर डालते हैं ः

१. मधेश आन्दोलन २०६३–६४ ने संघीयता का नारा देकर पूरा मधेश एक प्रदेश बनाने का संकल्प लिया था । क्या मधेश को संघीयता मिला ? क्या झापा से कंचनपुरतक मधेश एक प्रदेश बना ?
२. संघीयता को मधेश का प्राण मान कर पूरा मधेश को एक प्रदेश बनाने बाले मधेशी नेतृत्व पूरा मधेश दो प्रदेश के बात पर आ गिरा । क्या मधेश ने दो प्रदेश पा लिया ? दो या एक प्रदेश के विपरीत मधेश के झापा, मोरंङ्ग, सुनसरी, कैलाली और कंचनपुर मधेश से बाहर क्यूँ गया ?
३. बार बार मधेश के मुद्दों को लेकर दर्जनों नेपाली सरकारों के साथ सहमति की गयी । सरकार में बडे बडे मन्त्रालयमिले । ५०% से भी ज्यादा मन्त्री बनें । मधेशियों को राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उप–प्रधान तथा गृहमन्त्री, परराष्ट्र, रक्षा, शिक्षा, संचार, उर्जा, सिंचाई, निर्माण, कृषि आदि महत्वपूर्ण मन्त्रालय मिले । किस सरकार में किसने सहमति के अनुसार मधेश मुद्दों का समाधान किया ? राष्ट्रपति उल्लू का टट्टु, उपराष्ट्रपति थुक चटना, गृहमन्त्रियों को सिडिओ और इंसपेक्टर तकों से अपमान, मन्त्रालय के अपने सचिव व कर्मचारीयों से फटकार और हाजिरी तक नहीं करने दिए जाने का बेइज्जती क्यूँ होना पडा ? किस मधेशी की रक्षा हुई ? शिक्षा, कृषि, सिंचाई, संचार, उर्जा जैसे मन्त्रालयों ने मधेश को कहाँ क्या दिया ? निर्माण मन्त्रालय ने मधेश को बन्जर, खण्डहर और मधेश के शहरों को देहात से बदतर क्यूँ बना दिया ?
४. मधेश विरोधी संविधान नहीं बनने देने की अडान के बावजुद संविधान कैसे बन गया ?
५. मधेश के हित विपरीत कहे जाने बाले संविधान को मधेशी पार्टिंयों द्वारा नहीं मानने के बाद भी संविधान को अस्वीकार करने की सर्वोच्च संस्था संसद में ही बारम्बार उसी संविधान के अन्तर्गत प्रधानमन्त्रीय निर्वाचनों में भाग कैसे लिया गया ?
६. सीमांकन बिना का कोई चुनाव संभव नहीं होने का दावा करने बाले मधेशी दल और उनके नेतृत्वों ने सम्पन्न चुनाव को होने क्यूँ दी जब कि वे नेता पूरे नेपाल के होने का दावा करते हैं । उनके नेपाल में उनके असहमति के बगैर निर्वाचन सम्पन्न कैसे हुआ ?
७. सीमांकन के बिना ही निर्वाचन सम्पन्न होने के बाद भी मधेश में चुनाव नहीं होने देने का दावा करना क्या यह सावित नहीं करता कि बाँकी नेपाल उन्हें अपना नेता नहीं मानता ? राष्ट्रिय पार्टी बनाने के लिए नेपाली पार्टींयाँ समेत से मिलने के बावजुद उनके नेपाल में ही उनके पार्टिंयों के उम्मेवारों का नामतक उच्चारण नहीं होना मधेश का शर्मनाक बेइज्जति है या नहीं ?
८. विर्तमान राष्ट्रपति रामबरण यादव द्वारा ही हस्ताक्षरित संविधान को गले लगाकर काठमाण्डौं से चुनाव लडने बाली रामबरण यादव के ही बेटी भतिजी और मधेश की बेटी निरुपमा यादव को काठमाण्डौ में आरक्षण कोटा सा मत उपलब्ध क्यूँ ? वो सिर्फ मधेशियों का भोट होना निश्चित है ।
९. सीमांकन को मूल मुद्दा बनायै बैठे मधेशी नेतृत्वों ने सीमांकन के मुद्दों को छोडकर अब जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र घोषणा की माँग करने की औचित्य और प्रतिष्ठा क्या ?
१०. क्या मधेशी नेतृतव के अनुसार ही निर्वाचन क्षेत्र में बढोत्तरी हो जाने के बाद मधेशियों का भरमार जित सुरक्षित हो पायेगा या उन बढने बाले क्षेत्रों में भी नेपालियों का ही जित बढाकर मधेशियों का दोहन चरम सीमातक बढाया जायेगा ?
११. टिकापुर लगायत के मधेशी जिलों में मधेशियों से मत प्राप्त करने के लिए ही आज इस चुनावी घडी में उनके उपर राज्य द्वारा लगाये गये बेबुनियादी अपराधिक मुद्दों को खारेज करबाने की समय मिला है ? आज से पहले क्यूँ नहीं खारेज हुए ? इतने सितम और कष्ट उन्हें क्यूँ झेलने पडे ? क्या वे इतने दिनोंतक हत्यारा ही थे ? भोट लेने के समय में वे निरपराधी कैसे हो गये ?
१२. सीमांकन को छोडकर चुनाव में जाना ही था तो इतने मधेशियों के घर के चिरागों का बेमौत शहादत क्यूँ ?
१३. शहादत प्राप्त मधेशी को अगर राज्य शहीद मानती है तो उनके तस्वीरों को सरकारी कार्यालयों में शहीद के रुप में स्थान क्यूँ नहीं ? परिवारों को नेपाली शहीद परिवार जैसा सममान और अवसर क्यूँ नहीं ?
१५. शहीद के नाम पर राज्य द्वारा शहीद परिवारों को मिले रु. दश लाख में से मधेशी नेताओं द्वारा लिए गए सापटी लाखों की रकम दश वर्ष बित जाने के बाद भी लौटाया क्यूँ नहीं जाता ?
१६. जिस मधेश÷मधेशी शब्द ने मधेशी पार्टिंयों को शिफर से शिखर तक पहुँचाया, उन्ही शब्दों से घृणा क्यूँ ? उन शब्दों को पार्टिंयों ने क्यूँ हटाया ?
१७. मधेशी जनता को गाँधी का मन्त्र “मन से डर हटाओ, जित तुम्हारी है” का पाठ सिखाने बाले मधेश के तार्किक कहे जाने बाले नेता लोग स्वतन्त्र मधेश के नाम से ही काँपता क्यूँ है ? शान्तिपूर्ण आन्दोलन के नाम पर ही सैकडों मधेशी का हत्या क्यूँ ? स्वतन्त्र मधेश के लिए छाती खोलकर बात करने बाले कितनों का शहादत हुई है ?

हम प्रार्थना करत हैं कि मधेशी पार्टिंयों का हर आन्दोलन सफल हों । उनसे मधेश को ही फायदे होने है । मगर वे आन्दोलन करें सफलता के लिए । क्षणिक अपने राजनीतिक फायदों के लिए नहीं । और यह तय है कि जबतक इनके नीति और नियत दोनों में बदलाव नहीं आयेंगे, ये आन्दोलन करते करवाते रहेंगे, मधेश को बिना ईज्जत का शहीदों का बदनाम बाजार बनाते रहेंगे और उनके ही नाम पर कुछ वर्षोंतक कमाते रहेंगे । फिर मधेशी नेता मधेश से पलायन हो जायेंगे और बाँकी मधेशी गुलाम बन जायेंगे । क्यूँकि इन्होंने अपने और अपने औलादों के लिए नेपाल और मधेश से भी बाहर सारा इन्तजाम कर रखे हैं । सद्बुद्धि प्राप्त हों, यही कामना है ।

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